संकलनकर्ताओंका वैज्ञानिक दृष्टिकोण

इस जालस्थलपर उपलब्ध जानकारीमें कोई भी विषय ‘संविधानके अनुच्छेद ५१ अ’ के अनुसार पाठकके ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’में बाधा लाने हेतु नहीं लिखी गई है । संविधानके अनुच्छेद २५ में व्यक्तिको धर्मपालन एवं धर्मप्रसारका अधिकार दिया गया है । न्यायालयके अनेक न्यायिक निर्णयोंसे यह स्पष्ट हुआ है कि धार्मिक भावना सतही रूपमें कैसी भी लगे, तब भी उसमें हस्तक्षेप करनेका अधिकार शासन अथवा न्यायालयको नहीं है । यह हस्तक्षेप केवल तभी किया जा सकता है जब सामाजिक शांति, नैतिकता तथा स्वास्थ्यपर कोई संकट आए । प्रस्तुत जालस्थलका उद्देश्य इन तीनोंको बाधित करनेका नहीं है; अपितु अपने संवैधानिक अधिकार का उपयोग कर अध्यात्मका अभ्यास करने तथा धर्माचरण सिखानेके लिए लिखा गया है । श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करनेपर धर्मसंबंधी विविध अनुभव (अनुभूति) होते हैं, यह आजतकका इतिहास है । धर्म और श्रद्धा व्यक्तिगत विषय हैं । प्रस्तुत जालस्थलमें दिए अनुभव भी व्यक्तिगत ही हैं । अतएव न तो वे सभीके लिए लागू होंगे और न ही सभीको वैसा ही अनुभव होगा । इस जालस्थलका उद्देश्य समाजमें अंधश्रद्धा फैलाना अथवा चिकित्सकीय उपचार / वैज्ञानिक दृष्टिकोणका विरोध करना नहीं है । पाठक कृपया ध्यानपूर्वक एवं जांच- परखकर इस जालस्थलका अभ्यास करें । – संकलनकर्ता

 

जालस्थलमें उपयोग की गर्इं कुछ आध्यात्मिक परिभाषाओंका अर्थ

आध्यात्मिक उपाय

किसीके मनमें बहुत विचार आ रहे हों, मन एकाग्र न हो रहा हो, मानसिक दृष्टिसे अस्वस्थता अथवा अशांत लग रहा हो, तब जप, ध्यान-धारणा, प्राणायाम, मंत्रजप, प्रार्थना आदि आध्यात्मिक कृत्य करनेपर अथवा वैसा करनेके लिए किसी उन्नत साधक अथवा संतकी सहायता लेनेपर अथवा उनके सान्निध्यमें जप करनेपर साधकका मन स्थिर अथवा प्रसन्न होता है । इन आध्यात्मिक कृत्योंको ‘आध्यात्मिक उपाय’ कहा जाता है । जालस्थलमें दिए प्रतिशत : प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजीने (संकलनकर्ताने) जिज्ञासुओंको अध्यात्म का विषय वैज्ञानिक परिभाषामें समझाने हेतु इस जालस्थलमें कुछ स्थानोंपर विविध घटकोंकी मात्रा प्रतिशतमें दर्शाई है, उदा. थोडा, मध्यम व अधिकको उन्होंने अपने परिमाण के अनुसार क्रमशः १ से ३० प्रतिशत, ३१ से ६० तथा ६१ से १०० प्रतिशत कहा है ।

 

‘काली शक्ति’ एवं तत्सम शब्द

इस जालस्थलपर उपलब्ध जानकारीमें ‘काली शक्ति एवं कष्टप्रद / मायावी / अनिष्ट शक्ति’ जैसे सर्व शब्द धर्मग्रंथोंमें (उदा. श्रीमद्भगवद्गीतामें) वर्णित ‘तम’ अथवा ‘तमोगुण’के अर्थमें, जबकि ‘काला आवरण तथा काली तरंगें / स्पंदन / कण’ जैसे शब्द ‘तमोगुणका आवरण एवं तमोगुणी तरंगें / स्पंदन / कण’के अर्थमें प्रयुक्त किए गए हैं । ‘तम’ इस संस्कृत शब्दका अर्थ ‘अंधकार’ होता है । अंधकार काला होनेके कारण ‘तम’ अथवा ‘तमोगुण’को काला संबोधित किया एवं दर्शाया गया है ।

 

साधकोंको प्राप्त ज्ञान, उनकी आध्यात्मिक प्रतिभा जागृत होनेकी अनुभूति !

सनातनके कुछ साधक अनेक वर्षोंसे साधना (तप) कर रहे हैं; इसलिए उनकी आध्यात्मिक प्रतिभा जागृत हो गई है और उन्हें विविध विषयोंपर ‘ज्ञान’ प्राप्त हो रहा है । यह अनुभूति ही है । अनुभूति होनेका धर्मशास्त्रीय आधार है –

ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते । – पातञ्जलयोगदर्शन, पाद ३, सूत्र ३६

अर्थ : आत्मसंयमसे (योगाभ्याससे) जागृत हुए प्रतिभासामर्थ्यके कारण सूक्ष्म व्यवहित (छुपी हुई) अथवा अतिदूरकी वस्तुओंका ज्ञान होना (अंतर्दृष्टि प्राप्त होना), दिव्य (दैवी) नाद सुनाई देना, दिव्य स्पर्शका बोध होना, दिव्य रूप दिखाई देना, दिव्य रसका आस्वादन कर पाना तथा दिव्य गंधकी अनुभूति होना, ऐसी सिदि्ध प्राप्त होती है ।

विश्लेषण : सनातनके कुछ साधकों तथा कुछ अन्य साधकों द्वारा श्लोकमें वर्णित विषयसंबंधी चिंतन किए बिना ही उस विषयमें प्रतिभा जागृत होकर ज्ञान स्फुरित होना, दिव्य नाद सुनाई देना, सूक्ष्म रूप (सूक्ष्म-चित्र) दिखाई देना इत्यादि विविध प्रकारकी अनुभूतियां हो रही हैं । इससे सिद्ध होता है कि साधकोंको स्फुरित ज्ञान हो अथवा योगाभ्याससे साधकोंकी जागृत अंतर्दृष्टि, दोनोंका धर्मशास्त्रीय आधार है ।

 

ज्ञान प्राप्तकर्ता साधकोंकी नम्रता !

इस संदर्भमें ‘यह ज्ञान मेरा नहीं; साक्षात ईश्वरीय ज्ञान है’, ऐसा संबंधित साधकोंका भाव रहता है । अहंकार न बढे, इसके लिए वे ज्ञानके लेखनके अंतमें अपना नाम न लिखकर अपनी आस्थाके केंद्रका नाम लिखते हैं तथा कोष्ठकमें यह भी लिखते हैं कि वे स्वयं मात्र माध्यम हैं, उदा. सूक्ष्म-विश्वके ‘एक विद्वान’ (पू. श्रीमती अंजली गाडगीळजीके माध्यमसे) । सूक्ष्म-विश्वके ‘एक विद्वान’ ज्ञान प्रदान करते हैं, ऐसा पू. (श्रीमती) अंजली गाडगीळजीका भाव रहता है । किसी विषयसंबंधी लेखन करते समय कष्ट हो, तो उस ज्ञानके अंतमें अपने नाम की अपेक्षा ‘एक मांत्रिक’ लिखकर कोष्ठकमें स्वयं माध्यम होनेका उल्लेख करती हैं ।

 

‘सूक्ष्म’ शब्दके संदर्भमें कुछ संज्ञाओंका अर्थ

जो स्थूल पंचज्ञानेंद्रिय, मन एवं बुदि्धके परे है, वह ‘सूक्ष्म’ है । इस ‘सूक्ष्म’ ज्ञानके विषयमें विविध धर्मग्रंथोंमें उल्लेख है, उदा. भगवतो नारायणस्य साक्षान्महापुरुषस्य स्थविष्ठं रूपम् आत्ममायागुणमयम् अनुवर्णितम् आदृतः पठति शृणोति श्रावयति स उपगेयं भगवतः परमात्मनः अग्राह्यम् अपि श्रद्धाभक्तिविशुद्धबुदि्धः वेद । – श्रीमद्भागवत, स्कंध ५, अध्याय २६, सूत्र ३८

अर्थ : भगवानका उपनिषदोंमें वर्णित निर्गुण स्वरूप मन एवं बुदि्धके परे है । तथापि जो उनके स्थूल रूपका वर्णन पढता है, सुनता है अथवा सुनाता है, उसकी बुदि्ध श्रद्धा व भक्तिसे शुद्ध होती है और उसे इस सूक्ष्म रूपका भी ज्ञान अथवा अनुभूति होती है । साधना करनेसे सनातनके साधकोंमें श्रद्धा एवं भक्ति बढनेके कारण उन्हें भी सूक्ष्म रूपका ज्ञान होता है या सूक्ष्मसंबंधी अनुभूति होती है । समस्त धर्मग्रंथोंमें वर्णित वचनोंकी सत्यताकी प्रतीति सनातनके साधकोंको हो रही है । सनातनके जालस्थलपर उपलब्ध जानकारीमें ‘सूक्ष्म’ शब्दसंबंधी संज्ञाका प्रयोग किया गया है । उसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है ।

 

१. सूक्ष्म-विश्व

स्थूल पंचज्ञानेंद्रियोंको (नाक, जीभ, आंख, त्वचा तथा कानको) जिसका बोध नहीं होता; परंतु जिसके अस्तित्वका ज्ञान साधना करनेवालेको होता है, उसे ‘सूक्ष्म-विश्व’ कहते हैं ।

 

२. सूक्ष्म आयामका (related to the subtle dimension)
कुछ दिखाई देना, सुनाई देना इत्यादि (पंचसूक्ष्मज्ञानेंद्रियोंसे ज्ञानप्राप्ति होना)

कुछ साधकोंकी अंतर्दृष्टि जागृत होती है, अर्थात जो स्थूल आंखोंसे नहीं दिखाई देता है, वह उन्हें दिखता है तथा कुछ लोगोंको सूक्ष्म स्तरीय नाद अथवा शब्द सुनाई देता है ।

 

३. सूक्ष्म-ज्ञानविषयक चित्र

कुछ साधकोंको किसी विषयसे संबंधित जो अनुभव होता है तथा अंतर्दृष्टिसे जो दिखाई देता है, उसके रेखांकनको (कागजपर बनाए चित्रको) ‘सूक्ष्म-ज्ञानविषयक चित्र’ कहते हैं ।

 

४. सूक्ष्म-परीक्षण

किसी घटनाके विषयमें अथवा प्रक्रियाके विषयमें चित्तको (अंतर्मनको) जो अनुभव होता है, उसे ‘सूक्ष्म-परीक्षण’ कहते हैं ।

 

५. सूक्ष्म-ज्ञानविषयक प्रयोग

कुछ साधक ‘सूक्ष्म आयामसंबंधी बोधक्षमता (ability to understand the subtle dimension)’ का अभ्यास करते हैं । वे परखते हैं कि ‘किसी वस्तुके विषयमें मन एवं बुदि्धके परे क्या अनुभव होता है’ । इसे ‘सूक्ष्म-ज्ञानविषयक प्रयोग’ कहते हैं ।

 

‘अनिष्ट शक्तियोंसे साधकोंको होनेवाली पीडा’ इस संज्ञाका अर्थ

वातावरणमें अच्छी तथा बुरी (अनिष्ट) शक्तियां कार्यरत रहती हैं । अच्छे कार्यमें अच्छी शक्तियां मानवकी सहायता करती हैं, जबकि अनिष्ट शक्तियां मानवको कष्ट देती हैं । पूर्वकालमें ऋषि-मुनियोंके यज्ञोंमें राक्षसोंने विघ्न डाले, ऐसी अनेक कथाएं वेद-पुराणोंमें हैं । ‘अथर्ववेदमें अनेक स्थानोंपर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, राक्षस, पिशाच को प्रतिबंधित करने हेतु मंत्र दिए हैं ।’ (टिप्पणी १) इसमेंसे एक मंत्र निम्नलिखित है ।

स्तुवानमग्न आ वह यातुधानं किमीदिनम् । त्वं हि देव वनि्दतो हन्ता दस्योर्बभूविथ ।। – अथर्ववेद, कांड १, सूक्त ७, खंड १

अर्थ : सभीमें जठराग्निके रूपमें विद्यमान, विद्युत (बिजली) इत्यादि रूपोंमें संपूर्ण विश्वव्यापी तथा यज्ञमें अग्रणी अग्नि, हम जिन देवताओंकी स्तुति कर रहे हैं, उनतक आप यह हविर्भाग पहुंचाइए । हमसे अर्पित हविर्भागकी प्रशंसा करनेवाले देवताओंको हमारे निकट लाइए तथा हमें मारनेकी इच्छा कर गुप्त रूपमें (सूक्ष्म रूपमें) विचरनेवाले किमीदिन्को (दुष्ट पिशाचका एक प्रकार) हमसे दूर कर दीजिए; क्योंकि दान इत्यादि गुणोंसे युक्त हे देव, हमारेद्वारा वंदन करनेपर आप उपक्षय (घात) करनेवाले यातुधान (राक्षस) इत्यादिका संहार करते हैं; इसलिए आप इसे (राक्षसको) अपने पास बुलाइए अथवा हे स्तूयमान अग्नि, प्रतिकार करने हेतु (प्रतिशोध लेने हेतु) आप इस राक्षसका इस पुरुषमें आवेश कीजिए । तात्पर्य यह है कि अनिष्ट शक्तियां साधना करनेवालोंको कष्ट पहुंचाती हैं । इस पीडाके निवारणार्थ विविध आध्यात्मिक उपाय वेदादि धर्मग्रंथोंमें बताए गए हैं । सनातनके जालस्थलपर उपलब्ध जानकारीमें कुछ स्थानोंपर ‘अनिष्ट शक्ति’ अथवा ‘आध्यात्मिक पीडा / कष्ट’ जैसे शब्दोंका उपयोग किया गया है । वह इस विषयके संदर्भमें है । अनिष्ट शक्तियोंका अस्तित्व एवं इस विषयमें शोध-संबंधी जानकारी लाखों जालस्थलोंपर उपलब्ध है ।

टिप्पणी १ – संदर्भ : मराठी विश्वकोश खंड १, प्रकाशक : महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृति मंडल, सचिवालय, मुंबई – ४०० ०३२, संस्करण १ (१९७६), पृष्ठ १९४)

यदि सनातन जालस्थलपर उपलब्ध जानकारीमें कोई आध्यात्मिक संज्ञा समझमें न आए, तो उस विषयमें पाठक कृपया जालस्थलको [email protected] सूचित करें । जालस्थलपर उस संज्ञाको अधिक सुस्पष्ट किया जाएगा ।

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