श्राद्धकर्म संबंधी आलोचनात्मक विचार एवं उनका खंडन

१. कहते हैं, श्राद्धकर्म उदरनिर्वाह हेतु ब्राह्मणों द्वारा रचित षड्यंत्र है !

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आलोचना : श्राद्ध ब्राह्मणों का षड्यंत्र है । इसके माध्यम से ब्राह्मणोंने अपने लिए उदरनिर्वाह की व्यवस्था की है ।

खंडन

अ. श्राद्धकर्म लाखों वर्षों से प्रचलित एक धार्मिक अनुष्ठान : लाखों वर्षों से आज तक समस्त हिंदुस्थान के प्रत्येक गांव, प्रत्येक घर और प्रत्येक स्थान पर श्राद्ध किया जाता है । उसी श्राद्धकर्म का अनुसरण किया जाता है । ‘सभी लोगों को हर बार मूर्ख नहीं बनाया जा सकता’ (You can’t fool all the people all the time !), यह एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है । इसके अनुसार यदि श्राद्धकर्म ब्राह्मणों का षड्यंत्र होता, तो क्या वे समाज को इतने वर्षों तक संभ्रमित कर पाते ? आज भी गया, त्र्यंबकेश्वर, रामटेक, प्रयाग आदि पवित्र स्थानों पर श्राद्धकर्म किया जाता है ।

आ. कलियुग के प्रभाव के कारण अन्यत्र धन का निरर्थक व्यय करनेवालों को अपने पितरों के लिए ब्राह्मणों को भोजन देना अनुचित लगना : यह कलियुग है, इसलिए अधिकतर लोग अत्यंत स्वार्थी हैं । स्वयं बढ-चढकर अपने मित्र-परिजनों के लिए बडे-बडे मद्यपान-समारोह आयोजित करते हैं और उसके लिए दिन-रात निरर्थक धन बहाने में ही आनंद मानते हैं; परंतु, जिस माता-पिता की जीवनभर सेवा करने पर भी ऋण नहीं चुकाया जा सकता, उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके ऋणों से मुक्त होने के लिए तथा उनके कल्याण के लिए शास्त्रानुसार अनुष्ठान कर एक ब्राह्मण को भी (वह ब्राह्मण उस पितर का प्रतिनिधि होता है) भोजन करवाने में लोगों को उद्यत न होते देख आश्चर्य होता है । मनुष्य कितना भी धनवान क्यों न हो, तो भी मुख्य श्राद्धकर्म में देवता के लिए एक और पितरों के लिए एक, इस प्रकार केवल दो ही ब्राह्मणों को बुलाना आवश्यक होता है । अधिकाधिक पांच ब्राह्मणों को बुलाया जाता है ।

इ. अतिथियों को भोजन देना : ‘श्राद्ध के समय अतिथियों को भोजन करवाने का अर्थ पितरों को तृप्त करना है । क्योंकि पुराण में लिखा हुआ है कि, (इस दिन) योगी, सिद्धपुरुष और देवता पृथ्वी पर श्राद्ध का अनुष्ठान देखने के लिए विचरण करते हैं’ । (इसीलिए कहा गया है, ‘अतिथि देवो भव ।’)

ई. श्राद्ध करने में असमर्थ निर्धन मनुष्य के लिए शास्त्र में सरल उपाय वर्णित : उसी प्रकार, सर्वथा असमर्थ मनुष्य यदि निर्जन अरण्य में जाकर हाथ उठाकर ऊंचे स्वर में भावपूर्वक कहता है, ‘(हे पितरो !) मैं निर्धन और अन्नहीन हूं । मुझे पितृऋण से मुक्त कीजिए’, यह कहने पर भी श्राद्ध करने का पुण्य प्राप्त होता है ।

उ. परिस्थितिवश दक्षिण दिशा में मुख कर रोना भी श्राद्धकर्म ही है । 

श्राद्धकर्म इतना सरल और उसके इतने पर्याय उपलब्ध होने पर भी, क्या यह ब्राह्मणोंद्वारा अपनी उदरपूर्ति के लिए रचा गया कपट हो सकता है ?’ (इस संबंध में अधिक विवेचन सनातन के ग्रंथ ‘श्राद्ध (महत्त्व एवं शास्त्रीय विवेचन)’ में किया गया है ।)

२. कहते हैं, श्राद्ध करना असभ्य लोगों
का कार्य है । इसकी अपेक्षा दान करना
अथवा सामाजिक संस्थाओं को दान देना ही उचित !

आलोचना : श्राद्धकर्म असभ्य लोगों का कार्य है । माता-पिता की मृत्यु-तिथि पर उनका छायाचित्र लगाकर उस पर पुष्प चढाकर धूप-दीप लगाना तथा उस निमित्त किसी सामाजिक संस्था अथवा अनाथालय को अन्न आदि दान करना ही उचित है ।

खंडन

अ. श्राद्धकर्म शास्त्रीय पद्धति से मंत्रों के साथ पूर्ण श्रद्धा से किया हुआ पितरों को प्रसन्न करनेवाला अनुष्ठान : श्राद्धकर्म के रूप में केवल दानधर्म को उचित मानना, अर्थात ‘रोग कुछ और उपाय कुछ और !’ श्राद्धकर्म, धर्मशास्त्र के अनुसार मंत्रोच्चारसहित पूर्ण श्रद्धा से किया गया अनुष्ठान है । श्राद्ध न कर, भावनावश दान करने से पितर प्रसन्न नहीं होते । क्योंकि, उस दान का फल पितरों को नहीं मिलता ।

आ. श्राद्धकर्म न करने पर अतृप्त पितरोंद्वारा रक्तसेवन किए जाने से (वंशजोंमेें) शारीरिक दोष उत्पन्न होकर उसका दुष्परिणाम संतति पर होना : ‘अर्तिपताः पितरः रुधिरं पिबन्ति ।’ अर्थात्, जिनका श्राद्ध नहीं किया जाता ऐसे अतृप्त पितर श्राद्ध न करनेवालों का रक्तसेवन करते हैं ।’ रक्त के अधिष्ठाता देवता पितर हैं । शास्त्रानुसार, श्राद्धादि कर्मकांड न करने पर वे रक्त में अतिसूक्ष्म दोष उत्पन्न करते हैं । रक्तदोषों के कारण वीर्य दुर्बल होकर संतति कृश (दुबली), अपंग और विविध प्रकार के रोगों से ग्रस्त होती है ।

इ. श्राद्धादि शास्त्रीय कर्मों से मृत पितरों को शक्ति प्राप्त होना : पितरों की वायुरूप सूक्ष्मदेह को श्राद्धादि शास्त्रीय कर्मों से शक्ति प्राप्त होती है । मृत्यु के पश्चात् दूसरी देह (यातनादेह) प्राप्त कर जीव परलोकगमन करता है । वह प्रेतरूप, अशरीरी, अर्थात उसकी देह नहीं होती । उसे नई देह प्राप्त होने के लिए श्राद्ध और औध्र्वदैहिक कर्म (मृतककर्म) करना आवश्यक है ।’

इससे ध्यान में आया होगा कि, श्राद्धकर्म के रूप में केवल दानधर्म करना अनुचित है !

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (‘घनगर्जित’, दिसंबर २००८ और जनवरी २००९)

३. कहते हैं, जीवित पिता, पितामह आदि का सम्मान करना श्राद्ध  है !

आलोचना : जीवित पिता, पितामह एवं प्रपितामह आदि का सम्मान करना ही श्राद्ध है ! – आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद

खंडन

अ. श्राद्ध मृत व्यक्ति का ही होना उचित : जीवित पिता और पितामह का सम्मान ही श्राद्ध है, इसके समर्थन में स्वामी दयानंद ने मनु के जिन श्‍लोकों का आधार लिया है, उनमें स्पष्ट लिखा है कि पिता के जीवित रहते उसका श्राद्ध नहीं किया जा सकता । श्राद्ध मृत व्यक्ति का ही करना चाहिए ।

आ. श्राद्ध से लाभ : पृथ्वी पर (दक्षिण दिशा में भूमि खोदकर वहां दर्भ (कुश) फैलाकर उस पर ३ पिंडों का दान करने से नरक में स्थित पूर्वजों का उद्धार होता है । पुत्र को हर प्रकार से मृत पिता का श्राद्ध करना चाहिए । उनके नाम एवं गोत्र का विधिवत् उच्चारण कर, पिंडदानादि कर्म करने से उन्हें हव्यकव्य की प्राप्ति होती है और वे तृप्त होते हैं । तब, स्वाभाविक ही तृप्त पूर्वज अपने परिवजनों को कष्ट नहीं देते । इतना ही नहीं, श्राद्धभोजन से उन्हें गति मिलती है और वे अगले लोक में जाते हैं । श्राद्ध से अच्छे परिणाम मिलते हैं, यह प्रयोग से भी सिद्ध हुआ है ।

अतः, आर्य समाजी दयानंद और प्रगतिवादियों का कहना असत्य है । क्योंकि, यदि इनकी बात सत्य होती, तो श्राद्ध को विधि-विधान से करने की आवश्यकता न होती ।

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (घनगर्जित, दिसंबर २००८ और जनवरी २००९)

४. अन्य पंथ और श्राद्ध

प्रश्‍न : क्या श्राद्ध करना हिन्दुओं के लिए ही अनिवार्य है ? क्या पाश्‍चात्य देशों में रहनेवाले अन्य धर्मीयों को उनके ईश्‍वर (गॉड) कष्ट नहीं पहुंचाते ?

उत्तर : हिन्दू धर्म के अतिरिक्त सभी संप्रदाय केवल उपासना संप्रदाय हैं । उनके संप्रदाय में श्राद्ध नहीं किया जाता । परंतु, वे लोग मृत व्यक्ति की कबर के पास बैठकर प्रार्थना करते हैं । यह भी एक प्रकार का श्राद्ध है ।

(ईश्‍वर किसी को कष्ट नहीं पहुंचाते । पूर्वजों को अच्छी गति मिले, इसके लिए श्राद्धकर्म की व्यवस्था की गई है । हिन्दू धर्म में इसका गहन विचार किया गया है; इसलिए यहां श्राद्ध करने की अति प्राचीन परंपरा है । यह कर्म, शास्त्रानुसार और श्रद्धापूर्वक करने से पूर्वजों से होनेवाला कष्ट घटता है । इसके सैकडों उदाहरण हैं । – संपादक)

संदर्भ : सनातन – निर्मित ग्रंथ ‘श्राद्ध (महत्त्व एवं शास्त्रीय विवेचन)’

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