गुरुपूर्णिमा पूजाविधि (मंत्र एवं अर्थसहित) (भाग २)

आषाढ पूर्णिमा अर्थात व्यासपूजन अर्थात गुरुपूर्णिमा । इस दिन ईश्वर के सगुण रूप अर्थात गुरु का मनोभाव से पूजन करते हैं । प्रस्तुत लेख में गुरुपूजन की विधि दी है । पूजा के मंत्रों का अर्थ समझने से पूजन अधिक भावपूर्ण होने में सहायता होती है । इस दृष्टि से यहां संभवतः प्रत्येक मंत्र के सामने उसका हिन्दी में अर्थ / भावार्थ दिया है । इसके अनुसार श्री गुरुपूजन कर सभी साधक, शिष्य आदि पर गुरुकृपा हो, यही श्री गुरुचरणों में प्रार्थना है !

पूजा का पहला भाग ‘गुरुपूर्णिमा पूजाविधि (मंत्र एवं अर्थसहित) (भाग १)’ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें!

१. कलशपूजन

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।

नर्मदे सिन्धुकावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥

(हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी (नदियों) इस जल में वास करें )

कलशाय नमः ।

(कलश को नमस्कार करता हूं ।)

कलशे गङ्गादितीर्थान् आवाहयामि ।

(इस कलश में गंगादितीर्थाें का आवाहन करता हूं ।)

कलशदेवताभ्यो नमः ।

(कलशदेवता को नमस्कार करता हूं ।)

सकलपूजार्थे गन्धाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।

(सर्व पूजा के लिए चंदन, फूल और अक्षत अर्पण करता हूं ।)

(कलश पर चंदन, फूल और अक्षत चढाएं ।)

 

२. घंटीपूजन

आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम् ।

कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताह्वानलक्षणम् ॥

(देवताओं के आगमन के लिए और राक्षसों को जाने के लिए देवताओं को आवाहनस्वरूप घंटी नाद कर रहा हूं ।)

घण्टायै नमः ।

(घंटी को नमस्कार हो ।)

सकलपूजार्थे गन्धाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।

(सर्व पूजा के लिए चंदन, फूल और अक्षत अर्पण करता हूं ।)

(घंटी को चंदन, फूल और अक्षत चढाएं ।)

३. दीपपूजन

भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः ।

आरोग्यं देहि पुत्रांश्च मत: शान्तिं प्रयच्छ मे ॥

(हे दीपक, आप ब्रह्मस्वरूप हैं । ज्योतिषों के अचल स्वामी हैं । (आप) हमें आरोग्य दीजिए, पुत्र दीजिए, बुद्धि और शांति दीजिए ।)

दीपदेवताभ्यो नमः ।

(दीपक देवता को नमस्कार करता हूं ।)

सकलपूजार्थे गन्धाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।

(सर्व पूजा के लिए चंदन, फूल और अक्षत अर्पण करता हूं ।)

(समई को चंदन, फूल और अक्षत चढाएं ।)

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपि वा ।

यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥

((अंर्त-बाह्य) स्वच्छ हो अथवा अस्वच्छ हो, किसी भी अवस्था में हो । जो (मनुष्य) कमलनयन (श्रीविष्णु का) स्मरण करता है, वह भीतर तथा बाहर से शुद्ध होता है ।)

(इस मंत्र से तुलसीपत्र जल में भिगोकर पूजासामग्री तथा अपनी देह पर जल प्रोक्षण करें ।)

इसके पश्चात सद्गुरु का ध्यान करें ।

अथ ध्यानं –

(अब मैं (सद्गुरु का) ध्यान करता हूं ।)

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं ।

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं ।

भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरं तं नमामि ॥

(ब्रह्मरूप, आनंदरूप, परमोच्च सुख देनेवाले, केवल ज्ञानस्वरूप, द्वन्द्वरहित, आकाश के समान (निराकार), ‘तत्त्वमसि’ वाक्य का लक्ष्य (वह आप हैं, ऐसा वेदवाक्य जिसे उद्देश्य कर है उन्हें), एक ही एक, नित्य, शुद्ध, स्थिर, सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी, भावातीत, गुणातीत सद्गुरु को मैं नमस्कार करता हूं ।)

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । ध्यायामि ।

(श्री सद्गुरु को नमन कर मैं ध्यान करता हूं ।)

(गुरुपूजन में आगे दिए १५ उपचार हैं, उनमें ३ से ६ विधियों के समय हाथ पर पानी लेकर वह गुरु के छायाचित्र पर न चढाकर, ‘प्रत्यक्ष श्री सद्गुरु सामने बैठे हैं तथा उनके चरणों पर जल चढा रहे हैं’, ऐसा भाव रखकर वह जल ताम्रपात्र में छोडें ।)

इसके पश्चात प्रत्येक विधि के समय निम्नांकित मंत्र बोलकर सद्गुरु की पूजा करें ।

नमो गुरुभ्यो गुरुपादुकाभ्यो नम: परेभ्य: परपादुकाभ्य: ।

आचार्यसिद्धेश्वरपादुकाभ्यो नमोऽस्तु लक्ष्मीपतिपादुकाभ्य: ॥

(गुरु को नमस्कार करता हूं । गुरु की पादुकाओं को नमस्कार करता हूं । परा के गुरु को (परात्पर गुरु को) नमस्कार करता हूं । परात्पर गुरु की पादुकाओं को नमस्कार करता हूं । ईश्वरप्राप्ति किए हुए आचार्य की पादुकाओं को नमस्कार करता हूं । लक्ष्मीपति श्रीविष्णु की पादुकाओं को नमस्कार करता हूं ।)

१.श्री सद्गुरुभ्यो नमः । आवाहयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर आवाहन करता हूं । सद्गुरु को मन से आवाहन करें ।)

२. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर आसन के प्रति अक्षत अर्पण करता हूं ।)

( प्रतिमा पर अक्षत चढाएं ।)

३. श्री सद्गुरुभ्यो नम: । पाद्यं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर पैर धोने के लिए पानी अर्पित करता हूं ।)

(ताम्रपात्र में पानी छोडें ।)

४. श्री सद्गुरुभ्यो नम: । अर्घ्यं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर अर्घ्य के लिए पानी अर्पित करता हूं ।)

(ताम्रपात्र में पानी छोडें ।)

५. श्री सद्गुरुभ्यो नम: । आचमनीयं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर आचमन के लिए पानी अर्पित करता हूं ।)

(ताम्रपात्र में पानी छोडें ।)

६. श्री सद्गुरुभ्यो नम: । स्नानं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर स्नान के लिए पानी अर्पित करता हूं ।)

(ताम्रपात्र में पानी छोडें ।)

७. श्री सद्गुरुभ्यो नम: । वस्त्रं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर वस्त्र अर्पित करता हूं ।)

(वस्त्र अर्पण करें ।)

८. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । उपवीतं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर उपवीत अर्पण करता हूं ।)

(यज्ञोपवित अथवा अक्षत अर्पण करें और हाथ जोडें ।)

९. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । चन्दनं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु के चरणों में नमस्कार कर गंध अर्पित करें ।)

(गुरु के चरणों में गंध-पुष्प चढाएं ।)

१०. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । मङ्गलार्थे कुङ्कुमं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर मंगल स्वरूप कुमकुम अर्पित करें ।)

(कुमकुम लगाएं ।)

११. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । अलङ्कारार्थे अक्षतान् समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर अलंकार के रूप में अक्षत अर्पित करें ।)

(अक्षत चढाएं ।)

१२. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । पूजार्थे ऋतुकालोद्भवपुष्पाणि समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर वर्तमान ऋतु में खिलनेवाले फूल अर्पण करता हूं ।)

(फूल अर्पण कर हार डालें ।)

१३. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । धूपं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर धूप अर्पण करता हूं ।)

(गुरु की अगरबत्ती से आरती करें ।)

१४. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । दीपं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर दीपक से आरती करता हूं ।)

(गुरु की निरांजन से आरती करें ।)

१५. श्री सद्गुरुभ्यो नमः । नैवेद्यं निवेदयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर आगे रखा नैवेद्य निवेदन करता हूं ।)

प्रथम देवता के सामने भूमि पर आचमनी से जल डालें । अनामिका और मध्यमा से चौकोर घडी की दिशा में बनाएं । उस पर नैवेद्य रखें । दाएं हाथ में ६ तुलसी के पत्ते लें । उस पर आचमनी से पानी डालें तथा वह पानी सामने रखे हुए नैवेद्य के आसपास प्ररिक्रमा की दिशा में फेरकर उस पर एक बार प्रोक्षण करें । उन पर अपना बांया हाथ अपनी छाती पर रखकर दायां हाथ नैवेद्य से देवता तक निवाला खिलाते हैं वैसा ले जाएं ।

उस समय आगे दिए मंत्र बोलें –

प्राणाय स्वाहा ।

(यह प्राणों के लिए अर्पण कर रहा हूं ।)

अपानाय स्वाहा ।

(यह अपान के लिए अर्पण कर रहा हूं ।)

व्यानाय स्वाहा ।

(यह व्यान के लिए अर्पण कर रहा हूं ।)

उदानाय स्वाहा ।

(यह उदान के लिए अर्पण कर रहा हूं ।)

समानाय स्वाहा ।

(यह समान के लिए अर्पण कर रहा हूं ।)

ब्रह्मणे स्वाहा ।

(यह ब्रह्म को अर्पण कर रहा हूं ।)

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर नैवेद्य अर्पण करता हूं ।)

मध्ये पानीयं समर्पयामि ।

(बीच में पीने के लिए पानी अर्पण कर रहा हूं ।)

उत्तरापोशनं समर्पयामि ।

(आपोशन के लिए पानी अर्पण कर रहा हूं ।)

हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि ।

(हाथ धोने के लिए पानी अर्पण कर रहा हूं ।)

मुखप्रक्षालनं समर्पयामि ।

(मुंह धोने के लिए पानी अर्पण कर रहा हूं ।)

करोद्वर्तनार्थे चन्दनं समर्पयामि ।

(हाथ पर लगाने के लिए चंदन अर्पण कर रहा हूं ।)

मुखवासार्थे पूगीफलताम्बूलं समर्पयामि ।

(मुखवास के लिए पान-सुपारी अर्पण कर रहा हूं)

(‘समर्पयामि’ कहते हुए आचमनी से दाएं हाथ पर पानी लेकर ताम्रपात्र में छोडें ।)

अब हम सद्गुरु की आरती करते है !

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । मङ्गलार्तिक्यदीपं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर मंगलारती अर्पण करता हूं ।)

 

४. आरती

‘ज्योत से ज्योत जगाओ ।’ अथवा परंपरानुसार गुरु की अन्य आरती बोलें ।

(मंगलारती करें ।)

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । कर्पूरदीपं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर कर्पूर की आरती करता हूं । )

(कर्पूर की आरती करें ।)

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । नमस्कारं समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार करता हूं ।)

(सद्गुरु को साष्टांग नमस्कार करें ।)

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । प्रदक्षिणां समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरु को नमस्कार कर प्रदक्षिणा अर्पण करता हूं ।)

(घडी की सुइयों की दिशा में अर्थात बाईं ओर से दाईं ओर गोल घूमकर स्वयं के आसपास ३ प्ररिक्रमा करें ।)

श्री सद्गुरुभ्यो नमः । प्रार्थनां समर्पयामि ।

(श्री सद्गुरुओं को नमस्कार कर प्रार्थना अर्पण करता हूं ।)

(हाथ जोडकर प्रार्थना करें ।)

आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम् ।

पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥

(हे परमेश्वर, मैं नहीं जानता कि ‘आपको आवाहन कैसे करूं, आपकी उपासना कैसे करूं, आपकी पूजा कैसे करूं । आप मुझे क्षमा करें ।)

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।

यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥

(हे देवेश्वर, मंत्र, क्रिया अथवा भक्ति नहीं है, ऐसा मैं हूं तथा मेरी यह पूजा आप परिपूर्ण मान लीजिए । )

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् ।

करोमि यद्यत् सकलं परस्मै सद्गुरवे इति समर्पये तत् ॥

(हे गुरुदेव, शरीर से, वाणी से, मन से, (अन्य) इंद्रियों से, बुद्धि से, आत्मा से अथवा प्रकृतिस्वभावानुसार मैं जो जो करता हूं, वह मैं आपको अर्पण कर रहा हूं ।)

अनेन कृतपूजनेन श्री गुरुपरंपरास्थ सद्गुरुः प्रीयंताम् ।

(किए गए इस पूजन से सद्गुरु प्रसन्न हों ।)

(यह कहकर दाएं हाथ पर पानी लेकर छोडें तथा दो बार आचमन करें ।)

 

५. कृतज्ञता

श्री गुरुदेव की कृपा से आज का यह कार्यक्रम संपन्न हुआ, इसलिए उनके चरणों में कृतज्ञता व्यक्त कर रुकते हैं ।

गुरुपरंपरा पूजन के उपरांत विसर्जन के समय निम्नांकित श्लोक बोलें ।

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवात् ।

इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ॥

(पूजा स्वीकार कर सर्व देवता इष्टकामसिद्धि के लिए पुन: आने के लिए अपने-अपने स्थान पर प्रस्थान करें ।)

श्री गणपतिपूजन किए हुए नारियल पर अक्षत चढाकर श्री गणपति का विसर्जन करें ।

 

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