शिवजी की उपासना पद्धतियां

शिवजी की परिक्रमा का मार्ग

सारिणी


 

१. शिवजी की परिक्रमा कैसे करें ?

शिवजी की परिक्रमा चंद्रकला के समान अर्थात सोमसूत्री होती है । सूत्र का अर्थ है, नाला । अरघा से उत्तर दिशा की ओर, अर्थात सोम की दिशा की ओर, जो सूत्र जाता है, उसे सोमसूत्र या जलप्रणालिका कहते हैं । परिक्रमा बार्इं ओरसे आरंभ कर जलप्रणालिका के दूसरे छोर तक जाते हैं । उसे न लांघते हुए मुडकर पुनः जलप्रणालिका तक आते हैं । ऐसा करने से एक परिक्रमा पूर्ण होती है । यह नियम केवल मानवस्थापित अथवा मानवनिर्मित शिवलिंग के लिए ही लागू होता है; स्वयंभू लिंग या चल अर्थात पूजाघर में स्थापित लिंग के लिए नहीं ।

 

२. शिवपिंडी की परिक्रमा करते समय
अरघा के स्त्रोत को क्यों नही लांघते ?

अरघा के जलप्रणालिका से शक्तिस्रोत प्रक्षेपित होता है । उसे लांघते समय पैर फैलने से वीर्यनिर्मिति एवं पांच अंतस्थ वायुओंपर विपरीत परिणाम होता है । इससे देवदत्त एवं धनंजय इन वायु के प्रवाह में रुकावट निर्माण हो जाती है । तथा इस स्रोत से शिव की तमप्रधान लयकारी सगुण तरंगें पृथ्वी तथा तेज तत्त्वोंके प्राबल्य के साथ प्रक्षेपित होती रहती है । परिणामस्वरूप व्यक्ति को अचानक मिरगी आना, मुंह में फेन अर्थात फ्रोत आना, देह में ऊष्णता निर्माण होकर देह का तप्त होना, हड्डियां टेढी होना, दांत बजना जैसे कष्ट होने की आशंका रहती है । इसलिए ऐसे शिवलिंग की अर्ध गोलाकृति पद्धतिसे परिक्रमा करते हैं । शिवजी की परिक्रमा पुरी करने के उपरांत कुछ शिवभक्त शिवउपासना में शिवमहिम्नस्तोत्र, शिवकवच इनका पाठ विशेष रूपसे करते है । पाठ करने के साथही शिवतत्त्व का अधिकाधिक लाभ पाने के लिए महाशिवरात्रि पर शिवजी के नाम का जप अधिकाधिक करें ।

 

३. शिवजी के नामजप का महत्त्व

‘नमः शिवाय ।’ यह शिवजी का पंचाक्षरी नामजप है । इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर शिव की विशेषताओंका निदर्शक है । जहां गुण हैं वहां सगुण साकार रूप है । ‘नमः शिवाय ।’ इस पंचाक्षरी नामजप को निर्गुण ब्रह्म का निदर्शक ‘ॐ’कार जोडकर ‘ॐ नमः शिवाय’ यह षडाक्षरी मंत्र बनाया है । इस मंत्र का अर्थ है, निर्गुण तत्त्वसे अर्थात ब्रह्मसे सगुण की अर्थात माया की ओर आना ।

 

४. शिवजी के नामजप में ‘ॐ’कार लगाने का परिणाम

माया की निर्मिति के लिए प्रचंड शक्ति आवश्यक होती है । उसी प्रकार की शक्ति ओंकारद्वारा निर्माण होती है । ओंकारद्वारा निर्माण होनेवाले स्पंदनोंसे शरीरमें अत्यधिक शक्ति अर्थात उष्णता निर्माण होती है । यह शक्ति न सहपानेसे सर्वसामान्य व्यक्तिको आम्लपित्त, उष्णता बढने जैसे शारीरिक कष्ट होना अथवा अस्वस्थ लगने जैसे मानसिक कष्ट होने की संभावना भी रहती है । महाशिवरात्रि पर कार्यरत शिवतत्त्व का अधिकाधिक लाभ लेने हेतु हमारे धर्मशास्त्र में महाशिवरात्रि व्रत का विधान भी बतायां है ।

 

५. महाशिवरात्रि व्रत

महाशिवरात्रि काम्य एवं नैमित्तिक व्रत है । इस व्रत के तीन प्रधान अंग है उपवास, पूजा एवं जागरण । महाशिवरात्रिपर शिवजी को विशेष रूपसे आम्रमंजरी अर्थात आम के बौर का गुच्छा अर्पण करते हैं । शक संवत् कालगणनानुसार माघ कृष्ण त्रयोदशी पर एवं विक्रम संवत् कालगणनानुसार फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशीपर एकभुक्त रहकर चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल व्रत का संकल्प करते है । सायंकाल नदीपर अथवा तालाब पर जाकर शास्त्रोक्त स्नान कर भस्म एवं रुद्राक्ष धारण करते है । तथा प्रदोषकाल में शिवालय में जाकर शिवजी का ध्यान एवं षोडशोपचार पूजन करते है । नाममंत्र जपते हुए शिवजी को एक सौ आठ बिल्वपत्र अर्पण करते है । प्रदोषकाल का अर्थ है प्रत्येक महीने की शुक्ल एवं कृष्ण त्रयोदशी पर सूर्यास्त पूर्व के तीन घटकोंका काल । चतुर्दशी की रात्रि को शिवजी का विशेष पूजन करते हैं, जिसे यामपूजा कहते है । उसके उपरांत नृत्य, गीत, कथा-श्रवण इत्यादि करते हुए जागरण करते हैं । प्रातःकाल स्नान कर, पुनः शिवपूजन करते हैं । पारण अर्थात व्रत की समाप्ति के लिए ब्राह्मणभोजन कराते हैं । उनके आशीर्वाद प्राप्त कर व्रतसमाप्ति की जाती है । इस व्रत को बारह, चौदह या चौबीस वर्ष करने के उपरांत व्रत का उद्यापन करते हैं ।

हम शिवजी की कृपा संपादन करने हेतु विविध पद्धतियोंसे उपासना करते है । हमें लगता है कि उन्होंने आकर हमारे दुःख दूर करने चाहिए, हमारी रक्षा करनी चाहिए । परंतु धर्महानी करनेवाले घटकोंद्वारा शिवजी के होनेवाले अपमान को हम अनदेखी करते है । क्या इससे हम शिवजी की कृपा प्राप्त कर पाएंगे ? नहीं । शिवजी की कृपा निरंतर प्राप्त करने के लिए हमें कालानुसार साधना करना आवश्यक है ।

 

६. कालानुसार आवश्यक उपासना

आजकल विविध प्रकारसे देवताओंका अनादर किया जाता है । इसके कुछ उदाहरण देखेंगे । नाटकों एवं चित्रपटोंमें देवी-देवताओंकी अवमानना करना, कलास्वतंत्रता के नाम पर देवताओंके नग्न चित्र बनाना, व्याख्यान, पुस्तक आदिके माध्यमसे देवताओंपर टीका-टिप्पणी करना, व्यावसायिक विज्ञप्तिके लिए देवताओंका ‘मौडेल’ के रूप में उपयोग किया जाना, उत्पादनोंपर देवताओंके चित्र प्रकाशित करना तथा देवताओंकी वेशभूषा पहनकर भीख मांगना इत्यादि अनेक प्रकार दिखार्इ देते है । यही सब प्रकार शिवजी के संदर्भ में भी होते है । देवताओंकी उपासना का मूल है श्रद्धा । देवताओंके इस प्रकार के अनादर से श्रद्धा पर प्रभाव पडता है; तथा धर्म की हानि होती है । धर्महानि रोकना कालानुसार आवश्यक धर्मपालन है । यह देवता की समष्टि अर्थात समाज के स्तरकी उपासना ही है । इसके बिना देवता की उपासना परिपूर्ण हो ही नहीं सकती । इसलिए इन अपमानोंको उद्बोधनद्वारा रोकने का प्रयास करें । जो भक्तोंके अज्ञान को, अर्थात सत्त्व, रज तथा तम को एक साथ नष्ट कर उन्हें त्रिगुणातीत करते हैं ।

संदर्भ : सनातनका ग्रंथ ‘शिव’

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