भारत में दिखाई देनेवाला सूर्यग्रहण, उस अवधि में पालन करने आवश्यक नियम एवं राशि के आधारपर मिलनेवाला फल !

पौष अमावास्या (२६.१२.२०१९) गुरुवार के दिन होनेवाले सूर्यग्रहण के उपलक्ष्य में …

 

१. सूर्यग्रहण

‘पौष अमावास्या, २६ दिसंबर २०१९ अर्थात गुरुवार के दिन भारत के दक्षिणी प्रदेश में सुबह ९.३० बजे से कंकणाकृति सूर्यग्रहण दिखाई देनेवाला है । शेष भारत में यह सूर्यग्रहण खंडग्रास रूप में दिखाई देगा ।

सूर्य एवं पृथ्वी के मध्य में चंद्रमा आकर चंद्रमा की छाया पृथ्वीपर पडती है । वह जिस भाग में पडती है, वहां से उतने समयतक चंद्रबिब के कारण सूर्यबिंब ढका हुआ दिखता है । यह सूर्यबिंब यदि पूर्णरूप से दिखाई देना बंद होता है, तो वह खग्रास सूर्यग्रहण और सूर्यग्रहण आंशिकरूप से ढंक जाने से खंडग्रास सूर्यग्रहण बनता है । सूर्यबिंब यदि कंकण (महिलाओं के हाथ के कंगण) के आकार में ढंक गया, तो दिखाई देनेवाले ग्रहण को कंकणाकृति ग्रहण केते हैं । कंकणाकृति सूर्यग्रहण में सूर्य पूर्णरूप से ढंका हुआ दिखाई नहीं देता; परंतु सूर्य की बाहरी किनार कंगणजैसी चमकती है । यह सूर्यग्रहण केवल अमावास्या को ही लगता है । महर्षि आर्टीमुनि ग्रहण का ज्ञान देनेवाले पहले शिक्षक थे ।

 

२. भारत में सर्वत्र दिखाई देनेवाले सूर्यग्रहण के समय

यह ग्रहण भारतसहित संपूर्ण एशिया उपमहाद्वीप, आफ्रिका उपमहाद्वीप में से इथियोपिया, केनिया एवं ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी प्रदेश में दिखाई देगा । केरल, तमिलनाडू इत्यादि प्रदेशों में कंकणाकृति ग्रहण देखने को मिलेगा, तो शेष संपूर्ण भारत में खंडग्रास ग्रहण दिखाई देगा । यह ग्रहण २६.१२.२०१९ को सुबह ८.०४ बजे से लेकर सुबह १०.५५ तक है । (संदर्भ : दाते पंचांग)

२ अ. सूर्यग्रहण के समय (निम्नांकित समय मुंबई के लिए हैं ।)

२ अ १. स्पर्श (आरंभ) : २६.१२.२०१९ को सुबह ८.०४ बजे

२ अ २. मध्य : २६.१२.२०१९ को सुबह ९.२२ बजे

२ अ ३. मोक्ष (अंत) : २६.१२.२०१९ को सुबह १०.५५ बजे

२ आ. ग्रहणपर्व १ (टिप्पणी) (ग्रहण आरंभ से लेकर अंततक की कुल अवधि)

२ घंटे ५१ मिनट

टिप्पणी १ : पर्व अर्थात पुण्यकाल है । ग्रहणस्पर्श से लेकर ग्रहण मोक्षतक का काल पुण्यकाल है । इस अवधि में ईश्‍वरीय अनुसंधान में रहने से आध्यात्मिक लाभ मिलता है, ऐसा शास्त्रों में बताया गया है ।

२ इ. ग्रहण का सूतक लगना

श्रीमती प्राजक्ता जोशी
२ इ १. अर्थ

सूर्यग्रहण से पहले सूर्य चंद्रमा की छाया में आने लगता है और उससे उसका प्रकाश धीरे-धीरे न्यून होने लगता है । इसे ही ‘ग्रहण का सूतक लगना’ कहते हैं ।

२ इ २. कालावधी

यह ग्रहण दिन के पहले प्रहर में (टिप्पणी २) होने से २५.१२.२०१९ को सूर्यास्त से लेकर ग्रहणमोक्षतक अर्थात २६.१२.२०१९ की सुबह १०.५५ तक सूतक का पालन करें । (संदर्भ : दाते पंचांग)

टिप्पणी २ : एक प्रहर ३ घंटों का होता है । दिन के ४ और रात के ४ प्रहरों को मिलाकर दिन में कुल ८ प्रहर होते हैं ।

 

३. सूर्यग्रहण की अवधि में पालन करने आवश्यक नियम

सूतककाल में स्नान, देवतापूजन, नित्यकर्म, जपजाप्य एवं श्राद्धकर्म किए जा सकते हैं । सूतककाल में भोजन निषिद्ध है; इसलिए अन्नपदार्थ न खाएं; परंतु आवश्यकता पडनेपर पानी पीना, मल-मूत्रोत्सर्ग और विश्राम करने जैसे कार्य किए जा सकते हैं । ग्रहणकाल में (सुबह ८ से ११) तो ये सभी कर्म निषिद्ध हैं । बालक, दुर्बल एवं रोगी व्यक्ति, साथ ही गर्भवती महिलाएं २५.१२.२०१९ को रात १२ बजे से लेकर ग्रहणमोक्षतक सूतक का पालन करें । (संदर्भ : दाते पंचांग)

३ अ. स्वास्थ्य की दृष्टि से सूतकनियमों के पालन का महत्त्व !

३ अ १. शारीरिक एवं भौतिक स्तर

सूतककाल में जीवाणुओं की संख्या बढने से अन्न शीघ्र खराब होता है । जिस प्रकार से रात का अन्न दूसरे दिन बासी बन जाता है, उस प्रकार ग्रहण से पहले बनाया गए अन्न को ग्रहण के पश्‍चात बासी माना जाता है । अतः ऐसे अन्न को फेंक दें । केवल दूध और पानी को यह नियम लागू नहीं होता । ग्रहण से पहले का दूध और पानी का उपयोग ग्रहण के पश्‍चात भी किया जा सकता है ।

३ अ २. मानसिक स्तर

सूतककाल में मानसिक स्वास्थ्यपर भी प्रभाव पडता है । इससे कुछ व्यक्तियों में निराशा आना, तनाव बढना आदि मानसिक कष्ट बढते हैं, ऐसा मनोरोगविशेषज्ञ बताते हैं ।

ग्रहणकाल में की गई साधना का फल सहस्रों गुना अधिक मात्रा में मिलता है । इसके लिए ग्रहणकाल में साधना को प्रधानता देना महत्त्वपूर्ण है । सूतकारंभ से लेकर ग्रहण समाप्त होनेतक नामजप, स्तोत्रपाठ, ध्यानधारणा आदि धार्मिक कार्य में मन को व्यस्त रखने से उसका लाभ मिलता है ।

 

४. ग्रहणकाल में वर्ज्यावर्ज्य कृत्य

४ अ. वर्ज्य कृत्य

ग्रहण के पर्वकाल में निद्रा, मल-मूत्रविसर्जन, अभ्यंग (संपूर्ण शरीर को गुनगुना तेल लगाकर उसके रिसनेतक मर्दन करना), भोजन, खाना-पीना तथा काम का सेवन ये कर्म न करें ।

४ आ. कौनसे कर्म करने चाहिएं ?

१. ग्रहणस्पर्श होते ही स्नान करें ।

२. पर्वकाल में देवतापूजन, तर्पण, श्राद्ध, होम एवं दान करें ।

३. पहले कुछ कारणों से खंडित मंत्र का इस अवधि में पुरश्‍चरण करने से उसका अनंत गुना फल मिलता है ।

४. ग्रहणमोक्षपश्‍चात स्नान करें ।

किसी व्यक्ति को अशौच हो; तो उसके लिए ग्रहणकाल में ग्रहण से संबंधित स्नान एवं दान देनेतक की शुद्धि होती है ।

 

५. ग्रहण का राशी के आधारपर फल

५ अ. शुभ फल : कर्क, तुला, कुंभ एवं मीन

५ आ. अशुभ फल : वृष, कन्या, धनु एवं मकर

५ इ. मिश्र फल : मेष, मिथुन, सिंह एवं वृश्‍चिक

जिन राशियों के लिए अशुभ फल है, ऐसे व्यक्ति और गर्भवती महिलाओं को इस सूर्यग्रहण को नहीं देखना चाहिए । (संदर्भ : दाते पंचांग)

 

६. सूर्यग्रहण देखते समय बरतनी आवश्यक सावधानियां

खंडग्रास सूर्यग्रहण देखते समय ग्रहण देखने के लिए बनाए गए विशेष उपनेत्र, कालिख लगाई हुई कांच, काली कांच अथवा सूर्य के प्रखर किरण आंखोंतक न पहुंचे; इसके लिए उपलब्ध साधनों का उपयोग कर ही ग्रहण देखें । किसी भी कारणवश खुली आंखों से सूर्य की ओर न देखें । ग्रहण के छायाचित्र खींचनेवाले विशिष्ट फिल्टर का उपयोग कर ही छायाचित्र खींचे, अन्यथा आंखों को हानि पहुंच सकती है ।

इस ग्रहण में कंकणाकृति स्थिति ३ मिनटोंतक दिखाई देगी; इसलिए इस अवधि में आंखोंपर पूर्णकालीन ग्रहण देखने के लिए उपयोग किया जानेवाला उपने लगाकर रखें । इसके पश्‍चात पुनः २१.६.२०२० को उत्तर भारत में कंकणाकृति सूर्यग्रहण दिखाई देगा । इससे पहले वर्ष १८९० के पश्‍चात १५ जनवरी २०१० को भारत के कुछ दक्षिणी प्रदेशों में कंकणाकृति ग्रहण दिखाई दिया था । (संदर्भ : दाते पंचांग)

 

७. ग्रहण के स्नान के संदर्भ में जानकारी

ग्रहण में सभी प्रकार का जल गंगासमान है; परंतु तब भी शीतोदक पुण्यकारी, पानी निकालकर स्नान करने की अपेक्षा बहता पानी, सरोवर, नदी, महानदी, गंंगा एवं समुद्र का स्नान उत्तरोत्तर श्रेष्ठ एवं पुण्यकारी है । सूर्यग्रहण में नर्मदास्नान का विशेष महत्त्व बताया गया है । नर्मदास्नान संभव न हो, तो स्नान के समय में नर्मदा का स्मरण करें । (संदर्भ : दाते पंचांग)

 

८. सूर्यग्रहण में साधना का महत्त्व

ग्रहणकाल में प्रत्येक सजीवपर ग्रहण के विशिष्ट वातावरण का प्रभाव पडता है । चंद्रग्रहण की अपेक्षा सूर्यग्रहण का काल साधना के लिए अधिक पोषक होता है । ज्योतिष, धार्मिक एवं विज्ञान इन विषयों में ग्रहणकाल को महत्त्वपूर्ण माना गया है । ग्रहणकाल संधिकाल होने से इस काल में की जानेवाली साधना का परिणाम तुरंत प्रतीत होता है । ग्रहणकाल में किए जानेवाले जप एवं दान का फल अनंत गुना मिलता है । इसके लिए ग्रहणमोक्ष के पश्‍चात अपनी क्षमतानुसार दान दें । सूर्यग्रहण की अवधि में नया मंत्र लेने तथा मंत्र का पुरश्‍चरण करना अनुकूल होता है । ग्रहणकाल में पहले लिए गए मंत्र का पुरश्‍चरण करने से मंत्र सिद्ध होता है । सूर्यग्रहण में श्री गुरुदेवजी का अनन्यभाव से स्मरण कर पूर्ण श्रद्धा के साथ एवं एकाग्र मन से किए जानेवाले जाप से शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक कष्ट नष्ट होते हैं और सभी कार्यों में सफलता मिलती है । ग्रहणकाल में जाप करने हेतु माला की आवश्यकता नहीं होती । ग्रहणस्पर्श से लेकर मोक्षतक का संपूर्ण समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है ।’

– श्रीमती प्राजक्ता जोशी (ज्योतिष फलित विशारद), महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, ज्योतिष विभाग, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (५.११.२०१९)