१.४.२०२० से ३०.६.२०२० तक समष्‍टि के लिए नामजप करनेवाले तथा समष्‍टि स्‍तर पर कष्‍ट दूर होने हेतु साधकों द्वारा किए जानेवाले नामजपादि उपचार

 

१. विविध चक्रों पर नामजप-पट्टियां लगाना

‘‘शरीर को स्‍पर्श कर नामजप-पट्टी लगाते समय नामजप-पट्टी के अक्षरवाला भाग बाहर की दिशा में (निर्गुण) रखना है या भीतर की दिशा में (सगुण)’, यह नीचे दिया है ।

टिप्‍पणी १ – ‘आगेे’ अर्थात शरीर के चक्र से संबंधित सामने का भाग

टिप्‍पणी २ – ‘पीछे’ अर्थात शरीर के चक्र से संबंधित पीछे का भाग

टिप्‍पणी ३ – सहस्रारचक्र से संबंधित सिर के मध्‍यभाग में एक ही स्‍थान होता है, वहां नामजप पट्टी लगाएं ।

 

२. जप

वर्तमान में आपातकाल की तीव्रता बढती जा रही है । कालमहिमा के अनुसार वर्तमान में साधकों को हो रहे कष्‍टों में से ७० प्रतिशत कष्‍ट समष्‍टि और ३० प्रतिशत कष्‍ट व्‍यष्‍टि स्‍तर के हैं ।

२ अ. उपचार के लिए बैठकर जप करनेवाले साधक

इसमें जितना समय नामजप करेंगे, उसका ७० प्रतिशत समय व्‍यष्‍टि उपचार के लिए ‘प्राणशक्‍ति प्रणाली उपचार-पद्धति’ के अनुसार ढूंढकर निकाला जप, बताए हुए कुछ अन्‍य जप या मंत्रजप हों, तो वह करें और शेष ३० प्रतिशत समय समष्‍टि के लिए ‘निर्गुण’ का जप करें ।

ढूंढे हुए उपचारों का २ – ३ सप्‍ताह में लाभ न होने पर अथवा तीव्र कष्‍ट होने से उपचार ढूंढ न पा रहे हों, तो ६० प्रतिशत से अधिक आध्‍यात्मिक स्‍तर के साधक अथवा संतों से पूछें ।

२ आ. उपचार स्‍वरूप बैठकर जप न करनेवाले साधक

दिनभर में पूरे समय ‘निर्गुण’ का नामजप करें । यदि उन्‍हें कुछ कष्‍ट हो रहा है, तो वे कष्‍ट की तीव्रता के अनुसार (टिप्‍पणी) उतने समय तक उपचार के लिए बैठकर नामजप करें और शेष समय ‘निर्गुण’ का जप करें ।

टिप्‍पणी – मंद कष्‍ट हो रहा हो, तो १ से २ घंटे, मध्‍यम कष्‍ट हो रहा हो, तो ३ से ४ घंटे और तीव्र कष्‍ट हो रहा हो, तो ५ से ६ घंटे उपचार करें ।

२ इ. समष्‍टि के लिए नामजप करनेवाले संत और साधक

कुछ संत समष्‍टि के लिए कुछ घंटे नामजप करते हैं इसके साथ ही ६० प्रतिशत से अधिक स्‍तर के कुछ साधक हिन्‍दू राष्‍ट्र-जागृति सभा, आंदोलन इत्‍यादि में अनिष्‍ट शक्‍तियों की बाधाएं दूर होने के लिए नामजप करते हैं । वे उतने समय ‘निर्गुण’ का नामजप करें ।

 

३. न्‍यास

समष्‍टि स्‍तर के कष्‍ट दूर करने के लिए चलते-फिरते या बैठकर ‘निर्गुण’ नामजप करते समय आगे दिए अनुसार न्‍यास करें । एक हथेली अनाहतचक्र पर और दूसरी हथेली मणिपुरचक्र पर आडी रखें । न्‍यास करने के स्‍थान से अपनी हथेली १ – २ सें.मी. दूर रखें । उपचार के लिए नामजप-पट्टी लगे हुए सहस्रार और विशुद्ध चक्रों पर न्‍यास करने से समष्‍टि स्‍तर के आक्रमणों से संपूर्ण शरीर की रक्षा नहीं होती है । अनाहतचक्र और मणिपुरचक्र पर न्‍यास करने से संपूर्ण शरीर की रक्षा होती है । अत: अनाहतचक्र और मणिपुरचक्र पर न्‍यास करें ।’

– (पू.) डॉ. मुकुल गाडगीळ (१३.२.२०२०)

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