आदर्श व्यक्तित्व विकसित करने की क्या आवश्यकता है ?

आदर्श व्यक्तित्व विकसित करने की क्या आवश्यकता है ?

जीवन के किसी भी कठिन प्रसंग में मानसिक संतुलन खोए बिना, धैर्य से उसका सामना करने एवं सदैव आदर्श कृति होने के लिए उत्तम मनोबल व आदर्श व्यक्तित्व आवश्यक है । स्वभावदोेष व्यक्ति के मन को दुर्बल बनाते हैं जबकि गुण आदर्श व्यक्तित्व के विकास में सहायक होते हैं । इसीलिए स्वभावदोष-निर्मूलन कर, गुण-संवर्धन करना आवश्यक है ।

 

सुखी जीवनयापन में एक बडी बाधा हैं ‘स्वभावदोष’

दुःख का मूल कारण है अपने स्वभावदोष । स्वभावदोषों के कारण ही जीवन में प्रत्येक क्षण संघर्ष व तनावपूर्ण स्थिति निर्माण होती है । अनेक बार हम अपने जीवन के तनावों के लिए आसपास के वातावरण, स्थिति व अन्य व्यक्तियों के स्वभावदोषों को उत्तरदायी मानते हैं; परंतु अपने स्वभावदोष ढूंढनेका प्रयास ही नहीं करते । परिणामत: स्वभावदोष वैसे ही रहते हैं और मनःशांति नहीं मिलती । इसलिए जीवन सुखमय होने के लिए स्वभावदोषों की बाधा दूर करना अनिवार्य है ।

 

आध्यात्मिक उन्नति में भी ‘स्वभावदोष’ बाधक

साधना में भी स्वभावदोष (षड्रिपु) ही प्रमुख बाधा हैं । काम-क्रोधादि षड्रिपुओं के प्रभाव से महान तपस्वी मुनियों व पुण्यशील राजाओं के परमार्थपथ से पतन के अनेक उदाहरण पुराण कथाओं में मिलते हैं । स्वभावदोषों के कारण होनेवाली चूक से, साधनाद्वारा प्राप्त ऊर्जाका अपव्यय होता है । जितने स्वभावदोष अधिक उतनी व्यष्टि  व समष्टि  साधना में चूक अधिक और जितनी चूक अधिक उतने हम ईश्वर से दूर जाते हैं । इसीलिए साधना में षड्रिपुओं की बाधा दूर कर ईश्वर से एकरूप होने के लिए स्वभावदोष-निर्मूलन व गुण-संवर्धन आवश्यक है ।

 

साधना से स्वभावदोष-निर्मूलनका योग अनिवार्य

साधनाका  ध्येय, ईश्वरप्राप्ति की उत्कंठा, अंतःकरण में निर्मित ईश्वरसंबंधी केंद्र , प्रत्यक्ष साधना इत्यादि विविध घटकों पर स्वभावदोष निर्मूलन निर्भर करता है । साधना का उद्देश्य ही है ‘षड्रिपु-निर्मूलन’, अर्थात् ‘सर्व प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना’ । स्वभावदोष अर्थात् चित्त पर अनेक जन्मों के संस्कार । वे चित्त में इतने दृढ और गहरे हो चुके होते हैं कि साधना से उनका शीघ्र निर्मूलन होना सहज संभव नहीं होता । साधनाद्वारा आध्यात्मिक उन्नति होने से मनोलय व बुद्धिलय साध्य होते हैं; अर्थात् चित्त के संस्कार नष्ट होने तक मन व बुद्धि कार्यरत रहते हैं ।

 

राष्ट्र की दुर्दशा पर उपायस्वरूप
सुसंस्कारित समाजमन की आवश्यकता

व्यक्ति व समाज का स्वास्थ्य एक-दूसरे पर निर्भर करता है । वर्तमान समाजव्यवस्था में अनेक दुर्गुणों का अनुभव हमें दैनिक जीवन में पग-पग पर होता है । राज्यकर्ता, जनता, कर्मचारी व धार्मिक नेता, इन चार महत्त्वपूर्ण मूलभूत समाजघटकों में स्वभावदोेष बढने के कारण केवल राजकीय क्षेत्र ही नहीं; अपितु सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक आदि सभी क्षेत्र कम-अधिक मात्रा में मलिन हुए हैं । समस्त राष्ट्रवासियों को हुआ धर्म व नीतिका विस्मरण तथा उनके घोर अनादर के कारण ही राष्ट्र की दुर्दशा हुई है । संपूर्ण समाजव्यवस्था सुस्थित करने के लिए अपने दुर्गुणों का निर्मूलन व गुणों का संवर्धन करना, यह समाज के प्रत्येक घटक का प्रथम कर्तव्य है ।

हमारा मन गुण-दोषों की वास्तविकता को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होता, इसलिए मन के अभ्यास में विकारी मन व्यक्ति को पग-पग पर धोखा देता हैै । भान होने पर भी व्यक्ति के लिए अपने स्वभावदोष स्वीकारना कठिन होता है । अनेक बार अहं बाधक बनता है । मन को टटोलने की दिशा अयोग्य होती है तथा इस प्रक्रिया में विविध चरणों पर चूक भी होती हैं । अपेक्षित परिवर्तन न होने से व्यक्ति निराशा की गहरी खाई में डूब जाता हैै । अंतर्मुखता के प्रवाह में संभावित बाधाओं को दूर कर, इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर पाने हेतु आवश्यक गुण, इस प्रक्रिया के अंतर्गत विविध चरणों को आचरण में लाने हेतु आवश्यक उचित दृष्टिकोण, प्रत्येक चरण अनुरूप कृति करते समय कौनसी बातों को ध्यान में रखना तथा क्या चूक नहीं करनी चाहिए आदि विषयों से संबंधित जानकारी इस लेख में दी है ।

साधारण व्यक्ति हो या परमार्थपथ पर अग्रसर साधक, वह सर्वोच्च व चिरंतन सुख की प्राप्ति हेतु और साथ ही दुःखनिवृत्ति हेतु भी प्रयत्नशील रहता है । इन प्रयत्नों के अंतर्गत सुखप्राप्ति में संभावित बाधाओं व दुखों के कारणों को ढूंढकर उन्हें दूर करना आवश्यक है । आध्यात्मिक परिभाषा में इस प्रक्रिया को ‘अंतर्मुखता साध्य करना’ कहते हैं । सामान्य व्यक्ति की व प्राथमिक अवस्था के साधक की वृत्ति बहिर्मुखी होती है । प्रारंभ में एक मनुष्य की दृष्टि से उसे अपने निाqश्चत स्वरूपका भान ही नहीं रहता । साथ ही अपने विषय में कुछ भ्रामक धारणाएं होती हैं । इन धारणाओं के आधार पर वह वास्तविकता के विपरीत मन में एक ‘काल्पनिक प्रतिमा’ निर्माण करता है । जाने-अनजाने वह इस काल्पनिक प्रतिमा को संजोए रखने हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहता है । अंतर्मुखता के प्रथम चरण में इस काल्पनिक प्रतिमा को खंडित कर, अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना तथा उसके लिए अपने मनका अध्ययन करना आवश्यक है । स्वयं से परिचय जितना वास्तविक होगा, अंतर्मुखता की प्रक्रिया उतनी ही अधिक प्रभावी होगी ।

मानवीय मन के गुण-दोष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । इसलिए अपने मन के अध्ययन में स्वभाव के गुण-दोष ढूंढना आवश्यक है । हमारा मन गुण-दोषों की वास्तविकता को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होता, इसलिए मन के अभ्यास में विकारी मन व्यक्ति को पग-पग पर धोखा देता हैै । भान होने पर भी व्यक्ति के लिए अपने स्वभावदोष स्वीकारना कठिन होता है । अनेक बार अहं बाधक बनता है, मन को टटोलने की दिशा अयोग्य होती है तथा इस प्रक्रिया में विविध चरणों पर चूक भी होती हैं । अपेक्षित परिवर्तन न होने से व्यक्ति निराशा की गहरी खाई में डूब जाता हैै । स्वयं ही अपने गुण-दोष कैसे पहचानें तथा स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया के माध्यम से अंतर्मुखता साध्य कर सुखप्राप्ति हेतु स्वयं में आवश्यक परिवर्तन कैसे लाएं, यह जानने के लिए कृपया इस लेखमालिका के अगले लेख पढें । जिसमें अंतर्मुखताके प्रवाह में संभावित बाधाओं को दूर कर, इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक कार्यान्वित कर पाने हेतु आवश्यक गुण, इस प्रक्रियाके अंतर्गत विविध चरणों को आचरण में लाने हेतु आवश्यक उचित दृष्टिकोण, प्रत्येक चरण अनुरूप कृति करते समय कौन-सी बातों को ध्यान में रखना तथा क्या चूक नहीं करनी चाहिए आदि विषयों की विस्तृत जानकारी दी गई है ।