औक्षण के संदर्भ में शंकानिरसन

१. जन्मदिन पर जीव का औक्षण करते समय
जीव के अनाहतचक्र से थाली घुमाकर आज्ञाचक्र तक लाने का भावार्थ क्या है ?

जीव की उन्नति अनाहतचक्र से आज्ञाचक्रतक हो । अनाहतचक्र भावना का प्रतीक है, जबकि आज्ञाचक्र भाव का प्रतीक है । आरती उतारते समय उद्देश्य यही रहता है कि, जीव की भावना कम होकर उसके भावमेें वृद्धि हो अर्थात उसके जीवन का मार्गक्रमण माया से ब्रह्म की ओर हो । माया का आकर्षण कम होकर ब्रह्म की ओर जाने से ही जीव की उन्नति होती है । ऐसा होने पर ही हम सोच सकते हैं कि, वास्तविक अर्थ में जीव का विकास हुआ है और हम उसका जन्मदिन मना सकते हैं । – ईश्‍वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, १३.५.२००५, रात्रि ८.०४ से ८.२२)

२. संतों का औक्षण करते (आरती उतारते) समय केवल एक ही बार आरती
क्यों उतारें ? (संत शिवदशा में होते हैं, इसलिए उनकी आरती एक ही बार उतारते हैं)

संतों की औक्षणविधि में उनकी आरती एक ही बार उतारी जाती है । ऐसा करना उनकी शिवदशा के कार्य का प्रतीक है । शिवदशा में स्थित संत निर्गुण के बल पर एक निमिषमात्र में संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा कर सकते हैं । औक्षण का एक ही गोलाकार फेरा संतों द्वारा ब्रह्मांड के एक फेरे का प्रतीक है । उसी प्रकार संपूर्ण ब्रह्मांड में निर्गुण के बल पर किए गए क्षणभर के उनके कार्य का यह द्योतक है । औक्षण का एक ही फेरा द्वैत से अद्वैत की ओर ले जानेवाली संतों की कार्यरत ज्ञानशक्ति का प्रतीक है । ऐसी असीमित क्षमतावाले सगुण ईश्‍वररूपी अंश का यह सम्मान है ।

आरती उतारने (औक्षण) से पूर्व संतों की पाद्यपूजा कर मन से उनकी शरण जाना कर्मयोग का प्रतीक है । कुमकुम-तिलक लगाकर एवं हार अर्पण कर उनके सगुण ईश्‍वरीय तत्त्व की पूजा करना भक्तियोग का प्रतीक है । शाल एवं श्रीफल देकर उनका सम्मान करना, सत्कार करनेवाले जीव के वैराग्ययोग का प्रतीक है तथा एक ही बार संतों के औक्षण द्वारा उच्चतम निर्गुण ईश्‍वरीय तत्त्व की कृपा प्राप्त करना ज्ञानयोग का अर्थात श्रेष्ठ मुक्ति का प्रतीक है । – एक विद्वान [सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळ के माध्यम से, २८.१.२००५, दिन ११.४२]

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ पारिवारिक धार्मिक कृतियोंका अध्यात्मशास्त्रीय आधार