गोटिपुआ

हिन्दुओ, साधना एवं उपासना से रहित पाश्‍चात्य नृत्यों की तुलना में अध्यात्म से जोडनेवाली हिन्दू संस्कृति के पारंपरिक नृत्यों का संवर्धन करें !

 

ओडिशा के नृत्यसमूह से रामनाथी, गोवा के
सनातन आश्रम में गोटिपुआ नामक विशेष नृत्य का प्रस्तुतीकरण

भगवान से अनुसंधान साधने के इस
दुर्लभ नृत्यप्रकार से उपस्थित साधकों की भावजागृति

गोटिपुआ नृत्य प्रस्तुत करते हुए ओडिशा का नृत्यसमूह

‘नृत्य,’ यह चौंसठ कलाओं में से एक कला है । भारत के विविध प्रांतों में विविध प्रकार की नृत्यकलाएं देखने मिलती हैं । उनमें से ‘गोटिपुआ’ ओडिशा का एक नृत्य है । कुछ समय पूर्व ही ओडिशा का ‘गोटिपुआ’ नृत्यसमूह सनातन के रामनाथी आश्रम में आया था । उस समय इस नृत्यसमूह के प्रशिक्षक श्री. बटक्रिश्‍ना दास ने इस निराले अनूठे नृत्य के विषय में विशेष जानकारी दी । यह जानकारी हम अपने पाठकों के लिए यहां दे रहे हैं ।

 

१. ‘गोटिपुआ’ शब्द का अर्थ

‘गोटिपुआ’ ओडिया भाषा का एक शब्द है । उसमें से ‘गोटि’, शब्द का अर्थ ‘एक’ और ‘पुआ’ शब्द का अर्थ ‘बालक’ है । अर्थात ‘गोटिपुआ’ शब्द का अर्थ है ‘एक बालक’ ।

 

२. ‘गोटिपुआ’ नृत्य का इतिहास

गोटिपुआ इस नृत्य का इतिहास प्राचीन है । ओडिशा मेें श्री देव जगन्नाथ का सुप्रसिद्ध मंदिर है । उस मंदिर में श्री देव जगन्नाथ से पूर्णतः एकनिष्ठ हुई महिलाएं (देवदासियों के समान) रात्रि के समय देव जगन्नाथ को अच्छी निद्रा आने के लिए भावपूर्ण नृत्य करती थीं । ये महिलाएं देवालय के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी अपनी नृत्यकला प्रस्तुत नहीं करती थीं । कालांतर से ऐसी महिलाओं की संख्या घटने लगी । सोलहवीं शताब्दी में ओडिशा के राजा रामचंद्र देव ने महिलाओं के स्थान पर ६ से १५ वर्ष के वयोवर्ग के बालकों को स्त्रीवेष धारण करवाकर यह नृत्य करवाना प्रारंभ किया । तब से बालक ही स्त्रीवेष धारण कर यह नृत्य करने लगे ।

 

३. देवताओं से संबंधित विषयों पर आधारित नृत्य !

‘गोटिपुआ’ नृत्य में ६ सेे १५ वर्ष के वयोवर्ग के बालक नृत्य करते हैं । इस वयोवर्ग के बालकों में अहं अल्प होता है तथा वे निश्छल होते हैं; इसलिए इस वयोवर्ग का चयन किया गया है । नृत्य करते समय वे बालक स्त्रीवेष धारण करते हैं । वे राधा-कृष्ण के मध्य के भक्तिमय संबंध, शिव-शक्ति आदि विषयों पर आधारित गीतों पर ही नृत्य करते हैं । वर्तमान में शास्त्रीय नृत्यों में प्रसिद्ध ‘ओडिशी’ नृत्य की उत्पत्ति ‘गोटिपुआ’ नृत्य से ही हुई है । वर्तमान में ‘ओडिशी’ नृत्य सिखानेवाले जो गुरु हैं, वह अपनी बाल्यावस्था में ‘गोटिपुआ’ नृत्य ही करते थे । सुप्रसिद्ध ‘ओडिशी’ नृत्यकलाकार और नृत्यप्रशिक्षक गुरु केलुचरण मोहापात्रा इसके उत्तम उदाहरण हैं ।

 

४. ‘दशभुजा गोटिपुआ ओडिशी नृत्य
परिषद’ : ‘गोटिपुआ’ नृत्य का प्रशिक्षण देनेवाला गुरुकुल

यह दुर्लभ नृत्य अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने हेतु ‘दशभुजा गोटिपुआ ओडिशी नृत्य परिषद’ की स्थापना की गई । गुरु मागुनि दास के रघुराजपुर (ओडिशा) नामक गांव में इस स्वयंसेवी संस्था का कार्य चलता है । यह एक प्रकार का गुरुकुल ही है । यहां नृत्य सीखने हेतु आनेवाले बालक यहीं निवास करते हैं । ‘दशभुजा गोटिपुआ ओडिशी नृत्य परिषद’ ने नृत्य के प्रशिक्षण के साथ ही विद्यार्थियों को कक्षा १० वीं तक शिक्षा देने की भी व्यवस्था की है । नृत्य सीखने में न्यूनतम ६ वर्ष यहां रहकर अभ्यास करना पडता है । गत ३० वर्षों से यह संस्था इस नृत्य का प्रसार कर रही है । इस संस्था ने अभी तक इस नृत्य में १०० बालकों को निपुण किया है ।

 

५. ‘गोटिपुआ’ नृत्य के संरक्षक पद्मश्री गुरु मागुनि दास !

पद्मश्री गुरु मागुनि दास ‘गोटिपुआ’ नृत्य के संरक्षक के रूप में कार्य कर रहे हैं । गत ३० वर्षों के अथक प्रयासों से उन्होंने दुर्लभ ‘गोटिपुआ’ नृत्य को ऊर्जितावस्था प्राप्त करवाई है । उनकी आयु ८५ वर्ष है; परंतु वह आए हुए नए बालकों को इस नृत्य की शिक्षा देेते हैं । केंद्रशासन ने वर्ष २००४ में उन्हें ‘पद्मश्री पुरस्कार’ देकर गौरवान्वित किया था । वर्ष १९९६ में मध्यप्रदेश शासन ने उन्हें ‘तुलसी पुरस्कार’ देकर तथा वर्ष १९९१ में ‘ओडिशा संगीत नाटक अकादमी’ ने उनका सत्कार किया था ।

 

मनुष्य का अंतिम ध्येय ‘आध्यात्मिक उन्नति’
साध्य करवानेवाली भारतीय कलाओं को स्वीकार करें !

भारत की वर्तमान युवा पीढी पाश्‍चात्य नृत्य की ओर आकर्षित होती दिखाई देती है । उनसे मनोरंजन तो होता है; परंतु पाश्‍चात्य नृत्यों से साधना अथवा उपासना साध्य नहीं होती और वह आसुरी वृत्ति के मार्ग पर अग्रसर होता हुआ दिखाई देता है । हिन्दू संस्कृति के पारंपरिक नृत्य ईश्‍वर से अनुसंधान करवानेवाले हैं । दुर्भाग्यवश इन नृत्यों की ओर अनदेखी की जाती है । ईश्‍वर से अनुसंधान करनेवाले ‘गोटिपुआ’ जैसी नृत्यकला और अन्य भारतीय पारंपरिक कला के प्रकारों से व्यक्ति को कला का आनंद प्राप्त होने के साथ-साथ मनुष्य जीवन के अंतिम ध्येय अर्थात आध्यात्मिक उन्नति साध्य करना भी सहज संभव होता है ।

रामनाथी (गोवा) : आध्यात्मिक स्तर पर नृत्यप्रकार प्रस्तुत करनेवाले ओडिशा के रघुराजपुर के नृत्यसमूह ने गोवा स्थित रामनाथी के सनातन के आश्रम में गोटिपुआ नृत्य प्रस्तुत किया । लगभग डेढ घंटे चले इस कार्यक्रम में कलाकारों ने श्रीविष्णु के दशावतार, श्रीकृष्ण-राधा, महाभारत के द्रौपदी-वस्त्रहरण आदि प्रसंगों पर आधारित नृत्य का विशेषतापूर्ण प्रस्तुतीकरण किया । कार्यक्रम के प्रारंभ में कलाकारों द्वारा नृत्य के माध्यम से पुष्पांजली अर्पण कर वित्तिध देवताओं की वंदना की । तदुपरांत श्रीविष्णु के विविध रूप, दशावतार, राधा-कृष्ण, श्री जगन्नाथ देवतापूजन पर आधारित नृत्य प्रस्तुत किया । भगवान से अनुसंधान साधनेवाली इस दुर्लभ कला के अविष्कार के कारण उपस्थित साधकों का भाव जागृत हुआ ।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात