स्वयंसूचना

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया में स्वयंसूचना बनाना एवं स्वयंसूचना के अभ्याससत्र करना, ये दो महत्त्वपूर्ण चरण हैं । इनमें से यदि एक भी चरण पर चूक हो जाए, तो प्रक्रिया का अपेक्षित परिणाम नहीं दिखाई देता ।

स्वभावदोष के लिए स्वयंसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वयंसूचना बनाना

प्रक्रिया के अंंतर्गत प्रत्येक स्वभावदोष के लिए स्वयंसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वयंसूचना बनाना

स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी का स्वरूप एवं लिखने की पद्धति

१. स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियांतर्गत कृति के चरण १. दिनभर में हुई अयोग्य कृतियों अथवा अयोग्य प्रतिक्रियाओं को लिखना २. प्रसंग, अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया का अभ्यास करना और योग्य कृति एवं प्रतिक्रिया निश्चित करना ३. मन से उपयुक्त प्रश्न पूछकर अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया का अभ्यास करना एवं उसके आधार पर उसका मूलभूत स्वभावदोष ढूंढना … Read more

मन, संस्कार एवं स्वभाव

आधुनिक मानसशास्त्र के अनुसार मन के दो भाग होते हैं । पहला भाग, जिसे हम ‘मन’ कहते हैं, वह ‘बाह्यमन’ है । दूसरा अप्रकट भाग ‘चित्त (अंतर्मन)’ है । मन की रचना एवं कार्य में बाह्यमन का भाग केवल १० प्रतिशत जबकि अंतर्मन का ९० प्रतिशत है ।

स्वभावदोष (षड्रिपू)-निर्मूलन प्रक्रिया प्रारंभ करने से पूर्व ध्यान देनेयोग्य सूचनाएं

हम इस लेख में स्वभावदोष (षड्रिपू)-निर्मूलन प्रक्रिया में आनेवाली प्रमुख बाधा, सफल प्रक्रिया के लिए आवश्यक गुण एवं स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियांतर्गत कृति के चरण, यह जानेंगे ।

स्वभावदोष (षड्रिपु)-निर्मूलन प्रक्रिया क्या है एवं क्यों महत्त्वपूर्ण है ?

स्वभावदोषों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, पारिवारिक, सामाजिक व आध्यात्मिक दुष्परिणामों को दूर कर, सफल व सुखी जीवन जीने हेतु, स्वभावदोषों को दूर कर चित्त पर गुणों का संस्कार निर्माण करने की प्रक्रिया को ‘स्वभावदोष (षड्रिपु)-निर्मूलन प्रक्रिया’ कहते हैं ।

आदर्श व्यक्तित्व विकसित करने की क्या आवश्यकता है ?

जीवन के किसी भी कठिन प्रसंग में मानसिक संतुलन खोए बिना, धैर्य से उसका सामना करने एवं सदैव आदर्श कृति होने के लिए उत्तम मनोबल व आदर्श व्यक्तित्व आवश्यक है ।

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“Satpatre daanam”