देवी महाकाली के आशीर्वाद से संस्कृत में अतुलनीय काव्यरचना करनेवाले महाकवी कालिदास !

कालिदास प्राचीन भारत के एक संस्कृत नाटककार एवं कवि थे । ‘मेघदूत’, ‘रघुवंशम्’, ‘कुमारसंभवम्’ इत्यादि संस्कृत महाकाव्यों के कर्ता इस नाम से वे विख्यात थे । ऐसा माना जाता है कि, लगभग चवथे शतक से छठे शतक की कालावधी में अथवा गुप्त साम्राज्य के कालखंड में उनका जन्म हुआ है । उनके ‘विक्रमोर्वशीयम्’, ‘मालविकाग्निमित्रम्’ आणि ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ नाम के संस्कृत नाटक भी प्रसिद्ध हैं ।

 

प्रारंभ में कालिदास अनपढ, गवार एवं मूर्ख थे; किंतु
उनके जीवन में यह परिवर्तन काशी की राजकन्या के कारण हुआ है ।

‘उज्जैन का सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्न में से एक रत्न अर्थात् कालिदास । कालिदास का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ । वह शिवजी का उपासक था । प्रारंभ में कालिदास अनपढ, गवार एवं मूर्ख था; इसलिए कोई भी उसके साथ खिलवाड किया करता था; किंतु उनके जीवन में काशी की राजकन्या के कारण परिवर्तन हुआ । वह विलक्षण बुद्धिमान एवं प्रतिभावान पंडिता थी । वाङ्मय, कला इत्यादि विद्याओं में वह अग्रेसर थी । उसके साथ विवाह करने हेतु आए अनेक युवकों को उसने बुद्धि के तेज से पराजित किया था । उन सभी असंतुष्ट युवकों ने उस राजकन्या का बदला लेने का निश्चय किया । उन्होंने एक महामूर्ख युवक को पकडकर उसे अपरिमित धन, उत्तम अन्न तथा सुंदर वस्त्र प्रदान करने का प्रलोभन दिखाया । केवल राजकुमारी के सामने उसे खडा रहना था । राजकुमारी जो कुछ प्रश्न पूछेगी, उसका उत्तर देने की अपेक्षा मौन रहना, अवाक होकर रहना । उस महामूर्ख को सुंदर वेशभूषा परिधान कर सजाया गया । उसे अलंकार धारण किए गए तथा अत्यंत बुद्धिमान, प्रतिभावान दार्शनिक के रूप में राजकुमारी के सामने खडा किया ।

 

वह महामूर्ख है, यह बात राजकुमारी के
ध्यान में आई तथा उसने उसे राजमहल से बाहर निकाला ।

जब राजकुमारी द्वारा गहरे प्रश्न पूछे गए, उस समय वह केवल गर्दन हिलाता रहा तथा चमत्कारिक नजर से राजकुमारी की ओर देखता था । उन चतुर लोगों ने उसकी दृष्टिक्षेप का निर्वचन करने हेतु उस बात का अर्थ यह बताया कि, ‘अत्यंत प्रतिभासंपन्न एवं सयानेपन की परिसीमा पार करनेवाले उत्तर उनके मौन से व्यक्त हो रहे हैं ।’ उनकी इस बात पर राजकुमारी का भी समाधान हुआ । राजकुमारी का विवाह उसके साथ हुआ तथा कुछ ही दिनों में उसके ध्यान में आया कि, वह महामूर्ख है । उसने उस महामूर्ख की भयंकर निंदा कर उसे राजमहल से बाहर निकाला । उसे बताया कि, जबतक तू पंडित नहीं बनता, तबतक यहां पैर नहीं रखना ।

 

एक रात्रि में अचानक प्रतिमा में से महाकाली प्रगट
हुई तथा उस दिव्य देवता ने उसके जीभ पर मातृका लिखी ।

मालवा, उज्जैन (मध्यप्रदेश) की श्री कालिमाता ! इसी मंदिर में देवी ने कालिदास को दर्शन दिया था !

वह युवक प्रामाणिक, निष्कपटी एवं सीधासाधा युवक था । उसके ध्यान में यह बात आई कि, ‘उन दुष्ट युवकों ने अपना उपयोग राजकुमारी को फंसाने हेतु किया है ।’ उसके ध्यान में अपना प्रमाद आया । वह सीधा देवी के मंदिर में गया । रात्रि मंदिर में ही निवास किया । क्या हुआ, कैसे हुआ, इस बात का उसे पता ही नहीं । पुजारी ने उसे देवी की आराधना करने के लिए बताया । तत्पश्चात् अकस्मात उस प्रतिमा से महाकाली प्रकट हुई तथा उस दिव्य देवी ने उसकी जीभ पर मातृका लिखी । साथ ही उसे आशीर्वाद भी दिया कि, ‘तू महापंडित, महाकवी बनेगा ।’ उसका नाम ‘कालिदास’ रखा ।

 

कालिदास ने अपने चार महाकाव्योंं द्वारा राजकुमारी के प्रश्नों के उत्तर दिएं ।

तत्पश्चात् कालिदास राजभवन में आया । राजकुमारी ने उनसे पूछा कि, ‘अस्ति कश्चित् वग्विशेषः।’ ‘तू लौटकर क्यों आया ? क्या कुछ पांडित्य संपादन किया है ?’ कालिदास ने चार महाकाव्यों द्वारा उसके प्रश्नों के उत्तर दिए । प्रत्येक महाकाव्य का प्रारंभ चार शब्दों से हो रहा था, वे चारों महाकाव्यं उन्होंने त्वरित मुखोद्गत किएं ।

कुमारसंभव महाकाव्य के प्रारंभ की पंक्ति इस प्रकार है …….

‘अस्ति उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा

हिमालयो नाम नगाधिराजः।

पूर्वापरौ तोयनिधी विगाह्य

स्थित: पृथिव्या इव मानदण्ड: ॥’

अर्थ : उत्तर दिशा में देवताओं का निवास होनेवाला ‘हिमालय’ नामक पर्बत का स्वामी पूरब तथा पश्चिम दिशा को होनेवाले समुद्र में पृथ्वी का मानदंड इस रूप में खडा है ।

मेघदूत इस महाकाव्य का प्रारंभ इस प्रकार हुआ,……

कश्चित् कांताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः ।

शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः ?

यक्षश्चव्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु ।

स्निग्धच्छायातरूषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु ?

अर्थ : स्वकर्तव्य से दूर गया, प्रेयसी के विरह से व्याकुळ हुआ, कुबेर के शाप के कारण मति अल्प हुआ एक यक्ष सीता के डुबकी लगाने के कारण जहां की नदी पवित्र हुई है तथा जहां गर्द छाया है, ऐसे रामगिरीनामक पर्वत पर रहने लगा ।

रघुवंश का प्रारंभ इस प्रकार हुआ …….

वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।

जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

शब्द एवं अर्थ के समान एकरूप होनेवाले जगत्पालक शिवपार्वती का शब्द एवं अर्थ का आकलन होने के लिए मैं वंदन करता हूं ।

ऋतुसंहार महाकाव्य के प्रारंभ में ग्रीष्म का विवरण इस प्रकार है …….

‘विशेषसूर्यः स्पृहणीयचंद्रमाः ।’

अर्थ : उग्र ऐसा सूर्य तथा रमणीय चंद्र होनेवाला ग्रीष्म ऋतु (निकट आया है । )’

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (घनगर्जित, जुलाई २००५)