पुणे के महान संत प.पू. आबा उपाध्येजी द्वारा देवद, पनवेल के सनातन आश्रम का चैतन्यमय अवलोकन !

सनातन संस्था के संत पू. गुरुनाथ दाभोलकर (बाईं ओर) ने प.पू. आबा उपाध्येजी को सम्मानित करते हुए

सनातन आश्रम, देवद (पनवेल) : पुणे के महान संत प.पू आबा उपाध्येजी ने २३ जून २०१९ की सायंकाल में यहां के सनातन आश्रम का चैतन्यमय अवलोकन किया । अपने ४ दिन के निवास में उन्होंने आश्रम के संत, साधक, साथ ही दैनिक सनातन प्रभात से संबंधित सेवा करनेवाले साधकों से भेंट की । उनके आगमन के कारण साधकों को आध्यात्मिक चैतन्य का लाभ होने का प्रतीत हुआ । सनातन संस्था के संत पू. गुरुनाथ दाभोलकर ने एक अनौपचारिक कार्यक्रम में प.पू. आबाजी को श्रीफल एवं भेंटवस्तुएं प्रदान कर सम्मानित किया । २७ जून को उन्होंने पुणे को प्रस्थान किया । प.पू. आबाजी को आश्रमनिवास बहुत ही अच्छा लगा और उन्हेंने प्रस्थान के समय आश्रम में पुनः-पुनः आने का आश्‍वासन दिया ।

प.पू. आबा उपाध्येजी को ध्यानमंदिर में स्थित देवताओं के चित्रों की रचना दिखाते हुए उनकी बाईं ओर श्री. ओंकार कापशीकर और श्री. शंकर नरुटे

आश्रम के अपने निवास की अवधि में प.पू. आबा उपाध्येजी ने आश्रम में चल रहे राष्ट्र एवं धर्मकार्य की जानकारी ली । इस समय उन्होंने प्रार्थना कर साधकों को अपने पास की विभूति लगाई, साथ ही आश्रम के साधक और संतों का मार्गदर्शन कर उनकी शंकाओं का निराकरण भी किया । प.पू. आबाजी ने सनातन आश्रम के पास स्थित सनातन संकुल में स्थित सनातन संस्था की सद्गुरु फडकेदादीजी के निवास में जाकर उनके कक्ष के दर्शन किए । प.पू. आबाजी ने अपने आश्रम अवलोकन की अवधि में सभी साधकों को बहुत प्रेम और आनंद प्रदान किया । प.पू. आबाजी के साथ उनके परिजन भी आश्रम आए थे, उन्हें भी आश्रम देखकर बहुत प्रसन्नता प्रतीत हुई ।

 

प.पू. आबा उपाध्ये के आश्रम अवलोकन की अवधि के कुछ क्षणमोती

प.पू. आबा उपाध्येजी

१. शिवमंदिर में प.पू. आबा उपाध्येजी द्वारा ध्यानधारणा !

प.पू. आबा उपाध्येजी देवद के सनातन आश्रम के पास स्थित शिवमंदिर के गर्भगृह में बहुत समयतक बैठे रहे । तब उन्होंने शिवजी से प्रार्थना की, तालियां बजाकर भजन गया और ध्यान लगाया । साधकों को उनके आगमन के कारण मंदिर में विद्यमान शक्ति और चैतन्य में वृद्धि होने की अनुभूति हुई ।

२. संत भक्तराज महाराज के छायाचित्र को नमस्कार करनेपर प.पू. आबाजी की भावजागृति !

आश्रम से प्रस्थान करते समय उन्होंने सनातन संस्था के प्रेरणास्रोत संत भक्तराज महाराज के छायाचित्र को भावपूर्ण नमस्कार किया । उन्होंने उनसे बात की, तब ५ मिनटोंतक उनकी आंखों से भावाश्रु बह रहे थे और मुखमंडलपर कृतज्ञताभाव प्रतीत हो रहा था । इस दृश्य को देखते समय ‘चैतन्य के इन २ सागरों का (संत भक्तराज महाराज एवं प.पू. आबा उपाध्येजी) का मीलन हो रहा है’, ऐसा प्रतीत होकर उपस्थित साधकों का भी भाव जागृत हुआ ।

३. प.पू. आबा उपाध्येजी द्वारा सनातन संस्था के आश्रम में प्रत्येक ५ मासों के पश्‍चात आने की बात कही जाना

जब साधकों ने प.पू. आबा उपाध्येजी को और कुछ दिनोंतक आश्रम में रुकने की प्रार्थना की, तब उन्होंने कहा, ‘‘मुझे यहां बहुत अच्छा लगा । मैं इसके आगे प्रत्येक ४ मास पश्‍चात ४ दिनों के लिए आता रहूंगा ।’’

सद्गुरु राजेंद्र शिंदेजी को विभूति लगाते हुए प.पू. आबा उपाध्येजी

 

प.पू. आबा उपाध्येजी के पास स्थित विभूति के डिब्बे की विशेषता

प.पू. आबाजी साधकों को उनके पास स्थित डिब्बे में रखी गई दैवीय विभूति लगाते हैं । इस विभूति का चाहे कितना भी उपयोग क्यों न करें; परंतु कुछ दिन पश्‍चात इस डिब्बे में विभूति अपनेआप पुनः बन जाती है । विभूति के इस डिब्बे में एक शिवलिंग है, जो प.पू. आबाजी के गुरु प.पू. सदानंद महाराज ने उन्हें स्वप्नदृष्टांत के माध्यम से प्रदान की है ।

 

प.पू. आबा उपाध्ये की पुत्री संध्या कोठावळे आश्रम अवलोकन से हुईं प्रभावित !

आश्रम में पानी का मितव्यय होने के लिए की गई व्यवस्था, प्रत्येक साधक द्वारा धर्मशास्त्र के अनुसार लगाया जानेवाला कुमकुम तिलक, साथ ही आश्रम की अन्य व्यवस्था इत्यादि को देखकर प.पू. आबाजी की पुत्री संध्या कोठावळे बहुत प्रभावित हुईं । उन्होंने कहा, ‘‘गोरेगांव के हमारे विद्यालय के संचालक मंडल में साधक व्यक्ति होनी चाहिए, जिससे कि विद्यालय का कार्य अच्छा चलेगा । आश्रम आने से प.पू. आबाजी का स्वास्थ्य अच्छा हु । यह सब साधकों के सेवाभाव के कारण ही हुआ । ऐसा कार्य कहींपर भी नहीं होता ।’’

 

प.पू. आबाजी द्वारा साधकों का किया गया मार्गदर्शन

१. सनातन संस्था के साधक पहले आदरपूर्वक
नमस्कार करते हैं, तो बाहर के लोग अंत में ‘नमस्कार’ कहते हैं !

५-६ वर्ष पूर्व मैं रामनाथी (गोवा) के सनातन आश्रम गया था । सनातन आश्रम में रहनेवाले प्रत्येक साधक का आचरण अच्छी है । मैं कोई बडा नहीं हूं; परंतु सभी साधक मुझे ‘नमस्कार, प.पू. आबाजी’ कहते हैं, तो बाहर के लोग मुझे ‘आबाजी नमस्कार !’ कहते हैं । सनातन संस्था के साधक मिलनेपर पहले आदरपूर्वक नमस्कार करते हैं, तो बाहर के लोग अंत में ‘नमस्कार’ कहते हैं । यह अंतर है । सद्गुरु (श्रीमती) बिंदा सिंगबाळजी एवं सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी भी एक जैसी ही हैं ।

२. सनातन संस्था की नदी का परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के रूप में उद्गम होकर वह बहुत बडी हो रही है !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी त्रिकालज्ञानी हैं । उसके कारण ही उन्होंने सनातन संस्था का कार्य बढाया । आज संस्था गरुडउडान ले रही है । सनातन संस्था की नदी का परात्पर गुरु डॉक्टरजी के रूप में उद्गम हेकर वह बहुत बडी होती जा रही है ।

३. अध्यात्म को केवल पढकर सिखने की अपेक्षा
जो अध्यात्म का प्रत्यक्ष क्रियान्वयन करते हैं, उनसे सिखना अच्छा !

 

प.पू. आबाजी द्वारा आधुनिकतावादी एवं निरीश्‍वरवादियों का किया गया मुंहतोड प्रतिवाद

१. प.पू. आबाजी द्वारा आधुनिकतावादी विचारों का किया हुआ खण्डन !

जब मनुष्य बडा और बुद्धिमान बनता है, तब उसे शत्रु उत्पन्न होते हैं । तब उसके कार्य की निर्भत्सना की जाती है और उसके कार्यपर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया जाता है । इसी के अनुसार सनातन संस्थापर प्रतिबंध लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं । मैने अंनिस, जयंत नारळीकर, अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष श्याम मानव के आधुनिकतावादी विचारों का खण्डन किया है, उदा. मैने उनसे पूछा था, ‘‘क्या आप विज्ञान के बलपर जहां आवश्यक वहां वर्षा करा सकते हैं और क्या जहां वर्षा हो रही हो, वहां की वर्षा को रोक सकते हैं क्या ?’’

२.ईश्‍वर के अस्तित्व के संदर्भ में बातें सुनकर ईश्‍वर को न माननेवाला व्यक्ति निरुत्तर हुआ !

एक बार अंनिस के एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा, ‘‘मैं ईश्‍वर को नहीं मानता; क्योंकि मैने उसे देखा नहीं है ।’’ तब मैने उसे कहा, ‘‘तुमने अपने पिता, दादा और पडदादा को देखा है; इसलिए ‘वे थे ।’, ऐसा कहते हो; परंतु तुमने अपने पडदादा के पिता, उनके दादा आदि को देखा नहीं है; इसलिए क्या तुम ‘वे नहीं थे ।’, ऐसा कह सकते हो ? अतः ईश्‍वर को नहीं देखा; इसलिए उसका अस्तित्व नहीं है, ऐसा कहना अनुचित है । ईश्‍वर को देखने के लिए साधना करनी पडती है । पुणे के डॉ. प.वि. वर्तक ने अंनिस के श्याम मानव के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रविष्ट किया था, तब श्याम मानव को दंड भी मिला है ।

 

प.पू. आबाजी उपाध्येजी को उनके गुरु
प.पू. सदानंद स्वामीजी को बताए गए अध्यात्म के ५ सूत्र !

१. सदैव सत्य बोलना चाहिए । सत्य के लिए द्वार सदैव खुले होते हैं । बंद द्वार में असत्य चलता है ।

२. कल्पना करें कि दो पडोसियों में अच्छाई होती है, तब दूर का तिसरा व्यक्ति आकर उनमें से एक पडोसी से कहता है, ‘‘आपका पडोसी अच्छा नहीं है; किंतु यह मैने आपको बताया है, यह आप किसी को न बताएं ।’’ ऐसे तिसरे व्यक्ति से विश्‍वास नहीं करना चाहिए ।

३. बोलने में सत्य और आचरण में निरंतरता आवश्यक है । कल्पना करें कि हम निरंतर १५ दिन सत्य बोला, तो १६वें दिन अपनेआप ही सत्य बोला जाएगा ।

४. हम जो भी कुछ करते हैं, उसके प्रति हमें संतोष लगना चाहिए ।

५. हम वर्षों से सत्य बोलते आए, तो उससे हमें समाधि लगती है और उससे ब्रह्मानंद मिलता है ।

 

‘प.पू. आबा उपाध्येजी के माध्यम से परात्पर गुरु
पांडे महाराज ही मिलने के लिए आए हैं’, ऐसा साधकों को प्रतीत होना !

हाल ही में देहत्याग किए हुए परात्पर गुरु पांडे महाराज के कक्ष में प.पू. आबा उपाध्येजी के निवास का प्रबंध किया गया था । उनके विविध कृत्य और बातों से साधकों को ‘प.पू. आबाजी के माध्यम से परात्पर गुरु पांडे महाराज ही साधकों से पुनः मिलने आए हैं’, ऐसा प्रतीत हुआ । प.पू. आबाजी ने भी आश्रम में रहकर बहुत आनंद प्रतीत हु और उत्साह प्रतीत हुआ, ऐसा बताया ।

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात