भगवतभक्ति का अनुपमेय उदाहरण अर्थात् संतश्रेष्ठ नामदेव महाराज !

८४ लक्ष योनियों के पश्‍चात् जीव को मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, किंतु उस समय यदि अधिक मात्रा में चुकाएं हुई, तो पुनः फेरा करना पडता है । अतः इस जन्म में ही आत्माराम से (ईश्‍वर से) पहचान करें !

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भगवतभक्ति का अनुपमेय उदाहरण अर्थात् संतश्रेष्ठ संत जनाबाई !

संत जनाबाई के पुण्यतिथी के उपलक्ष्य में भक्ति के अनुपमेय उदाहरण की साक्ष देनेवाली वस्तुओं का भावपूर्ण दर्शन करेंगे तथा अपने अंतरात्मा में भगवंत
के प्रति भक्ति वृद्धिगंत करने हेतु शरणागत भाव से प्रार्थना करेंगे !

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चैतन्यदायी गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सहस्त्रो लोगों ने अनुभव किया गुरुपरंपरा की महानता !

चैतन्यदायी गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सहस्त्रो लोगों ने अनुभव किया गुरुपरंपरा की महानता !

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सनातन के विरुद्ध आशीष खेतान की याचिका सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त की !

पिछले कुछ वर्षों से प्रसिद्धि लोलुप पत्रकार आशीष खेतान हवा में बहुत ऊंचा उड रहे थे । किसी समय तरुण तेजपाल जैसों के सहकर्मी रहे खेतान ने गुजरात दंगों के आरोपी बाबू बजरंगी का स्टिंग ऑपरेशन कर उन्हें दंड दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

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साधकों पर प्रेम की बौछार करनेवाली श्रीमती अश्विनी पवार 69 वे संतपद पर विराजमान !

सनातन की प्रसारसेविका सद्गुरु (कु.) अनुराधा वाडेकर ने 9 जुलाई को अर्थात् गुरुपूर्णिमा के शुभदिन पर यह घोषित किया कि, ‘यहां के सनातन के आश्रम में साधकों की आध्यात्मिक माता कहलानेवाली (श्रीमती) अश्विनी पवार (आयु 27 वर्ष ) ने 71 प्रतिशत स्तर प्राप्त कर वे सनातन की 69 वे संतपद पर विराजमान हुई हैं ।’

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भाव एवं भाव के प्रकार

अधिकांश साधकों को देवता की आरती के समय अथवा गुरु / ईश्वर कास्मरण होने से अथवा उनके संदर्भ में अन्य किसी भी कारण से आंखों से पानी आता है । यह भाव के उपर्युक्त दिए गए आठ लक्षणों मेंसे ‘अश्रुपात’ यह लक्षण है ।

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प्रीति : चराचर के प्रति निरपेक्ष प्रेम सीखानेवाला साधना का स्तर !

प्रीति अर्थात् निरपेक्ष प्रेम । व्यवहार के प्रेम में अपेक्षा रहती है । साधना करनेसे सात्त्विकता बढ जाती है तथा उससे सान्निध्य में आनेवाली चराचर सृष्टि को संतुष्ट करने की वृत्ती निर्माण होती है ।

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त्याग : अर्पण का महत्त्व

त्याग : अर्पण का महत्त्व

हिन्दु धर्म ने त्याग ही मनुष्य जीवन का मुख्य सूत्र बताया है । अर्पण का महत्त्व ध्यान में आने के पश्चात् अपना समर्पण का भावजागृत होकर किए गए अर्पण का अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है । उसके लिए अर्पण का महत्त्व स्पष्ट कर रहे हैं ।

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सत् के लिए त्याग

सत् के लिए त्याग

६० प्रतिशत स्तरतक पहुंचनेपर खरे अर्थमें त्यागका आरंभ होता है । आध्यात्मिक उन्नति हेतु तन, मन एवं धन, सभीका त्याग करना पडता है । पदार्थविज्ञानकी दृष्टिसे धनका त्याग सबसे आसान है, क्योंकि हम अपना सारा धन दूसरोंको दे सकते हैं; परंतु अपना तन एवं मन इस प्रकार नहीं दे सकते । फिर भी व्यक्ति प्रथम उनका त्याग कर सकता है अर्थात तनसे शारीरिक सेवा एवं मनसे नामजप कर सकता है ।

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