मनुस्मृति का विरोध करनेवाले पहले ठीक से मनुस्मृति का अध्ययन करें !

श्री. चेतन राजहंस

कुछ मास पूर्व वेदशास्त्रसंपन्न विष्णुशास्त्री बापट ने ‘सार्थ श्रीमनुस्मृति’ इस नए नाम से मनुस्मृति का मराठी में भाषांतर कर उसका लोकार्पण किया था । उस समय राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधायक तथा जातिवादी नेता जितेंद्र आव्हाड ने धमकी देते हुए कहा था कि यह ग्रंथ जिस दुकान में बिक्री के लिए होगा, हम उस दुकान को तोड देंगे । अब २४ दिसंबर को राष्ट्रवादी कांग्रेस के ही अन्य एक नेता छगन भुजबळ ने वैजापुर के समता परिषद के सम्मेलन में मनुस्मृति का दहन किया । इस दृष्टि से धर्मग्रंथ ‘मनुस्मृति’ के विषय में सनातन का दृष्टिकोन निम्न प्रकार से है ।

– श्री. चेतन राजहंस, राष्ट्रीय प्रवक्ता, सनातन संस्था 

१. धर्मग्रंथ ‘मनुस्मृति’ पर यदि प्रतिबंध होगा, तो वह संपूर्णरूप से अयोग्य है । भारतीय संविधान बनने से सहस्रों वर्ष पूर्व से मनुस्मृति थी । मनुस्मृति में विद्यमान मार्गदर्शन के अनुसार ही राज्यव्यवस्था का अस्तित्व था ।

२. प्रसिद्ध कोलकाता कुरआन पिटीशनपर निर्णय देते हुए कोलकाता उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि कुरआन में विद्यमान कुछ वाक्य २ समुदायों में तनाव उत्पन्न कर सकते हैं; परंतु यह धर्मग्रंथ अर्वाचीन होने से उसपर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता । यही न्याय अन्य धर्मग्रंथों को भी लागू होता है । अतः यदि इस प्रकार से प्रतिबंध हो, तो हम उसके विरुद्ध न्यायालय में जाएंगे ।

३.  वर्ष १७९४ में विल्यम जोन्से नामक अंग्रेज ने मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया । जर्मन तत्त्ववेत्ता नित्शेपर मनुस्मृति का विलक्षण प्रभाव दिखाई देता है । वह कहता है कि बाईबल बंद कर मनुस्मृति खोलें । राज्य शासन द्वारा प्रकाशित विश्‍वकोष में ही यह जानकारी दी गई है ।

४. मनु जन्म से ब्राह्मण थे, ऐसा पूर्वग्रह रखकर ब्राह्मणद्वेष के कारण उनके नाम से कुछ लोग उधम मचाते हैं । वास्तव में मनु ब्राह्मण नहीं थे, वे इक्ष्वाकु वंश के अर्थात प्रभु श्रीरामचंद्रजी जिस वंश के थे, उस वंश के क्षत्रिय थे, इसे सभी को ध्यान में लेना चाहिए ।

५. मनुस्मृति एक हिन्दू धर्मग्रंथ है, जिसे पढकर आज कोई उसके अनुसार आचरण नहीं करता । इसलिए उसके विरोध का कोई औचित्य नहीं है ।

६. जिस जातिवादी होने के विषय में मनुस्मृति को दोषी प्रमाणित किया जाता है, उस मनुस्मृति में किसी जातिवाद का उल्लेख भी नहीं है।

७. मनुजी ने कभी ‘दलित’ शब्द का प्रयोग नहीं किया । सबसे पहले अंग्रेजों ने ‘तोडो और राज्य करो’, इस अपनी नीति के अंतर्गत इस शब्द की उत्पत्ति की । किसी भी धर्मग्रंथ में ‘दलित’ शब्द का उल्लेख नहीं है ।

८. महर्षि मनुजी ने बताया है, ‘जन्मना जायते शूद्रः ।’ अर्थात कोई व्यक्ति जन्म से ही शूद्र होता है और उसके पश्‍चात वह स्वयं में विद्यमान गुण-कर्मों के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र प्रमाणित होती है । यदि किसी ब्राह्मण की संतति गुण-कर्मों के अनुसार ब्राह्मण नहीं होती, तो उसे शूद्र प्रमाणित किया जाता है, साथ ही यदि शूद्र की कोई संतति भी गुण-कर्मों के अनुसार ब्राह्मण और क्षत्रिय प्रमाणित की जाती है । इसका उदाहरण ही देना हो, तो मत्स्यगंधा का पुत्र व्यास अपनी तपश्‍चर्या के कारण महर्षि व्यास बन गए । विश्‍वामित्र, तो पहले क्षत्रिय थे; किंतु साधना कर वे ऋषी बन गए । डाके डालनेवाला वाल्या कोली तपश्‍चर्या कर वाल्मिकि ऋषी बन गए । ऐसे बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं ।

९. आज भी शासन-प्रशासन में चार वर्गों के अनुसार ही अधिकारियों का स्तर निर्धारित किया जाता है । आज भी अनेक क्षेत्रों में गुण-कर्मों के अनुसार ही वर्गीकरण किया जाता है, उसका हम स्वीकार करते हैं, तो जो धर्मग्रंथ में लिखा गया है, वह स्वीकार्य क्यों नहीं है ?

१०. महर्षि मनुजी ने वेदों का अध्ययन कर विधि-व्यवस्था तथा न्यायतंत्र को स्थापित करने हेतु मनुस्मृति ग्रंथ लिखा । आज भी कई वर्ष पहले से राजस्थान के न्यायालय के बाहर महर्षि मनुजी की मूर्ति खडी है ।

११. गुंडागर्दी की भाषा बोलनेवाले जितेंद्र आव्हाड पहले मनुस्मृति का अध्ययन करें !

विधायक जितेंद्र आव्हाड ने मनुस्मृतिपर आधारित ग्रंथ का विक्रय करनेवाली दुकानों को तोडने की धमकी दी थी । क्या आव्हाड ने ऐसा करने से पहले मनुस्मृति पढी है ? यदि नहीं पढी हो, तो उन्हें पहले उसे पढना चाहिए और उसका अध्ययन करना चाहिए ।

१२. मनुस्मृति का क्रय करनेवाली दुकानों को तोडने की भाषा बोलना संविधान तथा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का अनादर !

भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने मनुस्मृति जलाई थी, इसका संदर्भ देते हुए दुकानों को तोडने की धमकी देनेवालों को पहले क्या डॉ. आंबेडकर ने संविधान में तोडफोड करने को स्वीकृति दी है ?, इसका अध्ययन करना चाहिए । आव्हाड की इस गुंडोंवाली भाषा को देखते हुए महाराष्ट्र का कितना राजनीतिक अधःपात हुआ है, यह ध्यान में आता है । हम संविधान के पालनकर्ता तथा विधि का पालन करनेवाले हैं । यदि आव्हाड दुकानों की तोडफोड कर वहां के ग्रंथों को हानि पहुंचाते, तो हम आव्हाड के विरुद्ध धर्मग्रंथों का अनादर करने के प्रकरण में संविधान में प्रबंधित धारा २९५ अ के अंतर्गत अपराध प्रविष्ट किया होता । स्वयं को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयायी कहलानेवाले लोग स्वयं ही कानून-व्यवस्था को तोडनेकी भाषा कर संविधान का और डॉ. आंबेडकर का अनादर कर रहे हैं ।

१३. अब आप ही अभिव्यक्ति कर स्वतंत्रता को छीन रहे हैं, उसका क्या ?

नथुराम गोडसेपर आधारित नाटक को तोड देनेवाले आव्हाड जेएन्यु में आतंकी अफजल का समर्थन करनेवाले कन्हैय्याकुमार का समर्थन कर डॉ. आंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान का उल्लंघन करते हैं; इसलिए वास्तविक संविधानद्रोही वहीं हैं । कश्मीर में हिन्दुओं का हत्याकांड किया गया और उन्हें वहां से पलायन करना पडा । इस विषय में एक बार भी न बोलनेवाले आव्हाड ने इस्राईल द्वारा गाजापट्टीपर आक्रमण करने के कारण मुसलमानों के प्रति अपनी सहानुभूति को दर्शाने के लिए ‘सेव गाजा’ का टी-शर्ट पहना था । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नामपर आप जो चाहे कर सकते हैं, तो मनुस्मृति ग्रंथ का वितरण करनेवाले अथवा नथुराम गोडसेपर आधारित नाटक प्रस्तुत करनेवालों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आप छीन रहे हैं, उसका क्या ?

१४. आतंकी इशरतजहां का समर्थन करनेवाले आव्हाड को यह बताना चाहिए कि इशरत ने कौनसी मनुस्मृति पढी थी; इसलिए वह आतंकी बन गई ।

१५. जिस धर्मग्रंथ का संदर्भ देकर हिंसा होती है, आतंकवाद फैलता है और बलात्कार किए जाते हैं, ऐसे अन्य धर्मियों के धर्मग्रंथोंपर प्रतिबंध लगाने के विषय में ये लोग एक शब्द भी नहीं बोलते ।

१६. मुसलमान एवं ईसाईयों ने हिन्दुओं के साथ अत्याचार किए; क्या इसलिए अब उनका उत्पीडन किया जाए ?

प्राचीन काल में कुछ कर्मठ ब्राह्मणों ने कुछ अयोग्य परंपराओं को स्थापित कर समाज का वातावरण भले ही दूषित बनाया गया हो; परंतु अब वह स्थिति नहीं रही । अतः अब ब्राह्मणों को ऐसा कहना कि आपके पूर्वजों ने हमें बहुत कष्ट दिया है; इसलिए हम आपको कष्ट दे रहे हैं, ऐसा कहना कितना उचित है ? यदि यही न्याय लगाना हो, तो प्राचीन काल में ७वीं शताब्दी से लेकर अंग्रेजों का शासन आनेतक मुसलमान आक्रांतों ने हिन्दुओं के साथ अमानवीय अत्याचार किए, अंग्रेजों ने १५० वर्षोंतक भारतीयों के साथ अमानवीय अत्याचार किए; इसलिए आज मुसलमान और ईसाईयों को आपके पूर्वजों ने हमें कष्ट दिया है; इसलिए अब हम आपको कष्ट देंगे, ऐसा कहते हुए कोई हिन्दू नहीं दिखाई देता ।

१७. ‘नैनं दहति पावकः ।’

किसी ग्रंथ को जलाने से उसमें विद्यमान विचार नहीं जल जाते ।’ इसका अर्थ मनुस्मृति एक ऐसा ग्रंथ है, जिसे अग्नि नहीं जला सकती । इसलिए उसे जलाने से अथवा फाड देने से उसमें विद्यमान विचार नहीं मिटेंगे; क्योंकि मनुस्मृति में अग्नि की भांति जीवन के लिए आवश्यक तत्त्व होने से कोई बाहरी आग उसमें विद्यमान इस तत्त्व को जला नहीं सकती । मनुस्मृति में विद्यमान तत्त्वज्ञान परमश्रेष्ठ, अविनाशी और वंदनीय है, इसे विरोधियों को ध्यान में रखना चाहिए ।