सूक्ष्म-चित्रकला के माध्यम से अज्ञान से ज्ञान की ओर एवं चित्रकलारूपी तेज की ओर से ज्ञानरूपी आकाश की ओर ले जानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवले !

कु. प्रियांका लोटलीकर द्वारा निर्मित सूक्ष्मस्तरीय विशेषताएं दर्शानेवाला चित्र जांचते हुए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी (२००७)

 

सूक्ष्म जगत से परिचित करानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

संसार में अनेक महाविद्यालय हैं; परंतु किसी भी कला महाविद्यालय में अध्यात्मसंबंधी शिक्षा नहीं दी जाती । ‘कला क्या है ?’ ‘कलाएं कैसे निर्मित हुई?’ ‘कलाएं कितने प्रकार की होती हैं’ ‘जीवन में कला का महत्त्व क्या है ?’, यह भी किसी कला महाविद्यालय में नहीं सिखाया जाता । अतः केवल अपनी कल्पकता को कलाकृति में उतारकर सभी के सामने प्रस्तुत करना ही कलाकार के जीवन का उद्देश्य हो जाता है ।

कला को अध्यात्म से जोडने का अर्थ है, सर्वव्यापी ईश्‍वर के ‘कला’ नामक एक अंग को स्पर्श करना । कला ईश्‍वरप्राप्ति करने का एक माध्यम है । जिस कला के माध्यम से ईश्‍वर से आंतरिक सान्निध्य (अनुसंधान) साधा जाता है, वही खरी कला है । आधुनिक कलाकारों की दृष्टि से कला केवल ‘कला के लिए कला’ होती है; परंतु जिस कला के कारण साधकत्व जागृत होकर साधक विकास के लिए प्रवृत्त हो जाता है, वही खरी कला है । कलाकार किसी वस्तु के स्थान पर अपने आत्मस्वरूप को जब प्रकट करता है, तब सुंदरता के साथ सात्त्विकता भी प्रकट होती है । चित्रकला, मूर्तिकला, शिल्पकला, नाट्यकला, पाककला इत्यादि किसी भी क्षेत्र से संबंधित कलाकार को कला की ओर केवल कला एवं सुंदरता की दृष्टि सेे न देखकर उसमें अंतर्भूत सात्त्विकता को सीखकर ‘वह स्वयं में कैसे आएगी ?’, इसके लिए प्रयत्न करना आवश्यक है ।

आध्यात्मिक दृष्टि से कलाविश्‍व की विविध सकारात्मक एवं नकारात्मक अतींद्रिय शक्तियों का शोध लेते हुए तथा उनके अस्तित्व के सत्य-असत्य को जांचते हुए कला को अध्यात्म से उचित पद्धति से जोडकर, संसार के लिए कला की भाषा में अध्यात्म प्रतिपादित करने का अनमोल कार्य पीछले ३० वर्ष से परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी ने किया । कलाविश्‍व की अनेक कलाआें में से ‘चित्रकला’ की कला में उन्होंने किए शोध तथा मार्गदर्शन इतना विपुल है कि, इससे हमें अध्यात्म के एक अनंत शास्त्र होने की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है ।

इस लेख में सूक्ष्म चित्रकलासंबंधी उनके शोधकार्य से संबंधित कुछ विशेषताआें पर प्रकाश डालने का प्रयत्न कर रही हूं ।

किसी विषय को उचित प्रकार से समझने के लिए चित्रों का आधार लिया जाता है । ऐसे चित्रों को ‘आकृतियां’ कहते है । ऐसे चित्र बुद्धि के स्तर पर बनाए जाते हैं । किसी सूक्ष्म विषय को समझाने के लिए भी ऐसे चित्रों का उपयोग होता है । अब हम सूक्ष्म-जगत और सूक्ष्म-चित्र के संदर्भ में संक्षिप्त जानकारी लेंगे ।

 

१. सूक्ष्म चित्रकला का अर्थ क्या है ?

‘क्ष-किरणों से बनाया चित्र नित्य के छायाचित्र की तुलना में सूक्ष्म स्तर का होता है । सूक्ष्म चित्र इससे भी कई गुना सूक्ष्म स्तर के होते हैं । ‘सूक्ष्म चित्रकला का अर्थ क्या है ?’, इसका कुछ अनुमान किलिर्र्यन छायाचित्र से लगा सकते है । किलिर्र्यन छायाचित्र, अर्थात व्यक्ति के आभावलय (आध्यात्मिक वलय) अथवा जीवनशक्ति का छायाचित्र । हममें से प्रत्येक के सर्व ओर वलय अथवा आभावलय जन्मभर रहता है । केवल मनुष्यप्राणी ही नहीं, अपितु पशु-पक्षी, मछली, वनस्पती, पत्थर आदि के सर्व ओर वलय होता है । वलय एक प्रकार की ऊर्जा होती है । यह ऊर्जा अथवा शक्ति हमारे कुंडलिनीचक्र से जुडी होती है । समझा जाता है कि, ‘वह विद्युत्-चुंबकीय क्षेत्र जैसी है’ । ‘हम कैसे हैं ? कहां हैं ? और हमारे मन की वर्तमान स्थिती कैसी है ?’, यह सब इस वलय में प्रतिबिंबित होता रहता है । सूक्ष्म चित्रकला किलिर्र्यन छायाचित्र की तुलना में १ लाख गुना सूक्ष्म है ।

 

२. सूक्ष्म चित्र तथा सूक्ष्म परीक्षण जैसे शब्दों का अर्थ

सूक्ष्म चित्र, अर्थात आंखों से न दिखनेवाली अदृश्य गतिविधियों के बनाए गए चित्र और सूक्ष्म परीक्षण, अर्थात पंचज्ञानेंद्रियां, मन एवं बुद्धि का उपयोग किए बिना सूक्ष्म पंचज्ञानेंद्रियां, सूक्ष्म कर्मेंद्रियां, सूक्ष्म मन एवं सूक्ष्म बुद्धि की सहायता से अथवा इनकी सहायता के बिना जीवात्मा अथवा शिवात्मा द्वारा निर्मित चित्र । यहां सूक्ष्म चित्रों के संदर्भ में दी जानकारी प्रायः सूक्ष्म परीक्षणों के संदर्भ में भी लागू होती है; क्योंकि प्रायः सूक्ष्म चित्र सूक्ष्म परीक्षणों द्वारा ही बनाए जाते हैं । आगे दी सैद्धांतिक जानकारी के आधारपर इस लेख में दिए सूक्ष्म चित्रों का अध्ययन करना सरल होगा । सूक्ष्म चित्र स्पंदन, तरंगें, वलय, किरण, प्रकाश इत्यादि अनेक रूपों में दिखाई देते हैं । इन सभी के लिए यहां ‘स्पंदन’ शब्द प्रयुक्त किया है । सूक्ष्म कर्मेंद्रियों को ज्ञान प्राप्त होने की प्रक्रिया ‘अतींद्रिय ज्ञान ग्रहण होने की प्रक्रिया’, इस आगामी ग्रंथ में दी है । जैसे-जैसे साधक की साधना बढती जाती है, वैसे-वैसे उसे इन सूक्ष्म गतिविधियों का ज्ञान होने लगता है ।

 

३. सूक्ष्म चित्रों का महत्त्व

मनुष्य को निरंतर नई घटनाआें का, अर्थात सूक्ष्म गतिविधियों का शोध करने में रूचि होती है; इसीलिए तो अणु, परमाणु, तदुपरांत न्यूट्रॉन; जीवाणु, सूक्ष्म जीवाणु इत्यादि शोधकार्य चल ही रहा है । इसी प्रकार मनुष्य को अब सूक्ष्म-जगत की घटनाआें को समझ लेने में रूचि उत्पन्न हो रही है । सूक्ष्म चित्रों के कारण उसकी यह जिज्ञासा कुछ मात्रा में पूरी होगी । ऐसा करते हुए मनुष्य एक दिन सूक्ष्मातिसूक्ष्म ईश्‍वर का शोध लेने का विचार और उस दृष्टि से प्रयत्न आरंभ करेगा । तत्पश्‍चात ही मनुष्य वास्तविक रूप में आनंद की ओर अग्रसर होने लगेगा ।

व्यष्टि साधना करनेवाले संत ‘केवल श्रद्धावानों के लिए ही अध्यात्म’ बताते हैं; परंतु समष्टि साधना करनेवाले संतों की बात भिन्न होती है । समष्टि संत ‘समाज के प्रत्येक घटक को क्या अच्छा लगता है ? उसे किस प्रकार से साधना बताने से वह साधना आरंभ करेगा ?’, इस बात का विचार कर उसे उसी की परिभाषा में अध्यात्म बताने का प्रयत्न करते हैं ।

साधना करनेवाली और साथ ही कलाक्षेत्र में शिक्षा प्राप्त की कुछ साधिकाआें में सूक्ष्म समझने की क्षमता है तथा इसी मार्ग से उनकी आध्यात्मिक प्रगती होना संभव है, यह बात परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी के ध्यान में आई । इन साधिकों द्वारा निर्मित सूक्ष्म चित्र, समष्टि के लिए एक देन ही है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सूक्ष्म-चित्रों की यह एक अनमोल देन तो दी ही, परंतु साथ में ‘साधिकाआें की प्रगती कैसे करवाई ?’, यह भी हम आगामी लेखों में देखनेवाले हैं । 

प्राणी, पशु, पक्षी, मनुष्य और देवताआें की अपनी स्वयं की एक भाषा होती है । इसी प्रकार कला में आकृतिबंधों की भी एक भाषा होती है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने ‘अध्यात्मशास्त्र के अनुसार खरी प्रकाशभाषा (आकृतिबंध की भाषा) कैसी होती है ?’, यह सिखाया । केवल ९० प्रतिशत से अधिक स्तर के उन्नत ही उनकी सूक्ष्म दर्शनेंद्रियों की क्षमता अच्छी होने के कारण तथा उनकी इच्छा होने पर यह प्रकाशभाषा समझ सकते हैं; परंतु सनातन के अनुमानतः ५० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के साधकों ने भी सूक्ष्म चित्र बनाए हैं । विविध आध्यात्मिक स्तर के साधकों को विभिन्न प्रकार की प्रकाशभाषाएं अवगत होती हैं । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सूक्ष्म-चित्रकारों का समय-समय पर मार्गदर्शन कर कला और सूक्ष्म जगत का परिचय करवाया ।

 

४. सूक्ष्म चित्र में दिखनेवाले स्पंदनों का परात्पर
गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी ने सिखाया अर्थ एवं उनका कार्य

अ. सूक्ष्म कण निर्गुण के निकट होना, तो तरंगों में सगुण द्वारा कार्य करने का झुकाव अधिक होना : ‘देवताआें की उत्पत्ति तेजतत्त्वजन्य होती है । सूक्ष्म कण निर्गुण के निकट होते हैं, तो तरंगों में सगुण द्वारा कार्य करने का झुकाव अधिक होता है ।

आ. कणों की प्रवृत्ति स्थिरता ओर अधिक होती है, तो तरंगों की प्रकृति (स्वभाव) गतिमानता का अवलंबन करने की ओर अधिक होती है ।

 

५. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सूक्ष्म-प्रक्रिया बताते
समय सूक्ष्म चित्र के तरंगों को समझने के लिए सिखाना

‘सूक्ष्म चित्र बनाते समय अधिकतर उस चित्र के घटकों के, उदा. शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद, शांति आदि के संदर्भ में विचार मन में आते हैं । सूक्ष्म चित्र बनाते समय जब कागद पर आकार बनाने की कृती होती रहती है, तब कुछ क्षणों के लिए आसपास की ओर घटनेवाली घटनाआें का विस्मरण होता है । इस समय चित्र के लिए दिए विषय के संदर्भ में (ईश्‍वर की ओर से) आ रहे विचार मन में आते हैं और उन्हें कागद पर उतारने की कृती होती है ।

अ. चित्र के लिए दिए विषय से संबंधित प्रत्यक्ष चित्र दिखाई देता है । ईश्‍वर की ओर से आ रहे विचार मन में आते हैं ।

आ. चित्र के संदर्भ में शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद और शांति जैसे घटकों की अनुभूती होना : कभी-कभी चित्र के संदर्भ में शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद और शांति जैसे घटकों की अनुभूती होती है एवं इससे ‘चित्र में कौनसा घटक है ? आनंद है अथवा शांति ?’, यह निश्‍चित होता है । इससे संबंधित कुछ उदाहरण आगे दिए हैं ।

१. किसी घटक की ओर देखने पर देह में उष्णता उत्पन्न होती है । तब उस वस्तु में तेजतत्त्व की अथवा मारक शक्ति की मात्रा अधिक होने का बोध होता है ।

२. किसी व्यक्ति की ओर देखने पर आनंद प्रतीत होता है और अपने मुखमंडल पर भी हास्य उभरता है । इससे उस व्यक्ति में आनंद की मात्रा अधिक होने का बोध होता है ।

३. कभी-कभी किसी घटक की ओर देखने पर आरंभ में कुछ समय अच्छा लगता है; परंतु कुछ समय पश्‍चात कष्ट होने लगता है । तब उस घटक से मायावी और अच्छे स्पंदनों का प्रक्षेपण होने का बोध होता है । यह सब बोध के स्तर पर घटता है; परंतु ये मायावी तरंगें कागद पर दिखाने के लिए उन्हें बुद्धि के स्तर पर रंगाया जाता है; क्योंकि जिसका केवल भान होता है, उसे कागद पर नहीं दिखा सकते । इसलिए वहां अपनेआप बुद्धि का उपयोग किया जाता है ।

४. कभी-कभी किसी घटक में प्रत्यक्ष में वे रंग दिखते हैं । इससे यह निश्‍चित होता है कि, ‘वह चैतन्य है’ ।

अधिकतर समय ये सर्व कृतियां एकसाथ ही होती हैं । जिस प्रकार मां हाथ में हाथ लेकर हमें लिखना सिखाती है, उसी प्रकार परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने हमें ब्रह्मांड के ‘सूक्ष्मातिसूक्ष्म घटकों को कैसे पहचाने ?’, यह सिखाया ।

 

६. बुद्धि के परे विद्यमान विश्‍वमन और विश्‍वबुद्धि के स्तर के
सूक्ष्म चित्र बनाने के लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सिखाना

अ. सूक्ष्मज्ञान होने के लिए साधक को विश्‍वमन
और विश्‍वबुद्धि पर ही निर्भर रहने के लिए सिखाना
 

 सूक्ष्मज्ञान की अनुभूति होने के किसी भी प्रकार में साधक को मिली जानकारी अथवा दिखाई दिए दृश्य की अचूकता इसपर निर्भर रहती है कि, ‘उस साधक का उस समय ईश्‍वर से कितना आंतरिक सान्निध्य है ?’ । सूक्ष्मज्ञान होना मनुष्य की बुद्धि के परे होता है । इसलिए इससे संबंधित उत्तर ईश्‍वर से ही पूछने पडते है । साधक की एकाग्रता और उत्कंठा के अनुसार ईश्‍वर उत्तर देते हैं । इसे ‘विश्‍वमन और विश्‍वबुद्धि द्वारा उत्तर मिलना’, कहते है । अतः ‘सूक्ष्मज्ञान होने के लिए साधकों को निरंतर ईश्‍वर के आंतरिक सान्निध्य में रहना चाहिए’, यह परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सिखाया ।

आ. विश्‍वमन के माध्यम से स्पंदनों का
प्रकार, तो विश्‍वबुद्धि के माध्यम से उसका कारण ज्ञात होना 

मन को स्पंदन अनुभव होते हैं, तो बुद्धि से उनका कारण ज्ञात होता है । विश्‍वमन के माध्यम से साधक को स्पंदनों का प्रकार समझ में आता है, तो विश्‍वबुद्धि के माध्यम से उनका कारण ज्ञात होता है, उदा. किसी वस्तु की ओर देखने पर विश्‍वमन के कारण अच्छे स्पंदन प्रतीत होते हैं, तो ‘वह वस्तु संतों द्वारा प्रयुक्त की गई है’, यह विश्‍वबुद्धि के कारण ज्ञात होता है । जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी के घडे को आकार देता है, उस प्रकार परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सूक्ष्म चित्रकारों की सूक्ष्म दृष्टि को आकार देकर उसे प्रकट करना प्रारंभ किया । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी अज्ञात सूक्ष्म विश्‍व में ले जाकर हमें स्पंदनों के प्रकार, विशेषताएं और कार्य सिखाते थे ।

इ. स्पंदन समझने के लिए सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियां आवश्यक होना

 अध्यात्म कृति का शास्त्र है । स्वानुभूती से वह आत्मसात करना संभव है । अध्यात्म से संबंधित कोई घटना शब्दों द्वारा व्यक्त करना कठिन होता है । ईश्‍वर तथा परमेेश्‍वर का वर्णन करते समय ‘श्रुतियां भी (वेद और उपनिषद भी) कहती हैं, ‘नेति नेति’ अर्थात ‘वह (परमेेश्‍वर) यह नहीं है, वह यह नहीं है’ यह अवधूत गीता में (अध्याय १, श्‍लोक २५) बताया है । व्यावहारिक घटना भी शब्दों के माध्यम से किसी एक के द्वारा दूसरे को बताते समय प्रत्येक समय उसमें से १० प्रतिशत भाग न्यून होता जाता है, उदा. बतानेवाले द्वारा शब्दों में विचार प्रस्तुत करते समय १० प्रतिशत भाग न्यून होता है । सुननेवाले द्वारा वे विचार समझ लेते समय १० प्रतिशत और दूसरे को बताते समय १० प्रतिशत भाग न्यून होता है । प्रश्‍न बुद्धि के स्तर का होने से उसकी मर्यादा होती है और परिणामस्वरूप उत्तरों को भी मर्यादा आती हैं, अर्थात बुद्धि एवं ज्ञानेंद्रियों को भी मर्यादाएं होती हैं । इसके लिए सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय सक्षम होना आवश्यक है ।

हम बुद्धि से विचार करते हैं, इसलिए उसे शब्दों में प्रस्तुत कर सकते है, तो भावनाएं मन की तुलना में, अर्थात विचारों की तुलना में सूक्ष्म होने से उन्हें शब्दों में प्रस्तुत करना कठिन होता है । स्पंदन समझने के लिए सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियों की और प्रस्तुत करने के लिए सूक्ष्म मन एवं बुद्धि की आवश्यकता होती है ।

ई. चरण-दर-चरण आगे के स्तर का सूक्ष्म परीक्षण करना

 प्राथमिक चरण में किसी वस्तु, व्यक्ति अथवा धार्मिक विधी का सूक्ष्म चित्र अथवा परीक्षण उसके स्थानपर जाकर करने से सूक्ष्म चित्र में सत्यता की मात्रा अधिक होती है । इसलिए विविध धार्मिक विधी, यज्ञ और संतों के वास्तु के स्थान पर जाकर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी सूक्ष्म चित्र एवं सूक्ष्म परीक्षण करने को बताते थे; क्योंकि किसी स्थान पर गए बिना परीक्षण करने से परीक्षण में चूक होने की आशंका अधिक होती है; परंतु साधना के कारण जैसे-जैसे प्रगती होती गई, वैसे-वैसे परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा सेे साधकों को काल के परे का समझना प्रारंभ हुआ । सूक्ष्म चित्रकार साधकों ने कुछ सूक्ष्म चित्र व्यक्ति अथवा वस्तु के सामने रहते हुए बनाए हैं, तो कुछ छायाचित्र अथवा दृश्य-श्रव्यचक्रिकाएं देखकर बनाए हैं, तो कुछ बिना देखे बनाए हैं ।

उ. किसी वस्तु का सूक्ष्म चित्र सहस्रो
कि.मी. दूरी से भी बनाया जा सकना संभव

 अध्यात्म का एक मूलभूत सिद्धांत है, ‘शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध और उनसे संबंधित शक्ति एकत्रित होते हैं’; इसीलिए सूक्ष्म चित्र बनाते समय संबंधित विषय का स्मरण करने (शब्द) अथवा उसके रूप का स्मरण करने पर भी उससे संबंधित स्पंदन ज्ञात होते है, दिखाई देते हैं अथवा उस विषय की जानकारी मिलती है । इस सिद्धांत के आधार पर ही साधक-चित्रकार स्थल के परे जाकर सहस्रो कि.मी. दूरी से भी सूक्ष्म चित्र बना सकता है ।

ऊ. सूक्ष्म चित्रकार को काल के परे जाकर चित्र बनाना संभव

 कोई घटना और उसका परीक्षण, इन दोनों में अधिक समय बीतने पर वातावरण में विद्यमान उस घटना के स्पंदन न्यून होते जाते हैं । इससे चित्र की सत्यता न्यून होती है । साधक-चित्रकार की स्पंदन ग्रहण करने की क्षमता अधिक होगी, तो ही कुछ समय के पश्‍चात भी उस विषय के योग्य स्पंदन ज्ञात होकर वह उसका सूक्ष्म चित्र बना सकता है । उच्च आध्यात्मिक स्तर के संतों के संदर्भ में काल की कोई मर्यादा नहीं होती है । सूक्ष्म चित्रकार को पहले चरण में निकट का भूतकाल अथवा भविष्यकाल अचूकता से समझ में आता है, तो आगे के चरण में पीछले जन्म की जानकारी भी मिल सकती है ।

– कु. प्रियांका लोटलीकर, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा. (२९.४.२०१६)

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