ज्ञानप्रबोधिनी या अज्ञानप्रबोधिनी ?

सौभाग्य की प्राप्ति लिए वटसावित्री पूजासंबधी ज्ञानप्रबोधिनी
संस्कारमाला की आलोचना और परम पूज्य पांडे महाराजजी द्वारा किया खंडन !

१. सावित्री के पतिव्रत के कारण
सत्यवान को जीवनदान मिला, प्राणवायु से नहीं !

१ अ. आलोचना

ज्ञानप्रबोधिनी की वटसावित्री पोथी के प्रारंभ में ऐसा उल्लेख है कि ‘पर्यावरण शुद्धि और रक्षा के लिए वटसावित्री की पूजा की जाती है !’ वटवृक्ष (बरगद का वृक्ष) की शुद्ध वायु सेे सत्यवान को होश आया जिससेे सावित्री को आनंद हुआ । सत्यवान ने मृत्यु को पराजित किया, अर्थात वटवृक्ष से मिलनेवाली प्राणवायु के कारण उनमें चेतना आई ।

१ आ. उपरोक्त कथन का खंडन

१ आ १. मूल कथा में ऐसा वर्णन है कि सावित्री की पतिव्रत शक्ति से यमराज ने सत्यवान को मुक्त कर जीवनदान दिया । वटसावित्री व्रत में सावित्री के पतिव्रत का महत्त्व दर्शाया है । सत्यवान से विवाह के एक वर्ष पश्‍चात सत्यवान का मृत्युयोग था । सावित्री ने अपने पतिव्रत के आधार पर यमराज के पाश से सत्यवान को मुक्त करवाया । यह घटना वटवृक्ष के नीचे हुई ।

१ आ २. स्कंदपुराण की कथानुसार सावित्री ने अपनी चतुराई से यमराज से ५ वरदान मांगकर सत्यवान के प्राणों की रक्षा की । स्कंदपुराण में वटसावित्री की कथानुसार अपने पतिव्रत और तप के सामर्थ्य की शक्ति से सावित्री ने सत्यवान के प्राण ले जा रहे यमराज को देखा और उनसे ५ वरदान मांगे । ज्ञानप्रबोधिनी का उपरोक्त कथन सावित्री के पतिव्रत का अपमान तथा धर्मद्रोह है ।

१ आ ३. सत्यवान ने उठते ही कहा, ‘सावित्री के व्रत का फल स्वयं मैंने देखा है ।’ भगवान शिव कहते हैं, ‘जिस व्रत के प्रभाव से सावित्री के पति अल्प आयु होते हुए भी दीर्घ आयु हो गए, ऐसा सौभाग्य देनेवाला व्रत सुहागिनों को अवश्य करना चाहिए ।’

पतिव्रता सावित्री के तप:सामर्थ्य के कारण उन्हें यम दिखाई दिए और उन्होंने यम से अपना उद्देश्य साध्य किया । इस सत्यकथा को आदर्श मानकर, बताए अनुसार व्रत रख अपना उद्देश्य प्राप्त करना चाहिए । इसी दृष्टिकोण से स्कंदपुराण में इस कथा का उल्लेख है । वर्तमान विज्ञान युग में रज-तम के प्रभाव के कारण इस पर विश्‍वास नहीं किया जाता ।

 

२. व्रत, श्रद्धा तथा भक्तिभाव से किए जाते हैं ।
इस समय पर्यावरण का विचार करना अनुचित है । यह अधर्म है ।

२ अ. आलोचना

पूजा का अर्थ है वृक्षों की स्वच्छता बनाए रखना । सावित्री के पर्यावरण का ज्ञान, लगन और तीव्र इच्छा शक्ति से उनके पति को जीवनदान मिला ।

२ आ. उपरोक्त आलोचना का खंडन

२ आ १. ज्ञानप्रबोधिनी, व्रत के अनुचित उद्देश्य बताकर समाज को श्रद्धाहीन और दिशाहीन कर रही है । वास्तव में ‘पूजा’ संस्कृत शब्द है । प्रत्येक योगमार्गानुसार पूजा शब्द का अर्थ भिन्न होता है, उदा. कर्मयोगी के अनुसार ‘कर्म ही पूजा है ।’ वटपूर्णिमा व्रत का उद्देश्य है ‘सावित्री के समान सभी सुहागिनों को दृढ श्रद्धा से यह व्रत कर, भगवान शिवजी के आशीर्वाद प्राप्त करें ।’

१. ज्ञानप्रबोधिनी ने सावित्री के पतिव्रत धर्म की अपेक्षा वटवृक्ष की महिमा बताकर समाज की श्रद्धा पर आघात ही नहीं, उसे दिशाहीन भी किया है ।

२ आ २. मनमाने ढंग सेे ‘वटसावित्री’ कथा लिखकर, ज्ञानप्रबोधिनी ने अधर्म का प्रसार किया है । मनुस्मृति के मतानुसार ऐसे चार्वाक वृत्तिके विद्वानों का बहिष्कार करना चाहिए ।

२ आ ३. सावित्री का महत्त्व घटाकर, केवल वटवृक्ष का महत्त्व बढाना अनुचित है ! वटवृक्ष के समान ‘उदारता’ यह गुण हममें होना चाहिए, इस भावना से वटवृक्ष की पूजा करना मान्य है; किंतुु सावित्री को महत्त्व न देकर केवल वटवृक्ष को महत्त्व देना उचित नहीं । मूल कथानुसार प्रबोधन करने से धर्मकार्य होता है । उसमें मनमाना परिवर्तन करना अधर्म है ।

२ आ ४. अष्टमहासिद्धी प्राप्त संत आज भी विद्यमान हैं – उदा. मुंबई के निकट कल्याण में प.पू. योगतज्ञ दादाजी वैशंपायन महान संत हैं । वे सूक्ष्म से हिमालय पर्वत के महात्माआेेंं से मिलकर कार्य सिद्ध कर, लौट आते हैं ।

ज्ञानप्रबोधिनी के शास्त्र विशेषज्ञों में श्रद्धा न होने के कारण उन्होंने वटसावित्री की मूल कथा में परिवर्तन कर, समाज को दिशाभ्रमित किया । इस सूत्र से स्पष्ट होता है कि समाज को धर्मशिक्षा की कितनी अधिक आवश्यकता है । शास्त्र सम्मत ब्राह्मणों द्वारा ज्ञानप्रबोधिनी की अनुचित बातों पर प्रतिबंध लगाना आवश्यक है ।

 

३. ज्ञानप्रबोधिनी ने समाज को हिन्दू धर्मशास्त्र
के अनुसार पूजा न कर, त्रुटिपूर्ण पूजा सिखाने का धर्मद्रोह किया है !

३ अ. आलोचना

यह घटना वटवृक्ष के नीचे होने के कारण यह व्रत ‘वटसावित्री’ नाम से जाना जाता है । भारतीय नारी अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन वटवृक्ष की पूजा कर सावित्री से प्रार्थना करती हैं ।

३ आ. उपरोक्त कथन का खंडन

३ आ १. केवल घटनास्थान के अनुसार व्रत का नाम ‘वटसावित्री’ है, यह कहना अनुचित होगा । स्कंदपुराण के अनुसार सावित्री ने विवाह के पश्‍चात नारद के कथनानुसार यह व्रत किया । जिस दिन व्रत पूर्ण हुआ उसके अगले दिन व्रत की समाप्ति थी । किंतु ज्ञानप्रबोधिनी के अनुसार सत्यवान की घटना वटवृक्ष के नीचे होने के कारण इसे ‘वटसावित्री’ कहा जाता है । स्पष्ट है कि उपरोक्त कथन असत्य है ।

३ आ २. वटसावित्री की पूजा न करवाकर अपने मनानुसार पोथी में परिवर्तन करना अधर्म है ! ज्ञानप्रबोधिनी के अनुसार वटपूजा के पश्‍चात सुहागिनें सावित्री से प्रार्थना करती हैं । मूल पोथीनुसार वटसावित्री की पूजा में ब्रह्मा सहित सावित्री का ध्यान करना चाहिए ।

वटमूले ब्रह्मसावित्रीभ्यां नम:। ध्यायामि । (अक्षत चढाएं !)

अर्थ : वटवृक्ष की जड में स्थित ब्रह्मदेव और सावित्री को प्रणाम ! मैं उनका ध्यान करती हूं ।

देवि देवि समागच्छ प्रार्थयेऽहं जगन्मये ।
इमां मया कृतां पूजां गृहाण सुरसत्तमे ?
ब्रह्मसावित्रीभ्यां नम: । आवाहनार्थे अक्षतान् समर्पयामि ?

अर्थ : हे विश्‍वस्वरूपिणी देवी, मैैं आपसे यहां आने की विनती करती हूं । हे देवी-देवताआें में श्रेष्ठ देवी, आप यहां आकर मेरी पूजा स्वीकार करें । ब्रह्मदेव और सावित्री को नमस्कार कर, उनके आवाहन हेतु मैैं अक्षत समर्पित करती हूं । (स्वयंपुरोहित, प्रमुख व्रते – वटसावित्री पूजा, पृष्ठ ४६)’ पूजाविधि में पतिव्रता सावित्री की पूजा को महत्त्व दिया है । इस कारण वटवृक्ष की पूजा के समय सावित्री की पूजा का महत्त्व है । सावित्री के व्रत में संपूर्ण पूजा के मंत्र दिए हैं । सौभाग्य की प्राप्ति हेतु संपूर्ण पूजा करना आवश्यक है । जबकि ज्ञानप्रबोधिनी में वटवृक्ष की पूजा समाप्त होने पर सावित्री से केवल प्रार्थना और नमस्कार करने के लिए कहते हुए पोथी का समापन किया गया है ।

वैदिक काल से केवल हिन्दू संस्कृति ने प्रकृति का सर्वाधिक विकास किया है । उन्होंने नदी, सूर्य, पर्वत इत्यादि को देवता मानकर उनकी रक्षा की है । इसके विपरीत ज्ञानप्रबोधिनी यह बताती है कि प्रकृति में सुधार आवश्यक है और वनों की कटाई भी करती है । किंतु सनातन हिन्दू धर्म परिस्थिति चाहे कैसी भी हो आंतरिक स्थिति के सुधार की ओर ध्यान देती है जिससे भविष्य में कष्ट नहीं होता । पर्यावरण प्रेमियों (विज्ञानवादियों) ने वाहनों का धुआं कारखानों का रासायनिक दूषित जल, नदियों का जल-प्रदूषण, जैविक कचरा इत्यादि द्वारा पर्यावरण प्रदूषित किया है । इस प्रकार हिन्दुआें को धर्मभ्रष्ट करनेवाली ज्ञानप्रबोधिनी सामाजिक संस्कृति नष्ट कर रही है । अत: मनुस्मृति में बताए अनुसार उसका बहिष्कार करना ही उचित होगा ।

– प.पू. परशराम पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल