जलने पर आयुर्वेद में प्राथमिक उपचार

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वैद्य मेघराज पराडकर

‘किसी भी कारणवश जलने पर जले हुए भाग पर तुरंत ही घी लगाएं । दाह उसी क्षण थम जाता है । वैद्य लोग पैर में होनेवाले गोखरू (फुट कॉर्न) जलाकर निकालने के लिए ‘अग्निकर्म’ करते हैं । इसमें लोहे की सलाई लाल होने तक गरम कर, उससे गोखरू जलाया जाता है । तप्त (गरम की हुई) लोहे की सलाई का तापमान ७०० अंश (डिग्री) सेल्सिअस होता है । एक गोखरू निकालने के लिए यह उपचार एक बार ही करना होता है । तपती हुई सलाई के पश्चात वैद्य उस स्थान पर तुरंत ही देसी घी लगाते हैं । इतनी गरम सलाई से जल जाने पर भी देसी घी लगाने पर अगले ही क्षण दाह शांत हो जाता है, इतना देसी घी प्रभावशाली है ।’

 

देसी घी अमृत समान होने से उसे घर पर अवश्य रखें !

सर्पिः वातपित्तप्रशमनानाम् (श्रेष्ठम्) ।’ ऐसा चरकसंहिता में (अध्याय २५, श्लोक ४० में चुनिंदा अंश) बताए हैं । ‘देसी घी यह वात एवं पित्त के विकार दूर करने में सर्वश्रेष्ठ है’, ऐसा इसका अर्थ है । दैनंदिन आहार में, इसके साथ ही विविध रोगों की आत्ययिक अवस्थाओं में (इमर्जन्सी में) देसी घी का बहुत अच्छा उपयोग होता है । ऐसा घी प्रत्येक के पास होना ही चाहिए । अनेक लोगों को लगता है कि देसी घी मंहगा होता है । हमारे बस की बात नहीं; परंतु ‘देसी घी भले ही मंहगा हो, तब भी शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है’, यह ध्यान में रखना चाहिए । चॉकलेट, बिस्किट, चिप्स, सेव, चिवडा, अथवा अन्य स्नैक्स या फिर पकौडे, वडापाव, पिज्जा इत्यादि आरोग्य की दृष्टि से अनावश्यक पदार्थाें पर होनेवाला (अप)व्यय बचाकर, वह व्यय (खर्च) घी पर करें । घर में घी बनाने के लिए दूध की मलाई को दही लगाएं । उसे मथकर मक्खन निकालें । फिर इसे पानी में स्वच्छ धोकर यदि घर का घी मिले तो उत्तम, अन्यथा हाट में बिकनेवाला देसी घी लें । देसी गाय का घी खाना आदर्श है; परंतु वह संभव न हो, तो हाट में मिलनेवाला सामान्य गाय का घी खरीद लें । प्रत्येक के घर में सदैव न्यूनतम आधा किलो घी होना ही चाहिए ।’

– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२३.८.२०२२)

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