हिंदू धर्मग्रंथ मांसभक्षण का समर्थन नही, निषेधही करते है ।

“वेदों मे मांसभक्षण” का झूठा और निराधार प्रचार यवनों और मलेक्षों द्वारा हमारी संस्कृति को कलंकित करने के उद्देश्य और क्षुदा पूर्ती से किया गया था । आप स्वयं देखे की वेदों मे हर जगह मांस को किस प्रकार से निषिध बताया गया है, वेदो मे स्पष्ट कहा गया है कि जो भी माता पिता बनने के योग्य रहते है, उन्हे नहीं मारना चाहिए। वे मनुष्य का भोजन नहीं है । बल्कि फल-सब्जिया, अनाज, दूध आदि पदार्थ ही मनुष्य को ग्रहण करने चाहिए। कृपया मांसाहार त्यागे और सच जाने और हर जगह इसका विरोध करे ।

मनुस्मृति के प्रमाण के अनुसार मांस न खाने का फल सौ अश्वमेध यज्ञों के समान बताया है ।

वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥
– मनुस्मृति ५.५३

अर्थ : जो सौ वर्ष तक प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जीवन भर मांस नहीं खाता है, दोनों को एक समान फल मिलता है ।

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः॥

– मनुस्मृति ५.५१

अर्थ : मारने की आज्ञा देने वाला, पशु को मारने के लिए मोल देने वाला, बेचने वाला, पशु को मारने वाला, मांस को खरीदने और बेचने वाला, मांस को पकाने वाला और मांस खाने वाला, यह सभी हत्यारे हैं ।