
बेंगलूरु (कर्नाटक) – कर्नाटक राज्य के वर्तमान कांग्रेस-जनता दल (धर्मनिरपेक्ष) सरकार ने संविधान की धाराआें का दुरुपयोग कर, विरोधी विचारधारा के हिन्दुत्वनिष्ठों को समाप्त करने का षड्यंत्र ही चला रही है । गौरी लंकेश हत्या के प्रकरण की जांच करने के लिए कर्नाटक सरकार ने तुरंत विशेष अन्वेषण कार्यबल (एसआइटी) का गठन किया । इस प्रकरण में बंदी बनाए गए हिन्दू आरोपियों को न्यायालय में उपस्थित करते समय अधिवक्ता चुनने का भी अधिकार नहीं दिया गया । आरोपियों को अत्यंत निर्दयता से पीटकर उनसे अपराध मान्य करनेवाला बयान लिया गया । इसी प्रकार, इन हिन्दू आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास न होने पर भी उन पर तुरंत संगठित अपराध से संबंधित कठोर नियम ककोका (कर्नाटक संगठित अपराध नियंत्रण कानून) लगाया गया; परंतु पॉप्यूलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के मैसुरू निवासी अबिद पाशा और उसकी टोली ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा आदि संगठनों के ८ हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताआें की क्रूरतापूर्वक हत्या की, यह जांच से स्पष्ट होने पर भी उन पर अब तक ककोका क्यों नहीं लगाया गया ? कर्नाटक राज्य में २३ से अधिक हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताआें की निर्दयता से हत्या होने पर भी, उसके विषय में कोई क्यों नहीं बोलता ? इस हत्या प्रकरण से जुडे धर्मांधों की सहायता करनेवाले संगठन पॉप्यूलर फ्रंट ऑफ इंडिया पर प्रतिबंध लगाने की मांग क्यों नहीं की जा रही है ? ये प्रश्न हिन्दू विधिज्ञ परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता वीरेंद्र इचलकरंजीकर ने बेंगलूरु में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में उठाए ।
केवल मैसूर जनपद में धर्मांधों ने अनेक हत्याएं धार्मिक द्वेष से प्रेरित होकर की हैं । इन प्रकरणों में आबिद पाशा और उसकी टोली का हाथ होने की बात सामने आने पर भी, पुलिस ने इसकी पूरी जांच किए बिना ही इस केस को बंद कर दिया । मार्च २०१६ में भाजपा के के. राजू की हत्या प्रकरण में पाशा और उसकी टोली को पकडने के पश्चात पता चला था कि पहले की सभी हत्याआें में इसी टोली का हाथ था । इन सभी प्रकरणों में पुलिस ने जानबूझकर त्रुटियां छोड दीं । इससे, आबिद पाशा और उसके टोली के सब आरोपी निर्दोेष मुक्त हुए अथवा उन्हें प्रतिभूति (जमानत) मिली ।
इतनी बडी संख्या में हिन्दुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताआें की हत्या होने पर भी कर्नाटक की धर्मनिरपेक्ष सरकार ने न तो विशेष अन्वेषण कार्यबल (एसआइटी) गठित किया, न ककोका लगाया, न यूएपीए कानून लगाया और न आरोपियों का नार्को परीक्षण करवाया अथवा उनके विरुद्ध विशेष न्यायालय में अभियोग चलाने की व्यवस्था की । यह सब आश्चर्यजनक है ! खरे संगठित अपराधियों को दंडित न कर, दोषमुक्त करना, कांग्रेस-जेडीएस सरकार की दोगली नीति का निंदनीय उदाहरण है ।
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