अनुक्रमणिका
- १. व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण पुनःपुन: आने के कारण
- २. व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण आने से व्यक्ति की होनेवाली हानि
- ३. दिनभर में कितनी बार आवरण निकालें ?
- ४. आवरण निकालने की पद्धति
- ५. अपने पर आया कष्टदायक शक्ति का आवरण नियमितरूप से निकालें !
- ६. अमावास्या एवं पूर्णिमा पर आंखों पर आवरण आने से हमारा कष्ट न बढे, इसलिए उसे तुरंत ही दूर करें !

१. व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण पुनःपुन: आने के कारण
१ अ. कालमहिमानूसार होनेवाला अनिष्ट शक्तियों का कष्ट
कालमहिमानुसार वर्तमान में सूक्ष्म के आपातकाल में कुल मिलाकर अनिष्ट शक्तियों का कष्ट बढने से व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण पुनःपुन: आता रहता है ।
१ आ. प्रारब्धानुसार होनेवाले अनिष्ट शक्तियों का कष्ट
इससे भी व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण आता है ।
१ इ. व्यक्ति में स्वभावदोष एवं अहं
१ इ १. स्वभावदोषों के कारण व्यक्ति की मनोदेह में सूक्ष्म घाव निर्माण होते हैं । सूक्ष्म घावों से रज-तमात्मक स्पंदन निर्माण होते हैं । इन रज-तमात्मक स्पंदनों के कारण अनिष्ट शक्तियों तुरंत ही उस व्यक्ति की ओर आकर्षित होने से व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण आता है ।
१ इ २. अहं अनेक स्वभावदोषों का मूल है; इसलिए स्वभावदोषों समान अहं भी अनिष्ट शक्तियों के कष्ट के लिए कारणीभूत होता है ।
२. व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण आने से व्यक्ति की होनेवाली हानि
२ अ. विविध शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्ट होना अथवा कष्ट का बढ जाना
व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण आने से उसे ‘न सूझना, मन अस्वस्थ होना, मन में नकारात्मक विचार आना, निरुत्साह लगना, ‘नामजप करने का मन न होना, उपायों का परिणाम न होना’, इत्यादि कष्ट होते हैं । कभी-कभी शरीर के किसी भाग में वेदना होना, पित्त होना, ऐसे कष्ट भी हो सकते हैं । व्यक्ति पर आवरण आने से उसे पहले ही से जो कष्ट हैं, वे और बढ जाते हैं ।
२ आ. नामजपादि आध्यात्मिक उपायों का विशेष लाभ न होना
व्यक्ति पर कष्टदायक आवरण आया हो, तो उसे शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक कष्टों के निर्मूलन के लिए कितना भी समय नामजपादि उपाय करे, तब भी आवरण के कारण उन उपायों के सात्त्विक स्पंदन उस तक उतनी मात्रा में नहीं पहुंचते और इससे उसके कष्टों का निवारण शीघ्र नहीं होता ।
२ इ. साधना का चैतन्य भी उतनी मात्रा में ग्रहण नहीं होता
३. दिनभर में कितनी बार आवरण निकालें ?
व्यक्ति पर दिनभर में बीच-बीच में आवरण आते ही रहता है । इसलिए व्यक्ति को सामान्यत: प्रत्येक घंटे में एक बार तो आवरण निकालना चाहिए ।
४. आवरण निकालने की पद्धति
४ अ. आवरण निकालने के संबंध में सामाईक सूचना
४ अ १. आवरण निकालने से पहले गुरु अथवा उपास्यदेवता से भावपूर्ण प्रार्थना करें कि ‘मुझ पर से आवरण ठीक से निकल जाए ।’
४ अ २. आवरण निकालते समय उपास्यदेवता अथवा त्रासनिवारण के लिए उपयुक्त देवता का नामजप करें ।
४ अ ३. आवरण निकालते समय आंखें खुली रखें ।
४ अ ४. अपने हाथों से अथवा सात्त्विक उत्पादन व वस्तुओं की सहायता से आवरण निकालें ।
४ अ ४ अ. अपने हाथों से आवरण किसे निकालना चाहिए ?
स्वयं को मंद अथवा मध्यम कष्ट हो तो अपने हाथों से आवरण निकालें । हाथों से आवरण निकालते समय उंगलियों से प्रक्षेपित हो रही प्राणशक्ति के कारण आवरण दूर होने में सहायता होती है । ऐसे व्यक्तियों को सात्त्विक उत्पादन अथवा वस्तुओं की सहायता से आवरण निकालने में कोई अडचन नहीं है ।
४ अ ४ आ. सात्त्विक उत्पाद एवं वस्तु की सहायता से आवरण कौन निकाले ?
स्वयं को तीव्र आध्यात्मिक कष्ट हो रहा हो, तब सात्त्विक उत्पाद अथवा वस्तु (उदा. प्रज्वलित न की हुई सात्त्विक उदबत्ती, सात्त्विक लघुग्रंथ, नियतकालिक ‘सनातन प्रभात’, मोरपंख) की सहायता से आवरण निकालें । सात्त्विक उत्पाद अथवा सात्त्विक वस्तुओं की अच्छी शक्ति से शरीर पर आवरण दूर होने में सहायता होती है ।
४ अ ५. आवरण शरीर के कौन से भाग से निकालें ?
अ. सहस्रारचक्र से स्वाधिष्ठानचक्र तक आवरण निकालें ।
आ. सिर से गला, इस भाग में आवरण आने की मात्रा अधिक होती है । इसलिए इस भाग में सामने से, ऊपर से और पीछे से आवरण निकालें ।
इ. शरीर के उस अवयव में जहां वेदना हो रही है अथवा विकारग्रस्त इंद्रिय के चारों ओर भी आवरण निकालें ।
४ अ ६. आवरण निकालने की कृति प्रत्येक बार लगभग ५ मिनट तो करें ।
४ अ ७. आवरण निकालने के पश्चात उपास्यदेवता के प्रति भावपूर्ण कृतज्ञता व्यक्त करें ।
४ आ. सनातन के आश्रम में रहनेवाले साधकों के आवरण निकालने की पद्धति
सनातन के आश्रम और सेवाकेंद्र के साधक ध्यानमंदिर, संत पहले रह रहे कक्ष इत्यादि स्थान पर बैठकर नामजपादि उपाय करने से वहां की सात्त्विकता के कारण साधकों के अपने शरीर पर से निकाला गया कष्टदायक आवरण वातावरण में न फैलते हुए तुरंत ही नष्ट हो जाता है । इसलिए समीप बैठे हुए साधकों को उस कष्टदायक शक्ति का कष्ट नहीं होता और आश्रम एवं सेवाकेंद्र के स्थान पर अथवा कक्षों में भी काफी सात्त्विकता होती है । इससे वहां भी आवरण निकालते समय पास में बैठे हुए साधकों को उन कष्टदायक शक्तियों का कष्ट नहीं होता ।
४ इ. घर पर रहनेवाले साधकों के आवरण निकालने की पद्धति
४ इ १. आवरण निकालने से पहले कक्ष में सात्त्विक उदबत्ती और संतों की आवाज में भजन लगाएं ।
४ इ २. आवरण निकालते समय संभव हो तो कक्ष में अकेले बैठें ! : यदि यह संभव न हो, तो दो व्यक्तियों में कम से कम ५ – ६ फुट का अंतर रखें । इतना अंतर रखने से आवरण निकालने की कृति से निकली हुई कष्टदायक शक्ति का दूसरे व्यक्ति को कष्ट नहीं होगा ।
४ इ ३. आवरण निकालने के पश्चात सात्त्विक उदबत्ती की सहायता से वास्तुशुद्धि करें ! : वास्तु के प्रत्येक कक्ष में दाएं से बाएं, इस मार्ग से, साथ ही दीवार के किनारे-किनारे घूमते हुए वास्तुशुद्ध करें । तदुपरांत वह उदबत्ती कक्ष में ही लगाकर रखें । इससे वास्तु में कष्टदायक शक्ति फैली होगी तो वह नष्ट हो जाएगी ।
४ इ ४. कक्ष में लगाई संतों की आवाज में भजन कुछ समय तक शुरू ही रखें ।
(अधिक जानकारी के लिए पढें : सनातन के ग्रंथ ‘विकार-निर्मूलन हेतु प्राणशक्ति (चेतना) प्रणालीमें अवरोध कैसे ढूंढें ?’ और ‘प्राणशक्ति प्रणालीमें अवरोधोंके कारण उत्पन्न विकारोंपर उपचार’)
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
५. अपने पर आया कष्टदायक शक्ति का आवरण नियमितरूप से निकालें !

‘वर्तमान में साधकों को आध्यात्मिक कष्ट होने पर उन्हें नामजपादि उपाय बताते समय ऐसे ध्यान में आया है कि वातावरण की अनिष्ट शक्तियां साधकों के आज्ञाचक्र एवं अनाहतचक्रों पर बारंबार आवरण ला रही हैं । यह आवरण इतना बढ जाता है कि फिर वह सिर से लेकर छातीतक कंबल ओढने समान लगता है । इससे साधकों को ‘न सूझना, मन अस्वस्थ होना, निरुत्साह, नामजप करने का मन न करना, उपायों का परिणाम न होना’, ऐसे कष्ट हो रहे हैं । साधकों को सिर पर अथवा छाती पर दाब प्रतीत हो रहा हो, तो प्रथम उस विशिष्ट स्थान का अथवा छाती से सिर तक शरीर के भाग का आवरण निकालें । साधक निर्धारित समय पर इत्र और कपूर के उपाय करते हैं, तब वे अपना आवरण भी निकालें । आवरण निकालने के लिए १ – २ मिनट ही लगते हैं ।
अपना आवरण हाथ से अथवा सनातन प्रभात नियतकालिक से निकाल सकते हैं । हाथ की उंगलियों से आवरण निकालने का लाभ यह है कि हमारे हाथों की उंगलियों से अविरत जो प्राणशक्ति प्रक्षेपित होती रहती है, वह प्राणशक्ति भी हमें मिलती है । सनातन प्रभात नियतकालिक सात्त्विक होने से उससे भी आवरण निकलता है । हम पर कष्टदायक शक्ति का आवरण नियमितरूप से निकालने पर आध्यात्मिक कष्ट बहुत कम हो जाता है ।’
६. अमावास्या एवं पूर्णिमा पर आंखों पर आवरण आने से हमारा कष्ट न बढे, इसलिए उसे तुरंत ही दूर करें !
‘अमावास्या एवं पूर्णिमा पर अनिष्ट शक्तियों का कष्ट बढ जाता है । इसलिए वातावरण में कष्टदायक शक्ति की मात्रा अधिक होती है । हमें पंचज्ञानेंद्रियों में से आंखों द्वारा देखकर सर्वाधिक मात्रा में सभी बातों का आकलन होता है । इसलिए वे दिखाई देनेवाले दृश्यों के अच्छे अथवा बुरे स्पंदनों से प्रभारित होती हैं । अमावास्या एवं पूर्णिमा पर वातावरण में कष्टदायक शक्ति की मात्रा अधिक होने से हमारी आंखें उन सूक्ष्म कष्टदायक स्पंदनों से प्रभारित होती हैं, अर्थात उन पर कष्टदायक (काली) शक्ति का आवरण आता है । इसलिए आंखों में भारीपन लगना, नींद आना, अंधेरा छाना इत्यादि कष्ट होते हैं । हम यदि आंखों पर से कष्टदायक स्पंदन समय-समय पर नहीं निकालेंगे, तो कष्टदायक शक्ति शरीर में प्रवेश करके कुंडलिनीचक्रों को प्रभारित करती है, इसके साथ ही आगे शरीर के अन्य अवयवों पर भी आवरण आ जाता है; इसीलिए अमावास्या एवं पूर्णिमा पर हमारा कष्ट न बढे, इसके लिए आंखों पर आवरण आया प्रतीत हो, तो तुरंत उसे निकालना आवश्यक है ।’
– (सद्गुरु) डॉ. मुकुल गाडगीळ, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.
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