गुजरात का ‘द्वारकाधीश’ मंदिर और द्वारकापीठ

श्रीकृष्ण ने अवतार-समाप्ति के पहले द्वारका समुद्र में डुबो दी । दुर्वास ॠषि के शाप के कारण यदुकुल का नाश हुआ । समुद्र में विलीन द्वारका के समीप के भूभाग को तदनंतर द्वारका का स्थान प्राप्त हुआ ।

योगतज्ञ दादाजी वैशंपायनजी द्वारा स्थापित शेवगाव का जागृत दत्त मंदिर !

योगतज्ञ दादाजी ने स्वयं जयपुर से गर्भगृह की प्रसन्न, सजीव, मासूम, वात्सल्यमयी एवं तेजस्वी दत्त मूर्ति बनवाकर लाई है । दादाजी ने स्वयं दत्तमूर्ति में प्राण प्रोक्षण किए हैं, इस कारण मूर्ति प्रत्यक्ष हमसे बात कर रही है, ऐसा प्रतीत होता है ।

भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व का अनुभव किए हुए कुछ स्थानों का छायाचित्रात्मक दिव्यदर्शन !

श्रीकृष्ण के प्रति उत्कट भाव बढाने के लिए उनके दिव्य जीवन से संबंधित गोकुल, वृंदावन एवं द्वारका, इन दैवी क्षेत्रों के छायाचित्र यहां दिए हैं । इन छायाचित्रात्मक कृतज्ञता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व का अनुभव करने का प्रयत्न करते हैं !

शनि के साढे तीन पीठों में से एक है प्रभु श्री रामचंद्रजी के शुभहस्तों स्थापित राक्षसभुवन का श्री शनिमंदिर !

बीड जिले की गेवराई तालुका के राक्षसभुवन में श्री शनि मंदिर में पौष शुक्ल पक्ष अष्टमी को सायं शनिमहाराजजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है । इसी निमित्त से प्रस्तुत है मंदिर की जानकारी !

महाबळेश्‍वर में श्रीकृष्णामाई का देवालय

महाबळेश्वर यहां श्री महाबळेश्वर, श्री पंचगंगा और श्री कृष्णादेवी के अति प्राचीन भव्य देवालय हैं । कुछ कामनिमित्त से महाबळेश्वर में जाने का योग आया था, तब श्री कृष्णामाई के दर्शन हेतु जानेपर ध्यान में आए सूत्र यहां प्रस्तुत कर रहा हूं ।

कोल्हापुर में अतिप्राचीन श्री एकमुखी दत्त मंदिर !

कोल्हापुर शहर में एकमुखी दत्त मंदिर की दत्त मूर्ति १८ वीं शताब्दी में बनी और नृसिंह सरस्वती महाराज, गाणगापुर; श्रीपाद वल्लभ महाराज और तदुपरांत स्वामी समर्थ ने इस मूर्ति की पूजा की है ।

पांडवों के वास्तव्य से पावन है एरंडोल (जलगांव) का पांडववाडा !

पांडववाडा की वास्तु का क्षेत्रफल ४५१५.९ चौरस मीटर है । कुछ समय पूर्व ही पांडववाडा के प्रवेशद्वार के पत्थर पर प्राचीनकालीन नक्काशी उकेरी गई है ।इसमें कमलफूलों की नक्काशी स्पष्ट दिखाई देती है ।

श्री शिकारीमाता के पुरातन मंदिर की छत का अनसुलझा रहस्य !

पांडवों ने अज्ञातवास में इसका निर्माण किया था । तब उन्होंने जानबूझकर इस मंदिर की छत नहीं बनाई और खुले आकाशतले मूर्ति की स्थापना की थी ।

घी अथवा तेल नहीं, अपितु पानी से जलते हैं मध्यप्रदेश के मंदिर में दीपक !

कालीसिंध नदी का पानी इस दीपक में डालने के पश्चात पानी पर तवंग तैयार हो जाती है और दीपक जल जाता है ।