श्रीलंका का नगर नुवारा एलिया में राम-रावण युद्ध का साक्षी रामबोडा तथा रावणबोडा पर्वत तथा एक संत द्वारा स्थापित गायत्रीपीठ आश्रम !

महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी तथा छात्र-साधकों द्वारा रामायण सें संबंधित श्रीलंका की अध्ययन यात्रा !

सद्गुरु (सौ.) अंजली गाडगीळ

रामायण में जिस भूभाग को लंका अथवा लंकापुरी कहा गया है, वह स्थान है आज का श्रीलंका देश ! त्रेतायुग में श्रीमहाविष्णुजी ने श्रीरामावतार धारण किया तथा लंकापुरी जाकर रावणादि असुरों का नाश किया । वाल्मिकी रामायण में महर्षि वाल्मिकी ने जो लिखा, उसीके अनुरूप घटनाएं घटने के अनेक प्रमाण श्रीलंका में मिलते हैं । श्रीलंका में श्रीराम, सीता, हनुमानजी, लक्ष्मण तथा मंदोदरी से संबंधित अनेक स्थान, तीर्थ, गुफाएं, पर्वत तथा मंदिर हैं । ‘इन सभी स्थानों की जानकारी मिले तथा विश्‍वभर के सभी हिन्दुओं को वह बताई जाए, इसके लिए महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी तथा उनके साथ ४ छात्र-साधकों ने एक मास (महिना) तक श्रीलंका की यात्रा की ।

हनुमानजी की निद्रित अवस्था की भांति दिखाई देनेवाला रावणबोडा पर्वत

‘अनेक अभ्यासी तथा इतिहास विशेषज्ञों ने अभीतक श्रीलंका के ९ प्रांतों में रामायण से संबंधित अनेक स्थान ढूंढ लिए हैं । उनमें से अधिकतम स्थान श्रीलंका के मध्य प्रांत में हैं । इन प्रांत का सबसे बडा और प्रमुख नगर है नुवारा एलिया ! इस नगर के निकट अशोक वाटिका, रावण गुफा, रावण जलप्रपात, हनुमानजी के पदचिन्ह, रावणपुत्र मेघनाद का तपश्‍चर्या का स्थान, राम-रावण युद्ध से संबंधित क्षेत्र, ऐसे अनेक स्थान हैं । नुवारा एलिया का वातावरण ठंडा है; क्योंकि यह प्रदेश ऊंचे पर्वतपर स्थित है । इस परिसर में स्थित कुछ स्थानों के विषय में आज हम जान लेते हैं । –

श्री. विनायक शानभाग

१. रामबोडा पर्वत

हनुमानजी जब सीतामाता की खोज कर रहे थे, तब उन्होंने इस पर्वतपर विश्राम किया तथा अब आध्यात्मिक संस्था चिन्मय मिशन द्वारा १६ फीट ऊंचाईवाली हनुमानजी की मूर्तिवाले मंदिर का निर्माण किया जाना

श्रीरामजी के अनन्य सेवक वायुपुत्र हनुमानजी रामेश्‍वरम् के समुद्र से उडान भरकर आकाशमार्ग से उत्तरी लंका में प्रवेश करते हैं । अशोक वाटिका लंका के मध्यभाग में अर्थात नुवारा एलिया नगर के निकट होने से हनुमानजी उस दिशा में अपनी यात्रा करते हैं । हनुमानजी एक पर्वत से दूसरे पर्वतपर छलांग लगाते जाते हैं । अशोक वाटिका के ३५ कि.मी. पहले हनुमानजी, जहां विश्राम के लिए रुके थे, वह स्थान है आज का रामबोडा पर्वत ! यहां हनुमानजी कुछ समय श्रीरामजी का स्मरण करते हुए ध्यान लगाए बैठे थे । उसके पश्‍चात अंतप्रेरणा से हनुमानजी ने आकाशमार्ग से अशोक वाटिका की ओर उडान भरी । अब इसी स्थानपर भारत की एक आध्यात्मिक संस्था चिन्मय मिशन ने १६ फीट ऊंची हनुमानजी की मूर्तिवाले मंदिर का निर्माण किया है । यहां श्रीरामनवमी तथा हनुमानजयंती के दिन उस परिसर के हिन्दू एकत्रित होते हैं ।

 

२. रावणबोडा पर्वत

इस पर्वतपर राम-रावण युद्ध का आरंभ हो जाना

यहां रामबोडा पर्वत की भांति अनेक पर्वत हैं । रामबोडा पर्वत के सामने जो पर्वत है, उसे रामबोडा पर्वत कहते हैं । श्रीरामजी तथा लक्ष्मण अपनी वानरसेना के साथ जब लंका आएं, तब वे प्रवास करते-कर के अंततः रामबोडा पर्वत पहुंचे । वहां उन्होंने वानरसेना के लिए सैन्यशिविर लगाया । रावण की सेना ने रामबोडा पर्वत के सामनेवाले पर्वतपर उनके सैन्यशिविर खडा करने से उस पर्वत को रावणबोडा पर्वत कहा जाता है । इसकी विशेषता यह है कि रामबोडा तथा रावणबोडा ये दोनों पर्वत चाहे एक-दूसरे के सामने हों; परंतु कोई भी सहजता के साथ एक पर्वत से दूसरे पर्वतपर नहीं जा सकता; क्योंकि इन दोनों पर्वतों के मध्य में महावेली गंगा नदी का बडा नदीक्षेत्र है । स्थानीय लोग तथा चिन्मय मिशन के पदाधिकारियों ने हमें बताया कि श्रीरामजी की सेना तथा रावण की सेना के मध्य यहां पहला युद्ध आरंभ हुआ । रावणबोड पर्वत में रावण ने अपनी मायावी शक्ति से अनेक सुरंगमार्ग बनाकर अपने सेना के छिपने के लिए प्रबंध किया था । रावण की सेना ने अनेक दिनोंतक इस प्रदेश में रहकर मायावी युद्ध किया था । सबसे आश्‍चर्य की बात यह कि रावणबोडा पर्वत की ओर देखनेपर वहां हनुमानजी सोए हुए हैं, ऐसा स्थानीय लोगों ने हमें बताया । (छायाचित्र देखें ।)

 

३. गायत्रीपीठ : संत ‘मुरुगेसू सिद्धर्’ द्वारा स्थापित तथा
‘श्रीलंकाधीश्‍वर’ नामक शिवजी तथा गायत्रीदेवी के मंदिरवाला आश्रम

श्रीलंका का नगर ‘नुवारा एलिया’ में ‘श्रीलंकाधीश्‍वर’ नामक शिवजी का मंदिर

‘नुवारा एलिया’ नगर के एक क्षेत्र में वर्ष १९७० में मुरुगेसू सिद्धर् नामक संत द्वरा स्थापित किया हुआ ‘गायत्रीपीठ’ नामक एक आध्यात्मिक आश्रम है । इस आश्रम के अंदर ‘श्रीलंकाधीश्‍वर’ नामक शिवजी का मंदिर तथा गायत्रीदेवी का मंदिर (छायाचित्र क्र. १ देखें ।) है । ऐसा कहा जाता है कि गायत्रीपीठवाली यह भूमि रावणपुत्र मेघनादकी तपश्‍चर्या भूमि है । श्रीराम-लक्ष्मण के साथ युद्ध के लिए जाने से पहले रावणपुत्र मेघनाद तपश्‍चर्या करने बैठता है । वह भगवान शिवजी की उपासना करता है । युद्ध में जाने से एक दिन पहले शिवजी जहां प्रकट हुए थे, उसी स्थानपर आज का श्रीलंकाधीश्‍वर मंदिर है ।

 

४. नर्मदा नदी से किसी अज्ञात द्वारा चोरी कर जर्मनी ले जाए हुए १०८
बाणलिंगों को संत ‘मुरुगेसू सिद्धर्’ द्वारा श्रीलंका लाकर उनको गायत्रीपीठ में रखा जाना

गायत्री पीठ के संस्थापक संत मुरुगेसू सिद्धर्जी को उनके जर्मनी स्थित भक्तों से यह जानकारी मिली कि नर्मदा नदी से अज्ञात व्यक्तिद्वारा १०८ बाणलिंगों को चुराकर जर्मनी ले जाया गया है । इसके पश्‍चात संत मुरुगेसू सिद्धर् ने इन सभी बाणलिंगों को श्रीलंका लाकर उन्हें गायत्रीपीठ में रखा ।

 

५. संत मुरुगेसु सिद्ध की समाधि

गायत्रीपीठ के संस्थापक संत ‘मुरगेसू सिद्ध’ की समाधी

वर्ष २००७ में मुरुगेसु सिद्धर्जी ने अपना शरीर त्याग दिया । इस स्थानपर उनकी समाधि का निर्माण किया गया है । (छायाचित्र क्र. २ देखें ।) संत मुरुगेसू महर्षि द्वारा महासमाधि लेने से आगे जाकर उनके भक्त इन बाणलिंगों की प्रतिष्ठापना करनेवाले हैं । इस स्थानपर मुरुगेसू महर्षिजी को सिद्धों द्वारा, साथ ही हिमालय के तपस्वियों द्वारा प्राप्त बहुमूल्य वस्तुआें का जतन किया गया है ।

– श्री. विनायक शानभाग, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (१२.६.२०१८)

६. हनुमानजी के रामभक्ति की महानता !

श्रीलंका के रामबोडा तथा रावणबोडा इन पर्वतोंपर श्रीरामजी की वानरसेना तथा रावणासुर की मायावाी सेना के मध्य ६ मासोंतक (महिने) युद्ध चला । इस युद्ध में एक बार श्रीरामजी तथा लक्ष्मण मूर्च्छित हो जाते हैं, तब जांबुवंत बिभीषण के पास आकर कहते हैं,

तस्मिञ्जीवति वीरे तु हतमप्यहतं बलम् ।
हनूमत्युज्झितप्राणे जीवन्तोऽपि वयं हताः ॥
– वाल्मीकिरामायण, कांड ६, सर्ग ६१, श्‍लोक २२

अर्थ : यदि श्रीरामजी की सभी सेना मृत हो गई, तब भी श्रीरामजी की सेना जीवित है; परंतु यदि हनुमानजी ने अपना शरीर त्याग दिया, तो हम सभी जीवित होते हुए भी मरने के समान हैं । इससे श्रीरामभक्त हनुमानजी की महानता ध्यान में आती है । ‘भक्त अपनी भक्ति के बलपर युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है’, इसकी शिक्षा देनेवाले हनुमानजी के चरणों में तथा रामायण करवानेवाले श्रीमन्नारायणजी के अवतार श्रीरामजी के चरणों में हम सभी साधक नतमस्तक हैं ।

साधक द्वारा शरणागत भाव से की गई प्रार्थना : ‘हे हनुमानजी, आनेवाले भीषण संकटकाल में हम सनातन के सभी साधकों के लिए आप जैसी रामभक्ति संभव हो, यही आपके चरणों में प्रार्थना है !’

– श्री. विनायक शानभाग, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (१२.६.२०१८)

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात