सत् के मार्ग पर जब कदम रख ही दिए हैं, तो पीछे नहीं हटना; प्रसंग आने पर सत् के लिए अपने प्राण भी न्यौछावर करना है । गुरु गोविंद सिंहजी सदा-सर्वदा ऐसे विचार करनेवाले थे । गुरु गोविंद सिंहजी ने जीवनभर क्षत्रिय धर्म निभाया ।
गुरु गोविंद सिंहजी बाल्यावस्था से ही अपने साथियों के साथ ही निडरता से तीर-कमान एवं सैनिक साज समान के खेल खेलते थे । गुरु गोविंद सिंहजी को शस्त्रविद्या का विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया था ।
उस समय मुगल साम्राज्य द्वारा प्रजा पर अनगिनत अत्याचार हो रहे थे । इस अन्याय के विरुद्ध गुरु गोविंद सिंहजी ने अपनी सेना का उत्तम नेतृत्व व नियोजन कर दुष्प्रवृत्तियों का नाश किया ।
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