धायरी, पुणे के स्वयंभू देवस्थान श्री धारेश्‍वर !


सवेरे की मंगल बेला पर अथवा शाम की गोधूलि बेला पर धायरी गांव में स्थित धारेश्‍वरजी का मंदिर के दर्शन का अनुपम आनंद है । बरगद, पीपल आदि वृक्षों से घिरे मार्ग से हम मंदिर की ओर जाते हैं । सीढियां चढते हुए दोनों ओर इन घने वृक्षों की छाया होती है । गर्भगृह में स्वयंभू प्रसन्न शिवलिंग को देखते ही हाथ अपनेआप जुड जाते हैं ।

धारेश्‍वर मंदिर, यह साढेचार एकड परिसर में फैला है । वर्तमान के मंदिर का स्वरूप १९७८ में निर्माण हुआ है । मंदिर के आसपास का परिसर हराभरा है । पीछे की पहाडी पर स्थित खंडोबा के मंदिर में स्थानीय लोग बीच-बीच में जाते हैं । श्री धारेश्‍वरजी का मंदिर ३५० वर्ष प्राचीन है । धायरी गांव में रायकर घराने के काफी लोग रहते हैं । इस घर के जैतुजीबाबा रायकर, इन महापुरुष की शिवभक्ति से यह मंदिर निर्माण हुआ है । आजकल श्री धारेश्‍वर महादेव संस्थान, धायरी की ओर से इस मंदिर का सर्व कार्यभार देखा जाता है । इस मंदिर की कथा आगे दिए अनुसार है ।

रायकर घराने के मूलपुरुष जैतुजीबाबा, शिवभक्त थे । वे प्रतिदिन सातारा जिले के शिखर शिंगणापुर, दर्शन के लिए जाते थे । सवेरे जाकर शाम को लौटते थे । एक दिन उन्हें शिखर शिंगणापुर से लौटते समय अंधेरा हो गया । वे घबरा गए; परंतु तब साक्षात भगवान शंकर साधु के रूप में आए और बोले, ‘‘तुम घबराओ मत । मैं तुम्हारे साथ हूं । केवल अपने घर तक पहुंचने तक तुम पीछे मुडकर न देखना ।’’ यह सुनकर जैतुजीबाबा घर की ओर निकल पडे । अब जहां धारेश्‍वर मंदिर है, वहां पहुंचने पर बाबा को लगा अब हम अपने गांव पहुंच गए हैं । इसलिए पीछे मुडकर देखने में कोई अडचन नहीं । जैसे ही वे पीछे मुडते हैं, तो क्या देखते हैं ? साधु के रूप में साक्षात भगवान खडे हैं; जो उनके पीछे मुडते ही अदृश्य हो जाते हैं और उस स्थान पर स्वयंभू शिवलिंग तैयार हो गया । शिखर शिंगणापुर में जिस रूप में स्वयंभू शिवलिंग है, वैसा ही यहां भी है ।

तदुपरांत जैतुजीबाबा ने उस स्थान पर छोटा-सा मंदिर बनवाया । कुछ ही दिनों उपरांत जैतुजीबाबा बहुत ही थक गए । उनके लिए अब घर से मंदिर तक आना भी कठिन होने लगा । इसलिए वे अपने निवासस्थान से ही नामस्मरण करते हुए पानी भूमि पर डालने लगे । उस स्थान पर कुछ समय पश्‍चात शिवलिंग तैयार हो गया । आज उनके घर को ‘देववाडा’ संबोधित किया जाता है ।

आगे उनके मन में जीवित समाधि लेने के विचार आने लगे । तब उन्होंने अपने पुत्र से वहां गढ्ढा खुदवाने के लिए कहा । पुत्र ने गढ्ढा खोदना आरंभ किया । पहला गढ्ढा खोदने पर, उसमें शिवलिंग प्रकट हो गया । दूसरा गढ्ढा खोदा, तो वहां भी शिवलिंग प्रकट हो गया । ऐसे ७ गढ्ढे खोदे और ७ शिवलिंग प्रकट हुए । पुत्र ने अपने पिता को सारी बात बताई । तब जैतुजीबाबा ने प्रार्थना की और आठवें स्थान पर शिवलिंग नहीं निकला । फिर वहीं पर जैतुजीबाबा ने जीवित समाधि ली । आज भी यहां वह संजीवन समाधि और ७ शिवलिंग देखने मिलते हैं । थोडा चढकर ऊपर आने पर दाईं ओर शनि मंदिर है । मूर्ति पुरानी ही है; परंतु प्रतिष्ठापना चार-पांच वर्षों पूर्व ही हुई है । मुख्य सीढियां चढकर ऊपर आने पर दो भारी भरकम दीपमालाएं अपना स्वागत करती हैं । उन दोनों के मध्य नंदी शिवमंदिर की ओर मुख कर स्थापित हैं । सामने के बहुत विशाल प्रांगण में मंदिर है । सभामंडप भी स्वच्छ है और वहां शिवभक्त भगवान का जप करते हुए दिखाई देते हैं । गर्भगृह के ये प्रसन्न शिवलिंग को देखते ही हाथ अपनेआप जुड जाते हैं । तांबे के पात्र से अभिषेक की धार अखंड पडती रहती है । जैतुजीबाबा की शिवभक्ति से ही यह स्वयंभू स्थान निर्माण हुआ है । मंदिर में प्रतिदिन सवेरे ६ बजे पूजा और अभिषेक प्रारंभ होता है । शाम ७.३० बजे पुन: आरती होती है । दोपहर १२ से ४ तक, दर्शन बंद होते हैं ।

चैत्र वद्य चतुर्थी को श्री धारेश्‍वर में बडा मेला लगता है । उसका नियोजन नवसंवत्सरारंभ (हिन्दू नववर्ष के दिन) पर किया जाता है । महादेव की कावड की यात्रा नववर्ष के आठवें दिन शिखर शिंगणापुर के लिए रवाना होती है । धायरी गाव की लाठी अथवा कावड को शिंगणापुर में प्रथम मान दिया जाता है । इसका उल्लेख छत्रपति शिवाजी महाराजजी के अपने ताम्रपत्र से २० माह इसवीसन १३२४ चैत्र में किया है । अगले बारह दिनों में वह लौटती है । इस कावड यात्रा में जानेवाले लोगों की सर्व व्यवस्था संस्था की ओर से की जाती है । कावड लौटने पर बडा उत्सव मनाया जाता है । इसमें भजन, कीर्तन, प्रवचन आदि से परिसर भक्तिमय हो जाता है । मुख्य धारेश्‍वर मंदिर के पीछे बरगद की छाया में दत्तमंदिर है । उसके आगे अक्कलकोट स्वामींजी के मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया है । संपूर्ण परिसर को देखने पर वातावरण में अत्यंत प्रसन्नता अनुभव होती है ।

ऐसे निसर्गरम्य वातावरण में स्थित स्वयंभू मंदिर के प्रांगण में महाशिवरात्रि के उपलक्ष्य में सनातन-निर्मित ग्रंथ और सात्त्विक उत्पादों का प्रदर्शन लगाया जाता है । भाविक उसका अवश्य लाभ उठाएं । राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक उपासना का बल लोगों में निर्माण हो, यह श्री धारेश्‍वरजी के श्रीचरणों में प्रार्थना है !

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात