पाप के दुष्परिणामों का निराकरण कैसे करें ?

प्रायश्‍चित कर्म से पाप के दुष्परिणामों का निराकरण संभव है । प्रायश्‍चित पापमुक्ति के लिए हैं । प्रायश्‍चित अर्थात स्वयं से हुई भूल एवं दुष्कृत्यों के लिए पश्‍चाताप होना तथा उसके लिए धर्म में बताए दंड भुगतना ।

प्रायश्‍चित के कारण पाप करनेवाला व्यक्ति व्रतबद्ध हो जाता है । वह कठोर व्रताचरण करता है । तत्पश्‍चात वह सदाचारी बनता है । वह पुनः पाप न करने का निश्‍चय करता है । इसके विपरीत केवल अपराध को स्वीकार करना अथवा दंड भुगतना, ये मनुष्य को वही भूल दोहराने से रोक नहीं सकती । जो अपराधी अपने अपराध के लिए दंड भुगतते हैं, वे सुधरते नहीं; क्योंकि उनमें पश्‍चाताप की भावना नहीं होती अथवा अपने दुुष्कृत्यों के बुरे परिणामों का उन्हें बोध नहीं होता ।

साधक के जीवन में प्रायश्‍चित का महत्त्व

साधना का मार्ग चुनने पर साधक की मनोवृत्ति सात्त्विक होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, तभी बुद्धि सात्त्विक रहती है । बुद्धि का उचित कर्म करने का निश्‍चय ही जीव को साधना में स्थिर रख सकता है । इसीलिए, पापकर्म का प्रायश्‍चित करना आवश्यक होता है ।

 

सौम्य अथवा तीव्र पापों के सौम्य अथवा तीव्र प्रायश्‍चित

अ. सौम्य प्रायश्‍चित

अनजाने में मदिरापान किया हो, तो तीन दिन एवं रात्रि कठोर उपवास करें, ब्रह्मचर्य का पालन करें, व्रत करें तथा शुद्धता रखें ।  – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

आ. प्रकाश (कठोर) प्रायश्‍चित

सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरांपिबेत् ।
तया स काये निर्दग्धे मुच्यते किल्बिषात्ततः ॥
– मनुस्मृति, अध्याय ११, श्‍लोक ८९

अर्थ : जो द्विज (ब्राह्मण) मोहवश मद्यपान करे, वह अंगारे जैसी तप्त मदिरा पीए । उस तप्त मदिरा से उसका शरीर जलेगा । तब वह पापमुक्त होगा । स्वेच्छा से मद्यपान करनेवाले के लिए यह प्रायश्‍चित है । सनातन हिन्दू धर्मियोंको मद्यपान से ही नहीं, अपितु मदिरापान करनेवाले से भी दूर रहना चाहिए ।

इ. प्रत्याम्नाय (सरल प्रायश्‍चित)

प्रत्याम्नाय धर्मशास्त्र की एक संज्ञा है । प्राचीन काल में अधिकांशत: सर्व पापों के लिए कठोर प्रायश्‍चित थे । उन्हें नियम के अनुुसार आचरण में लाना सभी के लिए संभव न होने के कारण मध्ययुग में महापातकों के लिए भी जो थोडे सरल प्रायश्‍चित बताए गए, उन्हें प्रत्याम्नाय कहते हैं । कुछ उदाहरण –

१. योग्य ब्राह्मण अथवा अन्य व्यक्ति को एक दुधारू गाय अथवा गाय का मूल्य दानस्वरूप देना

२. बारह ब्राह्मणों को भोजन देना

३. गायत्री मंत्र १० सहस्र (हजार) बार जपना

४. सहस्रतिलहोम करना

५. बारह स्नान करना

६. दो सौ बार प्राणायाम करना

अपवाद

अ. पांच वर्ष से न्यून (कम) आयु के बालकों के लिए प्रायश्‍चित नहीं होता ।

आ. ५ से १६ वर्ष की आयु के बालक तथा ८० वर्ष से अधिक आयु के वृद्ध तथा रोगी पुरुष और स्त्रियां केवल आधा प्रायश्‍चित करें ।

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘पुण्य-पाप के प्रकार एवं उनके परिणाम’