Category Archives: आपातकाल में संजीवनी

अग्निहोत्र

त्रिकालज्ञानी संतों ने बताया ही है कि भीषण आपातकाल आनेवाला है तथा उसमें संपूर्ण विश्‍व की प्रचंड जनसंख्या नष्ट होनेवाली है । वास्तव में आपातकाल आरंभ हो चुका है । आपातकाल में तीसरा महायुद्ध भडक उठेगा । अणुबम जैसे प्रभावी संहारक के किरणोत्सर्ग को रोकने के लिए सूक्ष्मदृष्टि से कुछ करना आवश्यक है । इसलिए ऋषि-मुनियों ने यज्ञ के प्रथमावतार रूपी अग्निहोत्र’ का उपाय बताया है ।

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एलोपैथी की औषधियां लेकर भी ठीक न होनेवाले पेट के विकार आयुर्वेदिक उपचारों से कुछ ही दिनों में पूर्णत: ठीक होना

६ माह एलोपैथी की औषधियां लेकर भी अपचन दूर न होना पिछले १ वर्ष से मुझे अपचन की समस्या है । इस कारण पेट में वायु (गैस) होना, बहुत भूख लगना, अनावश्यक खाना, इस प्रकार के कष्ट होने लगे ।

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असहनीय ग्रीष्मकाल को सहनीय बनाने के लिए आयुर्वेदानुसार ऋतुचर्या करें !

‘ग्रीष्मकाल में पसीना बहुत होता है । इससे, त्वचा पर स्थित पसीने की ग्रंथियों के साथ तेल की ग्रंथियां अधिक काम करने लगती हैं, जिससे त्वचा चिपचिपी होती है ।

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आयुर्वेद में प्रतिपादित सरल घरेलु औषधियां एलोपैथी से श्रेष्ठ !

अप्रैल २०१४ में सद्गुरु राजेंद्र शिंदेजी ने मुझे नमक पानी के उपचार करने को कहा । उन्होंने कहा, ‘‘रात में सोते समय जीभ के पिछले भाग में जहां गले में खिचखिच होती है, वहां १ चुटकीभर नमक रगडकर ५ मिनट रुककर उसे थूक डालें ।’’

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एलोपैथी औषधियों से ४ महीने में ठीक न होनेवाला कान का कष्ट आयुर्वेदीय औषधियों से एक सप्ताह में ठीक होना और शल्यकर्म टलना

‘अक्टूबर २०१३ में सर्दी होनेपर कुछ दिन पश्‍चात मेरे कान से पानी-जैसा द्रव निकलने लगा । तब, नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ चिकित्सक से मिला । उन्होंने कुछ गोलियां और कान में डालने के लिए द्रव औषधि दी ।

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आयुर्वेदानुसार अपनी दिनचर्या बनाएं !

सेब मूलतः भारतीय फल है ही नहीं । अंग्रेज उसे अपने साथ लाए थे । वास्तव में इस फल में ऐसे कोई भी विशेष औषधीय गुणधर्म नहीं हैैं, जो भारतीय फलों में पाए जाते हैं ।

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एक्जिमा जैसे त्वचारोगों (‘फंगल इन्फेक्शन’) का सरल उपचार

ऊसंधि (जांघ और पेट के मध्य का भाग), कांख, जांघ और कूल्हों पर जहां पसीने के कारण त्वचा नम रहती है, वहां कभी-कभी खुजली और छोटी-छोटी फुंसियां होती हैं । उनके फैलने से गोल ददोडे (रिंग वर्म) निर्माण होते हैं । इन ददोडों पर आगे दिए दोनों उपचार करें ।

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अग्निशमन प्रशिक्षण (आगामी विश्‍वयुद्ध के समय में उत्पन्न समस्याआें के समय तथा नित्य जीवन में भी उपयुक्त ग्रंथ !)

आज अग्नि दैनिक जीवन-व्यापार का अत्यावश्यक घटक है, तब भी उसके संदर्भ में नियंत्रित तथा अनियंत्रित स्वरूप की जो लक्ष्मणरेखा होती है, वह अधिक महत्त्वपूर्ण है । मनुष्य द्वारा सामान्यत: प्रयुक्त आग के सर्व प्रकार नियंत्रित होते हैं; किंतु किसी विशेष प्रसंग में आग नियंत्रण की सीमारेखा लांघ सकती है ।

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वास्तु का कष्ट बढ गया है, यह ध्यान में आने पर वास्तु के चारों ओर तत्काल गेरू से मंडल बनाएं ! – महर्षि

अनेक बार हमें लगने लगता है कि अकस्मात वातावरण में दबाव बढ गया है । अनेक बार हमारे चारों ओर नकारात्मक स्पंदन घूम रहे हैं, इसका बोध होने लगता है, साथ ही ‘श्‍वास लेने में कुछ रुकावट आ रही है’, ऐसा भी लगता है ।

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