अंनिस, समान संगठनों और प्रगतिवादियों द्वारा वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य की आलोचना

२० अगस्त को अंनिस जैसे संगठन, इसके साथ ही आधुनिकतावादियों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिन मनाया जाता है । उसी पार्श्‍वभूमि पर १९ अगस्त को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था । उस कार्यक्रम में उपस्थित सभी वक्ताओं ने टीका और बुद्धिभेद करनेवाले मत प्रस्तुत किए । सर्वत्र के हिन्दुओं को इससे बोध लेकर योग्य विचारप्रक्रिया कैसी होनी चाहिए, यह ध्यान में आए, इसके लिए टिप्पणी और कुछ गलत मतों के विषय में खंडन दे रहे हैं ।

 

१. डॉ. जयंत नारळीकर के अतार्किक विधान

अ. भगवद्गगीता में एक श्‍लोक है

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ।

अर्थात श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘यह ज्ञान मैंने तुम्हें (अर्जुन को) दिया; परंतु इस पर तुम विचार करो और फिर तुम्हें क्या करना है, वह तय करो ।’ यह भाग मुझे वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रस्तावना करने के लिए योग्य लगता है । (‘भगवान काल्पनिक हैं’, ऐसा कहनेवाले ही अब श्रीकृष्ण द्वारा बताए श्‍लोक पढकर बता रहे हैं ! यदि ऐसा है, तो भगवान श्रीकृष्ण का अस्तित्व नारळीकर मान्य करेंगे क्या ? – संपादक)

आ. अनेक बार हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण की उपेक्षा कर, किसी पूर्व कल्पना के आधार पर कार्य करते हैं । टाटा इन्स्टिट्यूट ऑफ फन्डामेन्टल रिसर्च में रहते मैंने देखा था कि बी.ए.आर्.सी. और टी.आय.एफ.आर्., इन संस्थाओं में विश्‍वकर्मा जयंती के दिन यंत्रों की पूजा करते हैं । (भगवान विश्‍वकर्मा, देवताओं के वास्तुकलातज्ञ हैं । संशोधकों द्वारा उनकी पूजा करने में गलत क्या ? नारळीकर ने यदि ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखा होता कि पूजा से यंत्र और वातावरण पर होनेवाला परिणाम देखना चाहिए, तो बहुधा उन्हें पूजा का महत्त्व समझ में आया होता ! – संपादक)

 

२. अध्यात्म, ज्योतिषविद्या से अनभिज्ञ सत्यजित रथ !

अ. ‘क्व सूर्य प्रभवो वंश: क्व चाल्पविषया मति: तितीर्षु दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥’

कहां वह सूर्योत्पन्न वंश (रघुवंश) और कहां मेरी अल्पमति ! तो क्या हमें अपने प्रश्‍न सुलझाने के लिए रघुवंश की प्रतीक्षा करनी चाहिए ? (सूर्य कुलोत्पन्न रघुवंश के विषय में महान कवि संत कालिदास ने अपना भाव व्यक्त किया है । यह समझने के लिए भावस्थिति का अनुभव होना आवश्यक है । – संपादक)

आ. शोषकों ने वैज्ञानिकता को नियंत्रण में लेकर हमें उससे अलग किया और हमें मंदिर, कुंडलियां दीं ।  (आज अनेक विदेशी शास्त्रज्ञ भारत में आकर मंदिर, ज्योतिषशास्त्र के विषय में संशोधन और अभ्यास कर, वास्तविक वैज्ञानिक दृष्टिकोण संजो रहे हैं । यदि कोई निश्‍चित ही कर ले कि ‘बुद्धि और मन की चौखट बनाकर उससे बाहर निकलना ही नहीं है’, तो अध्यात्मशास्त्र की व्यापकता जो मन और बुद्धि के परे है, वह  कैसे ध्यान में आएगी ? प्राचीन इतिहास में हिन्दुओं के ऋषि-मुनियों ने अनेक शोध लगाए हैं । इसके प्रमाण अब भी मिलते हैं । ऐसा होते हुए भी जिसने अपनी बुद्धि विदेशियों के पास गिरवी रख दी हो, वे महान भारतीय परंपरा क्या समझेंगे ? – संपादक)

 

३. वैज्ञानिकता का बुरखा डालकर दैवी अस्तित्व नकारनेवाली मुक्ता दाभोलकर के विधान

‘विसर्जित गणेशमूर्ति दान करें’ इस उपक्रम से २ लाख ६० सहस्र गणेशमूर्ति गढ्ढों में जाने से बच गईं । (‘विसर्जन’ इस धार्मिक कृति के विरोध में ‘मूर्ति पानी में गिरने से बचाना’ इस अधार्मिक अभियान चलानेवाले, प्रदूषणकारी कागदी लुगदी की मूर्ति को अभ्यासहीन प्रोत्साहन देनेवाले  (कहते हैं) समाजमन पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अंकित कर रहे हैं, यही हास्यास्पद है ! – संपादक)

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात