Category Archives: गुरुकृपायोग

नामजप संबंधी शंकानिरसन

‘नाम’ साधना की नींव है । ३३ करोड देवी-देवताओं में से कौन-सा जप करना चाहिए, नामजप में आनेवाली बाधाएं, गलत धारणाएं इत्यादि के विषय में प्रायोगिक प्रश्नोत्तर इसमें दिए हैं ।

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कष्ट संबंधी शंकानिरसन

कष्ट संबंधी शंकानिरसन

साधना करते हुए सूक्ष्म की विविध शक्तियां साधक को कष्ट देती हैं । उसे साधना के परमार्थ पथ से परावृत्त करने हेतु वे प्रयत्नरत होते हैं । इस पर कौन-सा उपाय करें इत्यादि के विषय के प्रश्नोत्तर प्रस्तुत स्तंभ में अंतर्भूत हैं ।

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कर्मकांड संबंधी शंकानिरसन

कर्मकांड संबंधी शंकानिरसन

कर्मकांड साधना का प्राथमिक परंतु अविभाज्य भाग है । कर्मकांड में पालन करने योग्य विविध नियम, आचरण कैसे होना चाहिए, इस विषय में अनेक लोगों को जानकारी होती है; परंतु उसके पीछे का कारण और शास्त्र के विषय में हम अनभिज्ञ होते हैं ।

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अध्यात्मसंबंधी शंकानिरसन

अध्यात्मसंबंधी शंकानिरसन

गांव-गांव के जिज्ञासु और साधकों के मन में सामान्य तौर पर निर्माण होनेवाली अध्यात्मशास्त्र के सैद्धांतिक और प्रायोगिक भाग की शंकाओं का निरसन सनातन संस्था के प्रेरणास्रोत प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी ने किया है ।

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गुरुकृपायोगानुसार साधना के प्रकार

इस लेख में गुरुकृपायोगानुसार साधना की व्यष्टि साधना और समष्टि साधना के विषय में जान लेंगे । व्यष्टि साधना अर्थात् व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति हेतु किए जानेवाले प्रयत्न । समष्टि साधना अर्थात् समाज की आध्यात्मिक उन्नति हेतु किए जानेवाले प्रयत्न ।

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नामजप के लाभ

ईश्वर का नाम, साधना की नींव है । अपने जीवन में नामजप से शारीरिक एवं मानसिकदृष्टि से क्या-क्या लाभ होते हैं, यह देखेंगे ।

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स्वयंसूचना

स्वयंसूचना

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया में स्वयंसूचना बनाना एवं स्वयंसूचना के अभ्याससत्र करना, ये दो महत्त्वपूर्ण चरण हैं । इनमें से यदि एक भी चरण पर चूक हो जाए, तो प्रक्रिया का अपेक्षित परिणाम नहीं दिखाई देता ।

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स्वभावदोष के लिए स्वयंसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वयंसूचना बनाना

स्वभावदोष के लिए स्वयंसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वयंसूचना बनाना

प्रक्रिया के अंंतर्गत प्रत्येक स्वभावदोष के लिए स्वयंसूचना की उपचारपद्धति निश्चित करना और स्वयंसूचना बनाना

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स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी का स्वरूप एवं लिखने की पद्धति

स्वभावदोष-निर्मूलन सारणी का स्वरूप एवं लिखने की पद्धति

१. स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रियांतर्गत कृति के चरण १. दिनभर में हुई अयोग्य कृतियों अथवा अयोग्य प्रतिक्रियाओं को लिखना २. प्रसंग, अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया का अभ्यास करना और योग्य कृति एवं प्रतिक्रिया निश्चित करना ३. मन से उपयुक्त प्रश्न पूछकर अयोग्य कृति एवं प्रतिक्रिया का अभ्यास करना एवं उसके आधार पर उसका मूलभूत स्वभावदोष ढूंढना

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