हिंदु धर्ममें बताए गए वस्त्र धारण करनेसे क्या लाभ होता है ?

सारणी

१. कपडे (वस्त्र) धारण करनेका महत्त्व एवं लाभ

१ अ. शारीरिक दृष्टिसे महत्त्व

१ आ. मनोवैज्ञानिक दृष्टिसे महत्त्व

१ इ. आध्यात्मिक दृष्टिकोणसे महत्त्व


१. कपडे (वस्त्र) धारण करनेका महत्त्व एवं लाभ

१ अ. शारीरिक दृष्टिसे महत्त्व

वस्त्र पहननेसे मनुष्यका शीलरक्षण होता है, अर्थात लज्जाकी रक्षा होती है; साथ ही ठंड, वायु, उष्णता, वर्षा आदिसे भी उसकी देहका रक्षण होता है ।

१ आ. मनोवैज्ञानिक दृष्टिसे महत्त्व

१ आ १. वस्त्रोंसे मनुष्यके स्वभाव एवं व्यक्तित्वका बोध होना

मनुष्य अपने स्वभावके अनुरूप वस्त्र चुनता है । साधारणत: जो लोगसदैव व्यवस्थित एवं इस्त्री किए हुए वस्त्र पहनते हैं, वे अनुशासनप्रिय एवंपरिपूर्ण स्वभावके होते हैं । जो सदैव अनौपचारिक एवं सुखदायक वस्त्र पहनतेहैं, वे मिलनसार एवं स्वच्छंद स्वभावके होते हैं । जो लोग सदैव अस्त-व्यस्तएवं विचित्र वस्त्र पहनते हैं, वे स्वभावसे आलसी एवं असावधान होते हैं ।संक्षेपमें, वस्त्र मनुष्यके स्वभाव एवं व्यक्तित्वका परिचायक होते हैं । अतएवमनुष्यके लिए व्यावहारिक जीवनमें विशिष्ट प्रसंगके लिए पूरक वस्त्र धारणकरना आवश्यक है । उदा. नौकरीके साक्षात्कार (इंटरव्यू) के लिए जाते समय व्यवस्थित एवं इस्त्री किए परिधानमें जानेसे मनुष्यके अनुशासनप्रियता एवं नम्रता जैसे गुण प्रदर्शित होते हैं ।

१ आ २. वस्त्रोंद्वारा मनुष्यकी मानसिकता प्रभावित होना

नए वस्त्र पहननेपर हमें एक प्रकारकी सुखद संवेदना होती है । दूसरी ओर, अनेक लोगोंका यह अनुभव है कि, जब अत्यंत मलिन अथवा तंग वस्त्र पहनने पडते हैं, तब उनकी दुर्गंध अथवा उनके टांके चुभनेसे व्यक्ति अस्वस्थ हो जाता है । तात्पर्य यह कि, वस्त्र मनुष्यकी मन:स्थितिको प्रभावित करते हैं । इंग्लैंडके ‘आर्थर एंडरसन’ नामक व्यावसायिक प्रतिष्ठानने (कंपनीने) इस विषयपर शोध किया एवं अपने कर्मचारियोंके परिधानमें उचित परिवर्तन किए । परिणामस्वरूप कर्मचारी कार्य करते समय सहज रहने लगे, उनकी कार्यक्षमतामें विलक्षण प्रगति हुई और उन्हें समाधान मिलने लगा ।

१ इ. आध्यात्मिक दृष्टिकोणसे महत्त्व

१ इ १. वस्त्र धारण करना, अर्थात ब्रह्मपदपर आरूढ होने हेतु मायाका (वस्त्रका) आलंबन करना

‘वस्त्र धारण करना, अर्थात ब्रह्मपदपर आरूढ होने हेतु मायामें कार्य करनेके लिए मायाका (वस्त्रका) आलंबन करना ।’ – एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुख के माध्यमसे, १८.६.२००७, सायं. ६.२७)

१ इ २. धर्माचरणका प्रमाण देनेवाली वेशभूषा, जीवको पापसे परावृत्त करनेवाली

‘बाह्य विश्वको धर्माचरणका प्रमाण देनेवाली (रेशमी) धोती, उपरना, तिलक, माला इत्यादि वेशभूषा जीवको पाप, अधर्म, मुक्त संभोग एवं मद्यपानसे दूर रखती है, प्रतिबंधित करती है ।’ – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

१ इ ३. सात्त्विक वस्त्र धारण करनेसे वायुमंडलमें विद्यमान सत्त्व तरंगोंका जीवकी ओर आकृष्ट होना

‘जीवद्वारा शरीरपर वस्त्र धारण करनेसे उनके सूक्ष्म-स्पर्शका घर्षण होता है । इससे वायुमंडलमें विद्यमान सात्त्विक तरंगें वस्त्रकी सहायतासे जीवके सूक्ष्म-कोष एवं देहमें आकृष्ट होती हैं ।’ – एक ज्ञानी (श्री. निषाद देशमुख के माध्यमसे, १८.६.२००७, सायं. ६.२७)

१ इ ४. हिंदु धर्ममें बताए गए वस्त्र धारण करनेसे उनसे शिव एवं शक्तिका तत्त्व जागृत होना

‘हिंदु धर्ममें स्त्री एवं पुरुषद्वारा धारण किए जानेवाले वस्त्रोंकी रचना देवताओंने की है । इसीलिए ये वस्त्र शिव एवं शक्ति तत्त्व प्रकट करते हैं । स्त्रियोंके वस्त्रोंसे अर्थात साडीसे शक्तितत्त्व जागृत होता है एवं पुरुषोंके वस्त्रोंसे शिवतत्त्व जागृत होता है । शास्त्रानुसार वस्त्र धारण करनेसे हमें अपने वास्तविक स्वरूपका परिचय और अनुभव होता है । साथ ही हमारी आध्यात्मिक शक्तिका व्यय नहीं होता; अपितु उसकी बचत होती है । देवताओंद्वारा निर्मित वस्त्र पहननेसे स्थूलदेह एवं मनोदेहके लिए आवश्यक शक्ति अपनेआप मिलती है ।’ – एक अज्ञात शक्ति (कु. रंजना गावस के माध्यमसे, १२.१२.२००७, दिन ११.३०)

१ इ ५. हिंदु धर्ममें बताए अनुसार वस्त्र धारण करनेसे ईश्वरीय चैतन्य एवं देवताओंके तत्त्व आकृष्ट होना

इसके दो उदाहरण आगे दिए हैं ।

अ. कुर्ता एवं पजामा : ‘कुर्ता एवं पजामा पहननेसे शरीरके चारों ओर दीर्घवृत्ताकार (दीपकी ज्योतिसमान) कवच निर्मित होता है । इससे जीवके लिए वायुमंडलसे ईश्वरीय चैतन्य ग्रहण करना सुलभ होता है । साथ ही रज-तमपर विजय पाना भी सुलभ होता है।

आ. रेशमी धोती : कुर्ता एवं पजामाकी अपेक्षा रेशमी धोती अधिक सात्त्विक है । उसे धारण करनेसे जीवकी देहके सर्व ओर सूक्ष्म गोलाकार कवच निर्मित होता है । इससे जीवके लिए देवताके तारक-मारक एवं सगुण निर्गुण, दोनों तत्त्व ग्रहण करना सुलभ हो जाता है ।’

– एक विद्वान (श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यमसे, १७.६.२००७, रात्रि ८.५९)

१ इ ६. वस्त्रोंद्वारा सात्त्विकता आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होना, यह वस्त्रके प्रकार एवं वस्त्र धारण करनेकी पद्धतियोंपर निर्भर करना
वस्त्र एवं उसे परिधान
करनेकी पध्दति
वस्त्र व्दारा सात्त्विकता ग्रहण
एवं प्रक्षेपित होनेकी मात्रा
१. ‘नौ गज की साडी एवं धोती सर्वाधिक
२. छ:गजकी साडी
अ. बाएं कंधे पर पल्लू लेना
आ. दाएं कंधे पर पल्लू लेना
अधिक
अल्प
३. लुंगी अल्प
४. सलवार-कुर्ता अथवा चुडीदार-कुर्ता
अ. चुनरी दोनों कंधों पर लेना
आ. चुनरी एक कंधे पर लेना
छ:गजकी साडीसे अल्प
अधिक
अल्प

– ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यमसे, २८.११.२००७, सायं. ७.१५)

इससे हिंदु संस्कृतिके परंपरागत परिधान, नौ-गज लंबी साडी एवं धोतीका महत्त्व ज्ञात होता है । हिंदु संस्कृति चैतन्यमय संस्कृति कैसे है, इसका यह एक उत्कृष्ट उदाहरण है ।

१ इ ७. धार्मिक विधिके समय एवं तीज-त्यौहारपर हिंदु धर्मकी परंपराके अनुसार सात्त्विक वस्त्र धारण करनेसे सर्वाधिक ईश्वरीय चैतन्यग्रहण होना

‘हिंदु धर्मानुसार वर्षभरमें अनेक त्यौहार, व्रत एवं पर्वोत्सव आते हैं ।साथ ही विविध पूजा एवं उपनयन, विवाह जैसी धार्मिक विधियां की जाती हैं ।श्रीरामनवमी, जन्माष्टमी, हनुमान जयंती, संतोंके प्रकटोत्सव आदि दिनोंपर विशिष्टदेवी-देवताओं एवं संतोंका तत्त्व अधिक मात्रामें कार्यरत रहता है । धार्मिक विधिकेसमय हम पूजास्थलपर देवताओंका आवाहन करते हैं, इसलिए देवता वहांउपस्थित रहते हैं । तात्पर्य यह है कि, उस विशिष्ट दिन ईश्वरीय चैतन्यअधिक मात्रामें कार्यरत रहता है । उस दिन हिंदु धर्मकी परंपराके अनुसार सात्त्विकपरिधान धारण करनेसे उस चैतन्यका हमें अधिक लाभ हो सकता है, उदा. स्त्रियोंकेलिए छ: गज अथवा नौ गज लंबी सुनहरी तार (जरी) के छोरवाली साडी पहननाएवं पुरुषोंके लिए धोती-उपरना अथवा कुर्ता-पजामा पहनना अधिक उचित है ।’

– श्रीमती राजश्री खोल्लम, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

१ इ ८. त्यौहार, शुभदिन एवं धार्मिक विधिके दिन नए अथवा रेशमी वस्त्र और विविध अलंकार धारण करनेके लाभ

देवताओंके आशीर्वाद प्राप्त होना :त्यौहार, शुभदिन एवं धार्मिकविधिके दिन कभी-कभी देवता सूक्ष्मरूपसे भूतलपर आते हैं । उस दिनवस्त्रालंकारसे सुशोभित होना, उनका स्वागत करनेके समान है । इससे देवता प्रसन्नहोकर आशीर्वाद देते हैं एवं हम देवताओंकी तरंगें ग्रहण कर पाते हैं ।

देवताओंकी तत्त्वतरंगोंका संपूर्ण वर्ष लाभ होना : त्यौहारके दिननए अथवा रेशमी (अर्थात सात्त्विक) परिधान धारण करनेसे देवताओंके तत्त्व उनविशिष्ट वस्त्रोंमें अधिकाधिक आकृष्ट होते हैं, जिससे वस्त्र सात्त्विक बनते हैं ।वस्त्रोंमें आकृष्ट देवताओंकी तत्त्वतरंगें दीर्घकालतक बनी रहती हैं । वस्त्र धारणकरनेवालेको देवताओंकी तत्त्वतरंगोंका पूर्ण वर्षतक लाभ मिलता है । (वस्त्र धोनेकेउपरांत भी देवताओंके तत्त्व उसमें आकृष्ट होनेमें सहायता होती है ।)

देवताओंकी तत्त्वतरंगोंसे देहोंकी शुद्धि होना :देवताओंकी तत्त्वतरंगेंजीवकी स्थूलदेह, मनोदेह, कारणदेह एवं महाकारणदेहकी ओर अधिकाधिक आकृष्ट होती हैं । इससे उन देहोंकी शुद्धि होती है और वे सात्त्विक बनते हैं ।

– ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यमसे, १२.११.२००७, रात्रि ८.१५)

१ इ ९. वस्त्रोंके कारण अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण होना

अ. अपवित्र एवं नग्न रहनेसे अनिष्ट शक्तियोंके कष्टकी आशंका होना

शक्तिविषये न मुहूर्तमप्यप्रयत: स्यात् । नग्नो वा ।। – आपस्तंबधर्मसूत्र प्रश्न १, सूत्र ५, काण्डिका १५, पटल ८, ९

अर्थ : यथासंभव एक क्षण भी अपवित्र एवं नग्न नहीं रहना चाहिए ।

अनिष्ट शक्तियोंसे बालकोंकी रक्षा हेतु, उन्हें वस्त्रमें लपेटकररखते हैं, नग्न नहीं रखते । – ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यमसे,२८.११.२००७, सायं. ७.०५)

आ. हिंदु धर्ममें बताए अनुसार वस्त्र धारण करनेसे अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षा होना: साडीकी चुन्नटसे शक्तिप्रवाह भूमिकी दिशामें प्रक्षेपित होनेपरपातालकी अनिष्ट शक्तियोंसे स्त्रियोंकी रक्षा होना : साडीद्वारा प्रक्षेपित शक्तितत्त्वकावायुमंडलकी अनिष्ट शक्तियोंसे अनायास ही युद्ध होता है । इससे व्यक्तिके मन एवंबुद्धिपर अनिष्ट शक्तिका प्रभाव घटता है । साडीकी प्रत्येक चुन्नटसे प्रक्षेपित शुभ्रप्रकाशका स्‍त्रोत तलवार जैसा होता है । चुन्नटसे शक्तिप्रवाह भूमिकी दिशामें प्रक्षेपितहोता है, इसलिए पातालकी अनिष्ट शक्तियोंसे भी स्त्रीकी रक्षा होती है ।
– एक अज्ञात शक्ति (कु. रंजना गावस के माध्यमसे, ९.६.२००७, दिन ११)

इ. त्यौहार, शुभदिन एवं धार्मिक विधिके दिन नए अथवा रेशमीवस्त्र और अलंकार धारण करनेसे अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षा होना : यज्ञ, उपनयन, विवाह, वास्तुशांति जैसी धार्मिक विधिके समय देवता और अनिष्ट शक्तियोंका सूक्ष्म-युद्ध क्रमश: ब्रह्मांड, वायुमंडल एवं वास्तु, इन स्थानोंपर होता है । अत: त्यौहार मनानेवालों एवं धार्मिक विधिके लिए उपस्थित व्यक्तियोंपर इस सूक्ष्म-युद्धका परिणाम होता है । इससे उन्हें अनिष्ट शक्तियोंद्वारा कष्ट होनेकी आशंका रहती है । विविध स्वर्णालंकार एवं नए अथवा रेशमी वस्त्र धारण करनेवाले व्यक्तिके सर्व ओर ईश्वरके सगुण-निर्गुण स्तरके चैतन्यका सुरक्षावलय निर्मित होता है ।इससे व्यक्तिकी सात्त्विकता बढती है और अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणोंसे उसकी रक्षाहोती है । – ईश्वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यमसे, १२.११.२००७, रात्रि ८.१५)

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘आध्यात्मिक दृष्टिसे वस्त्र कैसे हों ?’

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