नागों का आध्यात्मिक महत्त्व एवं नागपंचमी

 

१. नागों की उत्पत्ति

कश्यप ऋषी एवं कद्रू से सभी नागों की उत्पत्ति हुई ।

 

२. नागों के प्रकार

२ अ. तामसिक नाग

ये नाग प्रमुखता से काले रंग के होते हैं और पाताल के नागलोक में निवास करते हैं । बडी अनिष्ट शक्तियां सूक्ष्म युद्ध में शत्रुपर विषप्रयोग करने हेतु इन नागों का शस्त्र की भांति उपयोग करते हैं । पाताल के नाग पृथ्वी के नागों की अपेक्षा लाख गुना अधिक सामर्थ्यवान और सहस्रों गुना विषैले होते हैं ।

२ आ. राजसिक नाग

ये नाग पृथ्वीपर निवास करते हैं । नागयोनी में जन्म होने से इन सागों का आचरण सर्वसाधारण नागों की भांति होता है । ये काले, नीले, कत्थई आदि रंगों के होते हैं ।

२ इ. सात्त्विक नाग

इन नागों का दैवीय होने से वे शिवलोक के पास स्थित दैवीय नागलोक में निवास करते हैं । उनका रंग पीला होता है और उनके मस्तकपर लाल अथवा नीले रंग का नागमणि होता है । सात्त्विक नाग पाताल के नागों की अपेक्षा लाख गुना अधिक सामर्थ्यवान होते हैं । विविध देवताओं ने सात्त्विक नागों को धारण कर लिया है । शिवजी के गले में वासुकी होते हैं । गणेशजी के पेट को कुंडली बनाए हुए विश्‍वकुंडलिनी के प्रतिक पीले पद्मनाभ नाग होते हैं । श्रीविष्णु शेषनाग की शय्यापर लेटते हैं । सात्त्विक नाग सिद्ध एवं ऋषिमुनियों के अधीन होते हैं । वे उनकी आज्ञा का पालन करते हैं । पीले नाग उच्च देवताओं के उपासक होने से उनके पास दैवीय बल है । उसके कारण उन्हें आशीर्वाद प्रदान करने का अर्थात संकल्प के अनुसार कार्य करने का सामर्थ्य प्राप्त है ।

 

३. पूर्वज एवं नागों का एक-दूसरे से संबंध

र्भुवलोक एवं पितृलोक में फंसे हुए पूर्वज अधिकांश रूप से काले नागों के रूप में अपने वंशजों को दर्शन कराते हैं । सात्त्विक पूर्वज पीले रंग के नागों के रूप में दर्शन एवं आशीर्वाद देते हैं । घर, संपत्ति एवं परिजनों के प्रति बहुत ही आसक्तिवले पूर्वजों को पृथ्वीपर नागयोनी में जन्म मिलता है । मनुष्य जन्म में दूसरों को कष्ट पहुंचाकर वाममार्ग से संपत्ति अर्जित करनेवाले पूर्वजों को उनके अगले जन्म में पाताल में काले नागों के रूप में जन्म मिलता है । देवता के कार्य में सहभागी तथा सज्जन प्रवृत्ति के लोग पितृलोक में निवास करने के पश्‍चात शिवलोक के पास स्थित दैवीय नागलोक में पीले नागों के रूप में वास करते हैं ।

 

४. कलियुग में मनुष्य द्वारा जहां नागों का स्थान होता था,
उन नागवनों को नष्ट किए जाने से मनुष्य को नागों के कारण उपद्रव होना

कलियुग के आरंभतक विविध स्थानों के देवताओं के लिए स्वतंत्र स्थान दिया जाता था, उदा. स्थानदेवता, ग्रामदेवता, क्षेत्रपालदेवता इत्यादि । उसी प्रकार से भारत के प्रत्येक गांव में नागों को रहने के लिए नागवन थे । यहां बडे-बडे घने वृक्ष पास-पास होतंते थे और उनके तने में बाँबी होती थी । प्रत्येक गांव के नाग वहां रहते थे । (आज भी कर्नाटक राज्य के मुल्की, सूरतकल आदि स्थानोंपर हमें नागबन देखने के लिए मिलते हैं ।) नागों को स्वतंत्र स्थान दिए जाने से वे मनुष्य को कष्ट नहीं पहुंचाते थे और वे मनुष्य और उसकी संपत्ति की रक्षा करते थे । विज्ञानयुग के मनुष्य ने अपने भौतिक विकास हेतु गांव-गांव में स्थित नागवनों को नष्ट कर वहां बडी-बडी इमारतें बनाईं । उसके कारण अब मनुष्य को नागों का उपद्रव सहन करना पड रहा है ।

– कु. मधुरा भोसले

एक साधक ने कुछ वर्ष पहले मुझे यह बताया कि केरल राज्य के कुछ स्थानोंपर इस प्रकार से नागबनों को ध्वस्त कर वहां इमारतों का निर्माण किए जाने से वहां के हिन्दुओं को नागदंश होना, स्वप्न में नाग दिखाई देना, घर में निरंतर शारीरिक अस्वस्थता होना जैसे कष्ट होते हैं ।

– कु. मधुरा भोसले, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा
स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात