मकर संक्रांति

सारिणी

१. मकर संक्रांतिकी तिथि

२. मकर संक्रांतिका इतिहास

३. संक्रांतिविषयक पंचांगमें जानकारी

४. मकर संक्रांतिका महत्त्व

५. मकर संक्रांतिका साधनाकी दृष्टिसे महत्त्व

६. मकर संक्रांति – त्यौहार मनानेकी पद्धति

६.१ मकर संक्रांतिके कालमें तीर्थस्नान करनेपर महापुण्य मिलना

६.२ पर्वकालमें दानका महत्त्व

६.३ दान योग्य वस्तुएं

६.४ उपायन देनेका महत्त्व

६.५ उपायनमें क्या दें ?

७. मकर संक्रांतिके कालमें सौभाग्यवतीको सात्त्विक भेंट देनेके सूक्ष्म-स्तरीय लाभ दर्शानेवाले चित्र

८. मकर संक्रांतिके लिए सात्त्विक वस्तुएं भेंट करनेसे होनेवाला आध्यात्मिक लाभ

९. मकर संक्रांतिके त्यौहारमें ‘मटकी’ आवश्यक है

१०. मकर संक्रांतिपर तिलका उपयोग

११. मकर संक्रांतिके लिए तिलका महत्त्व

११.१ तिलके प्रयोगसे पापक्षालन

११.२ आयुर्वेदानुसार महत्त्व

११.३ अध्यात्मानुसार महत्त्व

११.४ निषेध

११.५ पतंग न उडाएं !

१२. आपातकालीन परिस्थिति मकर संक्रांति कैसे मनाएं ?


१. मकर संक्रांति की तिथि

इस दिन सूर्यका मकर राशिमें संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमणके कारण होनेवाले अंतरकी पूर्ति करने हेतु कभी-कभी मकर संक्रांतिका दिन एक दिन आगे बढ जाता है । आजकल मकर संक्रांति १४ जनवरीको पडती है ।

 

२. मकर संक्रांति का इतिहास

१. मकर संक्रांति का त्‍यौहार तिथिवाचक न होकर अयन-वाचक है । इस दिन सूर्य का मकर राशि में संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमण के कारण होनेवाले अंतर की पूर्ति करने हेतु प्रत्‍येक अस्‍सी (८०) वर्ष में संक्रांति का दिन एक दिन आगे बढ जाता है । आजकल संक्रांति १४ जनवरी को होती है ।

२. संक्रांति को देवता माना गया है । ऐसी कथा प्रचलित है कि संक्रांति ने संकरासुर दानव का वध किया । किंक्रांति यह संक्रांति का अगला दिन है । इस दिन देवी ने किंकरासुर का वध किया था । पंचांग में संक्रांति का रूप, आयु, वस्‍त्र, गमन की दिशा इत्‍यादि जानकारी दी हुई है । यह जानकारी कालमाहात्‍म्‍य के अनुसार संक्रांति में होनेवाले परिवर्तनानुरूप होती है । कहा जाता है कि ‘संक्रांतिदेवी जो वस्‍तुएं धारण करती हैं, वे महंगी हो जाती हैं ।

३. मकर संक्रांति के पश्‍चात सूर्य उत्तर की ओर जाता है । इस क्रिया को ‘उत्तरायण’ कहते हैं । मकर रेखावृत्त से कर्क रेखावृत्त की ओर जाना, नीचे से ऊपर जाना है । दूसरे शब्‍दों में मकरसंक्रांति, निम्‍नस्‍थान से उच्‍चस्‍थान की ओर जाने का उत्‍सव है ! इसलिए, इस दिन को महत्त्वपूर्ण माना गया है । इस दिन यज्ञ में डाली गई सामग्री का सूक्ष्म अंश ग्रहण करने के लिए देवता पृथ्‍वी पर आते हैं । इस उत्तरायणकाल में, अर्थात प्रकाशमय मार्ग से पुण्‍यवान लोग मृत्‍योपरांत स्‍वर्गादि लोकों में जाते हैं ।

४. इस दिन सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति तक के काल को दक्षिणायन कहते हैं । उत्तरायण में मृत्‍यु हुए व्यक्ति की अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्‍यु हुए व्‍यक्‍ति की दक्षिण (यम) लोक में जाने की संभावना अधिक होती है ।

मकरसंक्रांति का पौराणिक महत्‍व

ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्‍वयं उनके घर जाते हैं । क्योंकि शनिदेव मकर राशि के स्‍वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्‍ति के नाम से जाना जाता है ।

मकर संक्रांति से एक और पौराणिक कथा जुडी है भागिरथी से । सत्‍यवादी राजा हरिश्‍चंद्र के चौदहवे पीढी में महाराज भगीरथ हुए । पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन से मां गंगा ब्रह्मलोक से पृथ्‍वी पर महाराज भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल ऋषि के आश्रम से होते हुए सागर में जा मिली थी । इसलिए माघ स्नान का महत्‍व भी है ।

भीष्‍म पितामह को कौन नहीं जानता । प्रसिद्ध महाभारत युद्ध की कालावधि में भीष्‍म पितामह ने अपना देह त्‍यागने के लिए मकर संक्रान्‍ति का ही चयन किया था । महाभारत युद्ध में अर्जुन के बाणों के शैय्‍या पर कई दिनों तक पितामह भीष्‍म लेटे रहे और उन्‍होंने मृत्‍यू के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की । महामहिम भीष्‍म उत्तरायण और मकर संक्रांति के महत्‍व को जानते थे और इसी लिए उन्‍होंने अपनी इच्‍छामृत्‍यु द्वारा इसी दिन को अपनी मृत्‍यु के लिए निश्‍चित किया और मकर संक्रांति के शुभ दिन पर उन्‍होंने मानव शरीर को त्‍याग कर मोक्ष को प्राप्‍त किया । आज का यह दिन मन और इंद्रियों पर अंकुश लगाने के संकल्‍प के रूप में भी मनाया जाता है।

 

३. संक्रांतिविषयक पंचांग में जानकारी

पंचांग में संक्रांतिका रूप, आयु, वस्त्र, गमनकी दिशा इत्यादि जानकारी दी हुई है । यह जानकारी कालमहिमानुसार संक्रांतिमें होनेवाले परिवर्तनानुरूप होती है । संक्रांतिदेवी जिसका स्वीकार करती है, उसका नाश होता है ।

 

४. मकर संक्रांति का महत्त्व

हिंदू पंचांग के अनुसार जब सूर्य मकर से मिथुन राशि तक भ्रमण करता है, तो इस अंतराल को उत्तरायण कहते हैं । सूर्य के उत्तरायण की यह अवधि ६ माह की होती है । वहीं जब सूर्य कर्क राशि से धनु राशि तक भ्रमण करता है, तब इस समय को दक्षिणायन कहते हैं । दक्षिणायन को नकारात्‍मकता का और उत्तरायण को सकारात्‍मकता का प्रतीक माना जाता है । हिन्‍दू धर्म में दक्षिणायन को नकारात्‍मक तो उत्तरायण को धनात्‍मक ऊर्जा का स्‍त्रोत माना है । आधुनिक विज्ञान में भी ‘नॉर्थ पोल’ को ‘पॉजिटिव’, तो ‘साउथ पोल’ को ‘नेगेटिव’ कहते हैं । हिन्‍दू सदैव सकारात्‍मक रहने का प्रयास करते हैं, इसलिए इस पर्व का हिन्‍दू धर्म में महत्‍व हैं ।

उत्तरायण का महत्‍व भगवान् श्रीकृष्‍ण ने भगवद़्‍गीता में बताते हुए कहा हैं की –

अग्‍निर्ज्‍योतिरहः शुक्‍लः षण्‍मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्‍छन्‍ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ – भगवद़्‍गीता (अध्‍याय ८, श्‍लोक २४)

इस श्‍लोक में बताया है की, उत्तरायण के ६ महीने के शुभ काल में जब सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं और पृथ्‍वी प्रकाशमय रहती हैं, तो प्रकाश में यदि कोई शरीर का त्‍याग करने से जन्‍म-मरण से मुक्‍ति मिलती हैं और फिर उस मानव का पुनर्जन्‍म नहीं होता । (अर्थात् उसके लिए अच्‍छे कर्मोंद्वारा कर्मफलसे मुक्‍त होना भी आवश्‍यक होता है।)

यही कारण था की पितामह भीष्‍म ने मकर संक्रांति के दिन को ही शरीर परित्‍याग करने का निर्णय लिया था । धर्मग्रंथों में उत्तरायण को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है ।

दक्षिणायन में चंद्रमा का प्रभाव अधिक होता है और उत्तरायण में सूर्य का । सृष्टि पर जीवन के लिए सबसे अधिक आवश्‍यकता सूर्य की है । इस प्रकार उत्तरायण पर्व सूर्य के महत्‍व को भी उजागर करता है । सूर्य की गति से संबंधित होने के कारण यह पर्व हमारे जीवन में गति, नव चेतना, नव उत्‍साह और नव स्‍फूर्ति का प्रतीक है । इस समय से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी । दिन बडे होने का अर्थ जीवन में अधिक सक्रियता है । फिर इससे हमें सूर्य का प्रकाश भी अधिक समय तक मिलने लगता है, जो हमारी फसलों के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है । उत्तरायण का महत्‍व इसी तथ्‍य से स्‍पष्‍ट होता है कि हमारे ऋषिमुनियों ने इस अवसर को अत्‍यंत शुभ और पवित्र माना है । उपनिषदों में इस पर्व को ‘देवदान’ भी कहा गया है ।

मकर संक्रांति का पर्व जीवन में संकल्‍प लेने का दिन भी कहा गया है । संक्रांति यानी सम्‍यक क्रांति । इस दिन से सूर्य की कांति में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है । वह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाता है । जब प्रकृति शीत ऋतु के बाद वसंत के आने का इंतजार कर रही होती है, तो हमें भी अज्ञान के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर मुडने और कदम तेज करने का मन बनाना चाहिए ।

 

५. मकरसंक्रांति का साधना की दृष्टि से महत्त्व

इस दिन सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक वातावरण अधिक चैतन्‍यमय होता है । साधना करनेवाले को इस चैतन्‍य का लाभ होता है । इस दिन ब्रह्मांड की चंद्रनाडी कार्यरत होती है । इसलिए, वातावरण में रज-सत्त्व तरंगों की मात्रा बढती है । अतः मकरसंक्रांति काल को साधना-उपासना के लिए बहुत अनुकुल बताया गया है । और यहां यह भी ध्‍यान में आता है की, ऋषिमुनीयोंको ग्रहोंकी गति का यथायोग्‍य आकलन था । आज वैज्ञानिक उपकरणोंसे उसकी प्रामाणिकता भी स्‍पष्ट हो रही है । ऋषिमुनीयोंने ग्रहोंकी इस गति का व्‍यक्‍ति और वातावरण पर होनेवाले परिणामोंका आकलन कर विभिन्‍न त्‍योहारोंके माध्‍यम से धर्माचरण की ऐसी कृतियां बतायी, जिससे सभी को लाभ हो पाएं और इन ग्रहोंके भ्रमण को भी सभी समझ पाएं । सनातन संस्‍कृति की यह विशेषता हमें यहांपर ध्‍यान में लेनी चाहिए ।

 

६. मकर संक्रांति – त्यौहार मनानेकी पद्धति

६.१ मकर संक्रांतिके कालमें तीर्थस्नान करनेपर महापुण्य मिलना

‘मकर संक्रांतिपर सूर्योदयसे लेकर सूर्यास्ततक पुण्यकाल रहता है । इस कालमें तीर्थस्नानका विशेष महत्त्व हैं । गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियोंके किनारे स्थित क्षेत्रमें स्नान करनेवालेको महापुण्यका लाभ मिलता है ।’

६.२ पर्वकालमें दानका महत्त्व

मकर संक्रांतिसे रथसप्तमीतकका काल पर्वकाल होता है । इस पर्वकालमें किया गया दान एवं पुण्यकर्म विशेष फलप्रद होता है ।

६.३ दान योग्य वस्तुएं

‘नए बर्तन, वस्त्र, अन्न, तिल, तिलपात्र, गुड, गाय, घोडा, स्वर्ण अथवा भूमिका यथाशक्ति दान करें । इस दिन सुहागिनें दान करती हैं । कुछ पदार्थ वे कुमारिकाओंसे दान करवाती हैं और उन्हें तिलगुड देती हैं ।’ सुहागिनें जो हलदी-कुमकुमका दान देती हैं, उसे ‘उपायन देना’ कहते हैं ।

मकर संक्रांतिका महत्त्व (video)

 

६.४ उपायन देनेका महत्त्व

‘उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धनसे दूसरे जीवमें विद्यमान देवत्वकी शरणमें जाना । संक्रांति-काल साधनाके लिए पोषक होता है । अतएव इस कालमें दिए जानेवाले उपायनसे देवताकी कृपा होती है और जीवको इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

६.५ उपायनमें क्या दें ?

आजकल साबुन, प्लास्टिककी वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देनेकी अनुचित प्रथा है । इन वस्तुओंकी अपेक्षा सौभाग्यकी वस्तु, उदबत्ती (अगरबत्ती), उबटन, धार्मिक ग्रंथ, पोथी, देवताओंके चित्र, अध्यात्मसंबंधी दृश्यश्रव्य-चक्रिकाएं (CDs) जैसी अध्यात्मके लिए पूरक वस्तुएं उपायनस्वरूप देनी चाहिए ।

 

७. मकर संक्रांतिके कालमें सौभाग्यवतीको
सात्त्विक भेंट देनेके सूक्ष्म-स्तरीय लाभ दर्शानेवाले चित्र

१. चित्रमें अच्छे स्पंदन : २ प्रतिशत’ – प.पू. डॉ. आठवले (सनातनके प्रेरणास्थान)

 

८. मकर संक्रांतिके लिए सात्त्विक वस्तुएं भेंट करनेसे होनेवाला आध्यात्मिक लाभ

इस अवसरपर दी जानेवाली भेंट सात्त्विक ( उदा. आध्यात्मिक ग्रंथ, सात्त्विक अगरबत्ती, कर्पूर इत्यादि ) होनी चाहिए । किंतु वर्तमानमें असात्त्विक वस्तुएं ( उदा. प्लास्टिकका डिब्बा, सौंदर्य प्रसाधन इत्यादि ) दी जाती हैं । सात्त्विक वस्तुओंसे जीवमें ज्ञानशक्ति (प्रज्ञाशक्ति) और भक्ति जागृत होती हैं, जबकि असात्त्विक वस्तुओंमें मायावी स्पंदनोंकी मात्रा अधिक होनेसे व्यक्तिकी आसक्ति बढती हैं । सात्त्विक वस्तुएं भेंट करते समय उद्देश्य शुद्ध और प्रेमभाव अधिक होनेके कारण निरपेक्षता आती हैं । इससे लेन-देन निर्मित नहीं होता । इसके विपरीत, असात्त्विक वस्तुएं भेंट करते समय अपेक्षा, आसक्तिकी मात्रा अधिक होनेके कारण लेन-देन निर्मित होता हैं ।’ – कु. प्रियांका लोटलीकर, सनातन संस्था ( माघ कृ. १२, कलियुग वर्ष ५११३ ११.१.२०१० )

 

९. मकर संक्रांतिके त्यौहारमें ‘मटकी’ आवश्यक है

सुगड

मटकियोंको हलदी-कुमकुमसे स्पर्शित उंगलियां लगाकर धागा बांधते हैं । मटकियोंके भीतर गाजर, बेर, गन्नेके टुकडे, मूंगफली, रुई, काले चने, तिलगुड, हलदी-कुमकुम आदि भरते हैं । रंगोली सजाकर पीढेपर पांच मटकियां रख पूजा करते हैं । तीन मटकियां सुहागिनोंको उपायन देते हैं, एक मटकी तुलसीको एवं एक अपने लिए रखते हैं ।’ एक सौभाग्यवती स्त्रीका मकर संक्रांतिके दिन दूसरी सौभाग्यवती स्त्रीको उपायन (भेंट) देकर उसकी गोद भरना अर्थात दूसरी स्त्रीमें विद्यमान देवी-तत्त्वका पूजन कर तन, मन और धनसे उसकी शरणमें जाना ।

 

१०. मकर संक्रांतिपर तिलका उपयोग

तीळगूळ

संक्रांतिपर तिलका अनेक ढंगसे उपयोग करते हैं, उदा. तिलयुक्त जलसे स्नान कर तिलके लड्डू खाना एवं दूसरोंको देना, ब्राह्मणोंको तिलदान, शिवमंदिरमें तिलके तेलसे दीप जलाना, पितृश्राद्ध करना (इसमें तिलांजलि देते हैं) ।

 

११. मकर संक्रांतिके लिए तिलका महत्त्व

११.१ तिलके प्रयोगसे पापक्षालन

‘इस दिन तिलका तेल एवं उबटन शरीरपर लगाना, तिलमिश्रित जलसे स्नान, तिलमिश्रित जल पीना, तिलहोम करना, तिलदान करना, इन छहों पद्धतियोंसे तिलका उपयोग करनेवालोंके सर्व पाप नष्ट होते हैं ।’

११.२ तिलगुडका आयुर्वेदानुसार महत्त्व

सर्दीके दिनोंमें आनेवाली मकर संक्रांतिपर तिल खाना लाभप्रद होता है ।

११.३ तिलगुडका अध्यात्मानुसार महत्त्व

तिलमें सत्त्वतरंगें ग्रहण करनेकी क्षमता अधिक होती है । इसलिए तिलगुडका सेवन करनेसे अंतःशुद्धि होती है और साधना अच्छी होने हेतु सहायक होते हैं । तिलगुडके दानोंमें घर्षण होनेसे सात्त्विकताका आदान-प्रदान होता है । ‘श्राद्धमें तिलका उपयोग करनेसे असुर इत्यादि श्राद्धमें विघ्न नहीं डालते ।’

११.४ निषेध

संक्रांतिके पर्वकालमें दांत मांजना, कठोर बोलना, वृक्ष एवं घास काटना तथा कामविषय सेवन करना, ये कृत्य पूर्णतः वर्जित हैं ।’

११.५ पतंग न उडाएं !

 

वर्तमानमें राष्ट्र एवं धर्म संकटमें होते हुए मनोरंजन हेतु पतंग उडाना, ‘जब रोम जल रहा था, तब निरो बेला (फिडल) खेल रहा था’, इस स्थितिसमान है । पतंग उडानेके समयका उपयोग राष्ट्रके विकास हेतु करें, तो राष्ट्र शीघ्र प्रगतिके पथपर अग्रसर होगा और साधना एवं धर्मकार्य हेतु समयका सदुपयोग करनेसे अपने साथ समाजका भी कल्याण होगा ।

आपातकालीन परिस्थिति में मकर संक्रांति कैसे मनाएं ?

कोरोना की पार्श्‍वभूमि पर गत कुछ महिनों से त्यौहार – उत्सव मनाने अथवा व्रत करने में कुछ प्रतिबंध थे । कोरोना की परिस्थिति धीरे-धीरे पुन: जोर पकड रही है । ऐसे समय पर त्यौहार मनाते समय आगे दिए गए सूत्र ध्यान में रखें ।

१. त्यौहार मनाने के सर्व आचार, (उदा. हलदीकुंकू समारोह, तिलगुड देना आदि) अपनी स्थानीय परिस्थिति को देखते हुए और कोरोना के विषय में शासन-प्रशासन द्वारा डाले गए सर्व नियमों का पालन करके मनाएं ।

२. हलदी – कुंकू का कार्यक्रम आयोजित करते समय एक ही समय पर सर्व महिलाओं को न बुलाते हुए ४-४ के गुट को १५-२० मिनटों के अंतर पर बुलाएं ।

३. तिलगुड का लेन-देन सीधे न करते हुए छोटे-छोटे पैकटों में डालकर उनका लेन-देन करें ।

४. एक-दूसरे से मिलते-बोलते समय मास्क का उपयोग करें ।

५. कोई भी त्यौहार अथवा उत्सव मनाने का उद्देश्य स्वयं में सत्त्वगुण की वृद्धि करना होता है । इसलिए आपातकालीन परिस्थिति के कारण प्रथा के अनुसार त्यौेहार-उत्सव मनाने में मर्यादा आती हो, तब भी उस काल में अधिकाधिक समय ईश्‍वर का स्मरण, नामजप, उपासना आदि कर सत्त्वगुण बढाने का प्रयत्न करने पर वास्तव में उत्सव मनाना होगा ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

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