कौन अधिक सुखी रहता है ?

कौन अधिक सुखी रहता है, केवल परिवार का अथवा अपना ही विचार करनेवाला
अथवा वह जो समाज, राष्ट्र अथवा मानवजाति के लिए विशेष ध्येय से प्रेरित होता है ?

उदाहरण के लिए – तानाजी मालुसरे (शिवाजी महाराज के एक प्रमुख सैनिक) ने कहा, ‘‘पहले कोंढाणा का विवाह, पश्चात रायबा का (बेटे का) ।’’ (अर्थ : पहले शत्रु से लडाई कर कोंढाणा किला जीतूंगा, उसके पश्चात ही रायबा का (बेटेका) विवाह करूंगा ।) उसी प्रकार आत्मदर्शन के ध्येय से प्रेरित व्यक्तियों को अपने सांसारिक सुख-दुःख ही क्या, प्राणिमात्र के सुख-दुःख के संबंध में भी कुछ नहीं लगता । इसके विपरीत, जो केवल परिवार का अथवा अपना ही विचार करता है, वह अधिकांशतः आजीवन दुःखी रहता है ।

इसका कारण है वासना ! वासना उत्पन्न होते ही, मनुष्य सुख की अवस्था को खो देता है । विषयभोग में भी जो सुख होता है, वह विषय भोगने के कारण नहीं होता; अपितु तृप्त होने पर जब विषयभोग से ऊब जाते हैं, तब उनके प्रति निर्मित अरुचि से ऐसा होता है । पहला लड्डू खाने पर अच्छा लगता है, तत्पश्चात इच्छा नहीं करती और आगे तो अरुचि पैदा हो जाती है । इसका अर्थ है कि लड्डू में विषय सुख नहीं है । सुख विषय में नहीं, निर्विषय स्थिति में है । वासना का अभाव चाहे उसकी पूर्ति के कारण हो अथवा उसके परित्याग के कारण, उसके उत्पन्न न होने के कारण हो अथवा चित्त की एकाग्रता के कारण वासना का लोप होने से; किसी भी स्थिति में प्रमाणित यही होता है कि ‘वासना के अभाव में ही सुख है ।’ अर्थात सुख विषयों में न होकर चित्त में ही होता है ।’

निद्रावस्था और जागृतावस्था में वासना का अभाव होता है । दोनों में भेद क्या है ?

निद्रावस्था में वासनाका अभाव : गहरी नींद में विषय नहीं रहता, तब भी आनंद मिलता है और दो दिन न सो पाने पर मनुष्य अस्वस्थ हो जाता है । गहरी नींद के सुख एवं मोक्ष के सुख में कोई भेद नहीं है । यह मत श्रीशंकराचार्य एवं विद्यारण्यने भी मान्य किया है । उपनिषद्कारों के मत में मोक्षसुख, गहरी नींद का सुख एवं रतिसुख, इनकी तीव्रता एक समान ही है प्रतिदिन प्रत्येक मनुष्य ५-६ घंटे इस सुख का अनुभव करता है । ऐसे में इस विधान का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि ‘जिसे मोक्षसुख की लत लग जाए, उसे अन्य सर्व सुख तुच्छ लगने लगते हैं’, क्योंकि प्रत्येक को यह सुख प्रतिदिन मिलने पर भी अन्य सुखों की इच्छा रहती है । (इसका कारण यह है कि जागृत अवस्था में वही सुख (आनंद) प्राप्त करने का मार्ग पता नहीं होता है, इसलिए मनुष्य अन्य प्रकार से सुख पाने का प्रयत्न करता है ।)

जागृतावस्था में वासना का अभाव : निद्रावस्था में वासना के अभाव से अधिक श्रेष्ठ है जागृतावस्था में वासना का अभाव । यह सही है कि नींद में वासना के अभाववश सुख मिलता है; परंतु उस सुख के समय जीव को भान नहीं रहता कि, ‘मैं सुखी हूं’, इसलिए निद्रा का सुख निम्न श्रेणी का है और जागृति में वासना के अभाव के समय जीव को भान होना कि वह ‘सुखी है’, यह सुख श्रेष्ठ श्रेणी का सिद्ध होता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘आनंदप्राप्ति हेतु अध्यात्म’