‘मनुष्य जन्म दुर्लभ है । विविध स्वरूपों से भगवान बताते हैं कि ‘मनुष्यजन्म लेकर ईश्वरप्राप्ति करनी है’ । मनुष्य देह एक यंत्र है । ‘मैं जीवित हूं’ ये भान निरंतर रखकर जीवन जीना होता है । भगवान ने मनुष्य जन्म ईश्वरप्राप्ति के लिए दिया है । इसलिए भगवान ने इस सृष्टि का निर्माण किया है । इस सृष्टि में व्याप्त भगवान के चैतन्य का आनंद लेकर जीवन को सार्थक बनाने के लिए गुरु के मार्गदर्शन में साधना सीखकर उसके अनुसार कर्म करना चाहिए ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा निर्मित ‘गुरुकृपायोग’ यही बताता है । इस मार्ग से की गई साधना से ईश्वरप्राप्ति शीघ्र की जा सकती है । इस माध्यम से अब तक (वर्ष २०२५ तक) १३२ साधक संत पद पर आरुढ हुए और १०४९ से अधिक साधक संत बनने के मार्ग पर हैं ।
इस संदर्भ में श्रीमद्भागवत्, वेद, श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद इत्यादि धर्मग्रंथों में अनेक श्लोक हैं । वे आगे दिए अनुसार हैं ।
१. अनेक जन्मों के पश्चात मनुष्य का शरीर मिलता है इसलिए मनुष्य के जीवित रहने तक ही ईश्वरप्राप्ति संभव
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः ।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्र्ेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥ – श्रीमद्भागवत, स्कन्ध ११, अध्याय ९, श्लोक २९
भावार्थ : अनेकों जन्मों के पश्चात ये अत्यंत दुर्लभ मनुष्य का शरीर प्राप्त हुआ है । यह शरीर इतना महान है कि इसके जीवित रहने तक ही पुरुषार्थ की प्राप्ति हो सकती है । मूलतः ‘यह शरीर नश्वर है’, इसलिए जब तक मृत्यु उसे गिलंकृत नहीं कर लेती, तब तक बुद्धिमान मनुष्य को सतर्कता और तत्परता से अपने परम कल्याण के लिए प्रयत्न करने चाहिए । इसका कारण यह है कि विषय भोग तो सभी योनियों में प्राप्त होने ही वाला है ।
२. मनुष्यजन्म में ही परमात्वतत्त्व को समझने की जिज्ञासा रखें !
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ॥ – श्रीमद्भागवत, स्कंध २, अध्याय ९, श्लोक ३५
अर्थ : जो सदैव सभी स्थान पर व्याप्त है, वही आत्मतत्त्व है । जिज्ञासु मनुष्य यह तत्त्व ‘अन्वयव्यतिरेक’ (टिप्पणी) के माध्यम से समझ ले । -‘साप्ताहिक प्राजक्त’, धर्मयज्ञ, मार्च २०१८, स्वानुभव)
(टिप्पणी : अन्वय-व्यतिरेक न्याय दर्शन का एक तर्क-प्रकार है जिसका उपयोग कारण और कार्य के संबंध को सिद्ध करने के लिए किया जाता है । अन्वय का अर्थ है, जहां कारण होता है, वहां कार्य भी होता है, जैसे ‘‘जहां धुआं है, वहां आग है । वहीं व्यतिरेक का अर्थ है, जहां कारण नहीं होता, वहां कार्य भी नहीं होता, जैसे ‘‘जहां आग नहीं है, वहां धुआं नहीं है ।’’ इन दोनों विधियों के संयुक्त प्रयोग से हेतु और साध्य (कारण और कार्य) का संबंध निश्चित होता है ।)
३. गुरु के माध्यम से परमेश्वर को समझना, उनकी प्राप्ति करना, यही जीवन का लक्ष्य है, इसे समझ कर साधना करने से ‘ईश्वरप्राप्ति’ का ध्येय साध्य कर पाना
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ — कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, वाक्य १४
अर्थ : उठो, जागो, उत्तम पुरुषों के (गुरु के) सत्संग से परमेश्वर का स्वरूप समझ लो; इसलिए कि बुद्धिमान पुरुष कहते हैं कि (परमेश्वर को जानने का यह मार्ग तलवार की तेज धार पर चलने समान दुर्गम है ।
विवरण : इस श्लोक से ध्यान में आता है कि परमेश्वर को समझना और उनकी प्राप्ति होना, यही जीवन का लक्ष्य है । इसके लिए गुरु के माध्यम से यह समझकर उसके अनुसार साधना करने से हम ईश्वरप्राप्ति का अपना ध्येय साध्य कर सकते हैं ।
४. यमराज द्वारा नचिकेत को बताना कि ‘सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्राप्त करना’, यही मानव का ध्येय है !
एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ – कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली २, वाक्य १३
अर्थ : इस धर्मतत्व का श्रवण कर, उसे योग्य प्रकार से ग्रहण कर, विचारपूर्वक इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को नश्वर मनुष्य समझ लेता है और आनंदस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कर वो आनंदमग्न हो जाता है । इस कारण हे नचिकेत ! मैं यह मानता हूं कि तुम्हारे लिए परमधाम के द्वार खुले हैं ।
विवरण : नचिकेत (संसार का प्रथम जिज्ञासु) जब यमराज के पास जाता है, तब यमराज भी नचिकेत को यही बताते हैं कि, ‘सच्चिदानंदघन (टिप्पणी) परमात्मा को प्राप्त करना, यही मानव का ध्येय है; कारण यह कि परमेश्वर में आनंद है । वे आनंदमय हैं । प्रत्येक जीव में उनका ही अस्तित्व है । इसीलिए मानव को लगता है कि उसे आनंद मिलता रहे; परंतु भ्रम के कारण प्रत्येक मानव आनंद को प्राप्त नहीं कर पाता । इसलिए गुरु की आवश्यकता है । वे ही योग्य मार्ग दिखानेवाले हैं ।
टिप्पणी : सच्चिदानंदघन : १. ‘सत्’ अर्थात ‘सत्य ।’ ‘चित्’ अर्थात ‘चैतन्य’ और ‘घन’ अर्थात ‘व्याप्त किया’ अथवा ‘व्याप्त ।’ ‘सच्चिदानंद’ अर्थात जो सत्य, चैतन्य और आनंद से व्याप्त है’, अर्थात ‘ईश्वर ।’
२. संस्कृत भाषा में ‘चित्’ का और भी एक अर्थ है – ‘ज्ञान’ और ‘घन’ शब्द का और भी एक अर्थ है – ‘मेघ’ अथवा ‘बादल ।’ इन अर्थों से ‘सच्चिदानंदघन’ अर्थात सत्य, ज्ञान और आनंद का मेघ’। इस अर्थ से यह विशेषण किसी सत्पुरुष के लिए प्रयोग किया जाता है ।
५. साधना कर परमात्मा में लीन होने के लिए ही मनुष्य का जन्म होना
मनसस्पत इमं नो दिवि देवेषु यज्ञम् ।
स्वाहा दिवि स्वाहा पृथिव्यां स्वाहान्तरिक्षे स्वाहा वाते धां स्वाहा ॥ – अथर्ववेद, काण्ड ७, सूक्त ९७, ऋचा ८
अर्थ : हे मननशील आत्मा और चित्त के स्वामी परमात्मा, मैंने देवताओं को अर्थात इंद्रियगणों के व्यापक यज्ञस्वरूप आत्मा को मोक्षपद में अर्पित कर दिया है । अब वह परम तेजोमय ब्रह्म में भली प्रकार आहुति देकर (अर्पण कर) उसमें लीन हो जाए, उस सर्वाधार महान ब्रह्म में वह लीन हो जाए; सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक परब्रह्म में भी वह लीन होकर प्राणरूप सर्वाधार ईश्वर में वह आत्मा लीन हो जाए ।
उपरोक्त विवरण से यह ध्यान में आता है कि मनुष्य का जन्म साधना कर ईश्वरप्राप्ति के लिए हुआ है । ईश्वर से निर्माण हुआ मानव जीव का जन्म साधना कर उसी में विलीन होने के लिए हुआ है ।’ ।
६. पिछले अनेक जन्मों के संस्कारों के बल पर प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाले योगी द्वारा इसी जन्म में सिद्धि प्राप्त कर सभी पापों से मुक्त होकर तत्काल परम गति को प्राप्त होना
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥ — श्र्ीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक ४५
अर्थ : प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी पिछले अनेक जन्मों के संस्कारों के बल पर इसी जन्म में पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर सभी पापों से मुक्त होता है और तत्काल परम गति को प्राप्त होता है ।

७. परम पद को प्राप्त होना,यह जीवन का लक्ष्य है !
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ – श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५१
अर्थ : समबुद्धि से युक्त ज्ञानी व्यक्ति कर्म से उत्पन्न होनेवाले फल का त्याग कर जन्मरूप बंधनों से मुक्त होकर निर्विकार ‘परम पद’ को प्राप्त होते हैं ।
इसीसे यह समझ में आता है कि ‘परम पद प्राप्त होना’, जीवन का लक्ष्य है ।
८. आत्मा को भगवान से जोडने से वह भगवत्परायण होकर भगवान को ही प्राप्त होना
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ – श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक ३४
अर्थ : (हे अर्जुन !) तुम मेरे भक्त बनो । अपना मन मुझ पर केंद्रित करो । मेरा ध्यान करो और मुझे नमन करो । इस प्रकार स्वयं को मुझे समर्पित कर और स्वयं को मेरे स्वाधीन कर तुम मुझे प्राप्त करोगे । इसमें कोई शंका नहीं है ।
८ अ. विवेचन और विश्लेषण
१. स्थूल शरीर और अव्यक्त सूक्ष्मातिसूक्ष्म आत्मा को जोडनेवाला मन सूक्ष्म होना
इस स्थान पर खडे हुए भगवान स्वयं कहते हैं कि, ‘मुझे प्राप्त करने के लिए (ईश्वरप्राप्ति के लिए) साधना करो । ‘इसलिए भगवान ने शरीर की रक्षा के लिए बाह्यांगों को पंचकर्मेंद्रिय और पंचज्ञानेद्रिय दी हैं । शरीर की रक्षा के लिए जितनी क्षमता चाहिए, उतनी ही इन इंद्रियों को दी गई है । अर्थात इनका कार्य सीमित है । दूसरी ओर अंतस्थ में स्थित इंद्रियां, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार – ये ४ इंद्रियां अंतर्कार्य करने के लिए दी गई हैं । इन दोनों को जोडनेवाला मन है । मन की क्षमता सबसे अधिक है । स्थूल शरीर और अव्यक्त आत्मा को जोडनेवाला मन सूक्ष्म है; कारण आत्मा सूक्ष्मातिसूक्ष्म है ।
२. आत्मा से भावपूर्ण अनुसंधान रखकर कर्म करने से ईश्वरप्राप्ति का ध्येय साध्य होकर मनुष्य को आनंद की प्राप्ति होना
आत्मा और शरीर से मन को जोडा जाता है । जैसे मन + कान = सुनना, मन + आंख = देखना, इसप्रकार । यदि किसी ने मन को आत्मा से नहीं जोडा और मन को भौतिक सुख की ओर मोड कर बाह्य इंद्रियों द्वारा कार्य करता रहा, तो वो माया से बंध जाता है और आत्मस्वरूप से विन्मुख हो जाता है । इस कारण मनुष्य जन्म का ‘ईश्वरप्राप्ति’ का ध्येय उसे प्राप्त नहीं हो सकता । उसे जीवन में आनंद नहीं मिलता और दु:ख ही भोगना पडता है । यदि आत्मा से भावपूर्ण अनुसंधान में रह कर, वही कर्म किया जाए तो मनुष्य को ‘ईश्वरप्राप्ति’ हो सकती है और उसे आनंद की प्राप्ति होती है । इसीसे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक मनुष्य को ऐसा क्यों लगता है कि ‘आनंद मिलना चाहिए’ ।
३. मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है
भगवान कहते हैं, ‘हे मनुष्य, इसलिए अपने मन को मेरे अनुसंधान में रखो । तुम्हारे शरीर को चलानेवाला मैं ही हूं इसलिए मैं ही कर्ता, माता, पिता, गुरु इत्यादि सर्वस्व हूं, तुम मेरे भक्त बनो । मेरी पूजा करो ।’ अर्थात ‘प्रत्येक कर्म करते हुए उसमें ईश्वर है’, ऐसा समझकर भावपूर्ण पूजा के समान ही पूज्य (शुद्ध, पवित्र) भाव से कर्म करो ! मेरी शरण में आओ, अर्थात अहंविरहित होकर ‘इदं न मम’ के अनुसार सर्वस्व अर्पण करो ! ऐसे करने से सदैव ही आत्मसंबंध जुडेगा और तुम पर आया रज-तम का आवरण, अर्थात स्वभावदोष और अहं का निर्मूलन होकर तुम्हारा चित्त शुद्ध होगा । इस कारण आत्मप्रकाश प्रकट होकर तुम्हें आनंद प्राप्त होगा, साथ ही परमेश्वर की प्राप्ति होगी ।’ इसलिए कहा गया है, ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।’ अर्थात मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
मनुष्य का जन्म ईश्वरप्राप्ति के लिए है । यही दृष्टि रखकर यदि शिष्य ने गुरु से ज्ञान प्राप्त किया होता, तो आज यह परिस्थिति नहीं आती । साधन करने से आत्मबल बढकर मनुष्य को जीवन का अंतिम ध्येय ‘ईश्वरप्राप्ति’ साध्य होकर उसका कल्याण हो गया होता । वातावरण में बढा हुआ रज-तम का आवरण ही नहीं रहता और मानवों के मन विकृत नहीं होते ।
९. सच्चिदानन्दघन ब्रह्म से एकरूप होनेवाले पुरुषों के लक्षण
बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्र्तिः ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ – श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक ५१ ते ५३
अर्थ : विशुद्ध बुद्धि से युक्त; हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन लेनेवाला, शब्दादि विषयों का त्याग कर शुद्ध स्थान पर एकांत में रहनेवाला, सात्त्विक धारणाशक्ति से अंतःकरण और इंद्रियों पर संयम रखकर मन, वाणी और शरीर नियंत्रण में रखनेवाला; राग-द्वेष पूर्ण रुप से नष्ट कर दृढ वैराग्य का भलिभांति आश्रय लेनेवाला; अहंकार, बल, घमंड, कामना, राग, संग्रहवृत्ति का त्याग कर सदैव ध्यानयोग में तत्पर रहनेवाला; ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष ‘सच्चिदानन्दघन ब्रह्म’ में एकरूप होने के लिए पात्र होता है ।
९ अ. विवेचन और विश्लेषण
१. साधना करने पर गुरु की कृपा से बुद्धि का ‘प्रज्ञा’ में रूपांतर होना और ‘मेधा’ अर्थात ईश्वरेच्छा सिद्ध होकर मनुष्य की ‘सच्चिदानन्दघन ब्रह्म’ की ओर यात्रा आरंभ होना
जब मन विकल्परहित होकर कार्य करता है, तब बुद्धि शुद्ध होकर ‘विवेक’ निर्माण होता है । साधना द्वारा गुरु की कृपा से आगे बुद्धि प्रज्ञा बनकर ‘मेधा’ में सिद्ध होती है । ‘मेधा’ अर्थात ईश्वरेच्छा । जब मनुष्य इस प्रकार ईश्वरेच्छा से कार्य करने लगेगा और हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करेगा, साथ ही उसके द्वारा शब्दादि विषयों का त्याग होगा, वो एकांत में रहेगा, तब उसकी सच्चिदानन्दघन ब्रह्म की ओर यात्रा आरंभ होगी । ऐसी स्थिति उसे प्राप्त हो सकती है ।
२. माया का अंत करना, अर्थात ब्रह्मस्वरूप में लीन होना और यही है ईश्वरप्राप्ति होना
एकांत अर्थात एक + अंत । (मराठी में) ‘शून्याशी फाटा काढीजे त्यासी एक (१) म्हणीजे ।’ (एकनाथी भागवत) यहां १ में ‘शून्य’ अर्थात ‘ब्रह्म’ और ‘फाटा’ अर्थात ‘माया’ है । माया कार्यकारण भाव दर्शाती है । साधना करते समय अपना लक्ष्य एकाग्रता से (एक + अग्र) सदैव ब्रह्म की ओर अर्थात शून्य की ओर होना चाहिए । इस प्रकार से किया गया कार्य भगवान को अर्पण करना भी ‘माया का अंत करने’ के समान है । ऐसा होने पर मनुष्य ब्रह्मस्वरूप में लीन होता है । यही ईश्वरप्राप्ति है; क्योंकी मूलतः सर्व निर्मिति ही चैतन्य के द्वारा होने के कारण चैतन्य के बिना कुछ भी नहीं है । इसकी प्रचीति गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने के उपरांत ही आती है ।
उपरोक्त सभी विवरणों के अनुसार ‘यह ध्यान में आता है कि मनुष्य का जन्म साधना कर ईश्वरप्राप्ति के लिए ही हुआ है ।’
– परात्पर गुरु पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल. (अप्रैल २०१८)
साधना कर गुरुकृपा से अल्प समय में समाधानी एवं आनंदी होनेवाले साधक !
मनुष्यजन्म का महत्त्व ध्यान में लेकर मनःशांति पाएं !
मनुष्यजीवन का कारण क्या है ?
आनंद कैसे प्राप्त करें ?
आनंदप्राप्ति की इच्छा क्यों होती है ?
खरा सुख कैसे प्राप्त करें ?