‘गुरु सर्व प्रकार से साधक का भार उठाते हैं’, इसकी साधक को हुई प्रतीति !

श्री. प्रेमप्रकाश सिंह

२२.१२.२०१९ को मैं ओडिशा राज्य के राउरकेला से भुवनेश्वर’ रेलवे द्वारा यात्रा कर रहा था । मैंने अपना बैग अपनी आसंदी (सीट) के नीचे रखा था । रात को मैं ऊपर के आसन पर सोने गया । कुछ समय उपरांत मुझे आवाज आई कि ‘‘यह बैग किसका है ? यह बैग चोर लेकर गया था ।’’ मैंने लेटे-लेटे ही ‘किसका बैग है ?’ इस विचार से नीचे झुककर देखा । तब देखा वह बैग मेरा ही था । मैंने नीचे उतरकर टिकट परीक्षक (टिकट चेकर) से इस विषय में जानकर लिया ।

तदुपरांत समझ में आया कि चोर मेरा बैग लेकर डिब्बे से उतर गया था । उस समय टिकट परीक्षक को उस पर संशय आया । उन्होंने चोर के पास जाकर बैग के बारे में पूछताछ की । वह चोर समाधानकारक उत्तर नहीं दे पाया । तब टिकट परीक्षक उसे पकडकर हमारे डिब्बे में ले आए और आवाज देने लगे कि यह बैग किसका है ?’’ मैंने उन्हें कहा कि यह बैग मेरा है । तब उन्होंने वह बैग मुझे देकर रेलवे सुरक्षा दल के सैनिकों को (जवानों को) बुलाकर मुझसे बैग के संदर्भ में पूछताछ कर औपचारिक पूर्ति की । उस चोर को सीआरपीएफ’ (सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स) को सौंपकर टिकट परीक्षक निकल गया ।

‘गुरुदेव किस प्रकार शिष्य की सभी बातों की ओर ध्यान रखते हैं !’, इस विचार से मुझे गुरुदेव के प्रति पुनः-पुन: कृतज्ञता व्यक्त हो रही थी । वे अपने शिष्य का सर्व प्रकार से भार उठाते हैं । आज भी मुझे इस प्रसंग का स्मरण होने पर मन कृतज्ञता से भर आता है ।

– श्री. प्रेमप्रकाश सिंह, ओडिशा (२२.१२.२०१९)

(यहां प्रकाशित अनुभूति ‘जहां भाव वहां भगवान’ इस उक्ति अनुसार साधकों की व्यक्तिगत अनुभूति है । सभी को वैसी ही अनुभूति हो, ऐसा नहीं है । – संपादक)

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